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पौष पूर्णिमा पर विट्ठलदेव मेला. . . . . लोक लहरियाँ बरसाती हैं जंगल में मंगल

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 3, 2026
पौष पूर्णिमा पर विट्ठलदेव मेला. . . . .  लोक लहरियाँ बरसाती हैं जंगल में मंगल

राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात की लोक सांस्कृतिक परम्पराओं और मनोहारी जनजीवन का केन्द्र सरहदी बाँसवाड़ा जिला मन्दिरों, मेलों, पर्वों और अध्यात्म धाराओं के साथ-साथ साँस्कृतिक रस-रंगों के समन्वय का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।

सुरम्य प्राकृतिक परिवेश, सरिताओं का अविराम कलनाद, पर्वतीय उपत्यकाओं और वनवासी लोक संस्कृति की अद्भुत एवं मनोहारी छटा की वजह से यह अँचल सारे देश में अप्रतिम है। मेवाड़ और वाग्वर क्षेत्र का नाम लेते ही शौर्य गाथाओं, साँस्कृतिक एवं नैसर्गिक परिवेश के चित्र आँखों में झूल उठते हैं।

क्षेत्र में जगह-जगह स्थापित धर्मस्थलों के प्रति जनास्था का ज्वार आज भी उमड़ता है। यहाँ ऋषि-मुनियों ने दीर्घ काल तक तपस्या की और जर्रे-जर्रे में अध्यात्म के बीज तत्वों का आविर्भाव किया। आज भी यहाँ के पुरातन तीर्थों पर लगने वाले मेलों में भक्ति, श्रद्धा और मनोरंजन का ज्वार लहराता है।

आदिवासियों की अगाध श्रद्धा का तीर्थ

बाँसवाड़ा जिला मुख्यालय से मात्र दस किलोमीटर दूर दाहोद मुख्य मार्ग से तकरीबन एक किलोमीटर अन्तरंग विराटकाय चट्टानी पहाड़ियों के बीच स्थित प्राचीन महातीर्थ ‘विट्ठलदेव धाम’ वनवासी क्षेत्र का प्रमुख तीर्थ है, जिसे मेवाड़ और वागड़ के वनवासी श्रद्धालु ‘विठला बावसी’ के नाम से पूजते हैं।

यहाँ बहुत पुराने समय से प्रतिवर्ष पौष पूर्णिमा पर विशाल मेला भरता रहा है जिसमें हजारों-हजार मेलार्थी अपने परिवार सहित भाग लेते हैं और विठला बावसी के प्रति अनन्य श्रद्धा का इज़हार करते हैं। वागड़ अँचल के बड़े मेलों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस वर्ष यह मुख्य मेला आज 03 जनवरी, शनिवार को भरेगा।

दैव प्रतिमाओं का मनोहारी दिग्दर्शन

सुरम्य प्राकृतिक छटा के बीच भगवान विट्ठलदेव का मन्दिर जाने कितने युगों से धर्म ध्वजा लहरा रहा है। विस्तृत परिक्षेत्र में पश्चिमाभिमुख इस शिखरबन्दी देवालय में परिक्रमा स्थल के अलावा पाषाण मंच है। सभा मण्डप की छत पर रास क्रीड़ारत नृत्यांगनाओं व देवी-देवताओं की मनोहारी मूर्तियाँ प्राचीन कला का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। मन्दिर के पार्श्व में भगवान विघ्न विनाशक गणेश तथा अन्य देवताओं की कलात्मक मूर्तियाँ हैं। मुख्य मन्दिर के सामने ही षोड़श स्तम्भ का सुन्दर नौ कुण्डीय यज्ञ मण्डप बना हुआ है। पास में धर्मशाला भी है।

अद्वितीय प्रतिमा पर सिन्दूर चढ़ता है

निज मन्दिर में भगवान विट्ठलदेव की आठ फीट से अधिक बड़ी प्रतिमा है जिसे विष्णु एवं भैरव का मिश्रित स्वरूप मानकर पूजा जाता रहा है। कई श्रद्धालु इन्हें भगवान शिव के प्रमुख गण वीरभद्र के रूप में पूजते हैं। विट्ठलदेव के रूप में इस पर सिन्दूर-पानीये चढ़ा कर पूजी जाने वाली इस तरह की मूर्ति अन्यत्र कहीं नहीं है।

वर्ष में ख़ास अवसरों पर तथा मेले के दौरान भगवान विठला बावसी को विशिष्ट तरह का ‘वागा’ (चौला) भी धारण कराया जाता है। विट्ठलदेव लोक जीवन में इस कदर रचे-बसे हैं कि लोग इन्हें वनाँचल का संरक्षक देव मान कर पूजते हैं तथा सदैव संरक्षित होने का अनुभव करते हैं। विट्ठल के इस रूप को ‘विठला बावसी’ संबोधित कर हर कोई आत्मीय रिश्ते का अनुभव करता है। वस्तुतः विष्णु का यह रूप एक लोक देवता के रूप में ज्यादा प्रतिष्ठित है।

पुराने समय से लोक विश्वास बना हुआ है कि विट्ठलदेव हर किसी भक्तजन की मनोकामना पूरी करते हैं व दुःख दारिद्र्य से मुक्ति दिलाते हैं।

अधगढ़ी है दैव प्रतिमा

यह भी एक चमत्कार ही है कि देश में विठला बावसी की मूर्ति ऐसी एकमात्र देव प्रतिमा है जो आधी गढ़ी हुई है। जबकि इसका आधा हिस्सा अनगढ़ा ही रह गया। किम्वदन्ती है कि यह मात्र एक रात्रि में गढ़ी गई। पहले यह विशाल प्रस्तर खण्ड के रूप में स्थापित थी और श्रद्धालु सिन्दूर-पानीये चढ़ा कर इसकी पूजा-अर्चना करते रहे हैं।

मनौतियाँ पूरी होने व जन-जन के कष्ट निवारण की वजह से इसका महत्त्व उत्तरोत्तर बढ़ता गया। बाद में शिलाखण्ड को मूर्ति का आकार दिये जाने की कोशिशें कई बार हुईं मगर कोई न कोई बाधा आ ही जाती।

मूर्ति गढ़ने का प्रयास करने वाले शिल्पी जैसे ही मूर्ति के सामने छैनी-हथोड़ी लेकर जाते, उनकी आँखें चुँधिया जातीं। कालान्तर में अनेक अनुष्ठानों एवं प्रार्थनाओं के बाद भगवान पसीजे और एक विशिष्ट मुहूर्त में मूर्ति गढ़ने की आज्ञा इस शर्त पर दी कि इस काम को एक रात में ही पूरा किया जाए व कोई दूसरा इसे देख न पाए।

इसी आदेश के अनुसार शिल्पी ने अपना काम शुरू किया लेकिन रात के अंतिम प्रहर में ‘टक-टक’ की आवाजें सुनकर कोई मन्दिर के भीतर आ गया। इसके बाद मूर्ति को और गढ़ने का प्रयास किया गया पर विफल रहा। जो भाग मूर्ति आकार में गढ़ा गया वह विष्णु और शेष हिस्सा भैरव के रूप में प्रसिद्ध हो गया। इस घटना के बाद मूर्ति को गढ़कर पूरा करने का प्रयास कभी सफल नहीं हो सका।

जनश्रुति है कि एक बार मूर्ति गढ़ने का जबरन प्रयास किया गया तब छैनी लगते ही प्रतिमा के चरण तल से रक्त धारा बह निकली व शिल्पी की मृत्यु हो गई। आज भी यह मूर्ति अनगढ़ ही है। विट्ठलदेव का जो विशाल मन्दिर आज दिखाई देता है उसका निर्माण गुजरात के किसी राजा ने संतान प्राप्ति की कामना पूरी होने पर करवाया।

अघोरियों और सिद्ध साधकों का धाम

महामारियों के निवारक देव के रूप में भी विट्ठलदेव प्रसिद्ध हैं। मन्दिर के सामने ही पाषाण चबूतरे पर चार फीट ऊँचा मोटाई लिये हुए प्रस्तर स्तम्भ है। जब भी वनाँचल में महामारियों का प्रकोप होता या प्राकृतिक आपदाएँ आ जातीं, प्राचीन काल में पशु बलि चढ़ा कर रक्त रंजित मुण्ड विठला बावसी के सामने इस खम्भे पर रख कर वाममार्गीय अनुष्ठान होते।

पुरातन काल में यह सारा क्षेत्र दक्षिण मार्ग एवं वाम मार्गी साधनाओं का समन्वित केन्द्र रहा है जहाँ बड़ी संख्या में अघोरियों, सिद्ध संतों, श्मशान साधकों आदि ने महत्त्वपूर्ण साधनाएँ कीं। पाण्डवों ने यहाँ विहार किया। राजा-महाराजाओं के समय गुप्त तांत्रिक साधनाओं एवं अभिचार कर्मों, ख़ासकर भैरव साधना के लिए विठला बावसी की शरण ली जाती रही है।

विठला बावसी को सब चढ़ता है

सात्त्विक हो या तामसिक उपासना, विठला बावसी के लिए सब बराबर और स्वीकार्य है। इसी वजह से पुरातन काल से यह कहावत चली आ रही है कि ‘विठला बावसी ने सब सडे़’ अर्थात् विट्ठलदेव को सब चढ़ता है। लोग अपने-अपने हिसाब से इनकी उपासना करते हैं। आज भी मांसाहार एवं शराब के आदि हो चुके लोगों के लिए यह व्यंग्य कसा जाता है- ‘विठला बावसी ने सब सडे़’ अर्थात ऐसे व्यक्ति को सब चलता है। यह भी उक्ति प्रसिद्ध है कि ‘विटिक देव ने वीये वन सड़े’’ यानि कि विट्ठलदेव को बीसों चीजें चढ़ती हैं।

इस क्षेत्र को लीला गढ़ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पाक शाला, धर्म शाला, यज्ञ कुण्ड एवं मण्डप, विश्राम गृह आदि हैं। मन्दिर के सामने ही बहने वाली नदी मे भरी गर्मियों में भी जलप्रवाह बना रहता है। समग्र क्षेत्र रमणीय परिवेश के कारण अविस्मरणीय आह्लाद वृष्टि का केन्द्र है।

चर्म रोगों से मुक्ति देते हैं वेजा बावसी

विठला बावसी के मन्दिर के सामने ही कुछ दूरी पर पहाड़ पर ‘वेज़ा बावसी’ का स्थानक है। यहाँ विठला बावसी के बराबर ही ऊँची लाल सूर्ख चट्टान को वेज़ा बावसी के रूप में पूजा जाता रहा है। इन्हें भी भैरव स्वरूप तथा विठला बावसी के अनुज के रूप में मान्यता प्राप्त है।

लोक मान्यता है कि नदी में स्नान तथा वेज़ा बावसी की बाधा लेने से फोड़ा-फुंसी तथा अन्य प्रकार के चर्मरोगों से मुक्ति मिनती है। सारे क्षेत्र में वसुन्धरा भू-गर्भीय खनिजों से भरी पड़ी है। ख़ासकर मार्बल, डोलोमाईट के भण्डार लिए विराजमान हैं- विठला बावसी। लोगों का विश्वास है कि यहाँ सम्पत्ति का अकूत भण्डार कहीं दबा पड़ा है।

जंगल में मंगल का दिग्दर्शन कराता है मेला

जाने कितने दशकों से पौष पूर्णिमा पर लगने वाला दो दिवसीय मेला वनवासियों का श्रद्धा अभिव्यक्ति पर्व है जिसमें वागड़ के कोने-कोने से, मेवाड़, काँठल और समीपवर्ती गुजरात एवं मध्यप्रदेश के पड़ोसी जिलों से भारी संख्या में वनवासी मेलार्थी आते हैं।

मेले में बाजार, मनोरंजन संसाधन, धार्मिक स्वर लहरियाँ आदि सब कुछ मिलकर ‘जंगल में मंगल’ के विविध पक्षों को अच्छी तरह चरितार्थ करते हैं। मेलार्थी यहाँ नदी में स्नान-ध्यान के बाद विठला बावसी एवं वेज़ा बावसी के दर्शन-पूजन कर श्रीफल वधेरते व प्रसाद चढ़ाते हैं। मेलार्थी एक-दो रात यहाँ रुक कर मेले का पूरा-पूरा लुत्फ उठाते हैं और साल भर खुशहाली एवं आनंद का आशीर्वाद पाकर घर लौटते हैं।

रात भर होती है रास लीला

पौष पूर्णिमा की चरम यौवन पर नेह बरसाती चाँदनी, सरसराती शीतल बयारेंं और मेले के रंग-रस मिल कर वातावरण में महा-आह्लाद की रह-रहकर बरसात करते रहते हैं। रात भर मेला अपने यौवन पर रहता है। रास लीला के मनोहारी दृश्य हजारों लोगों को भोर होने तक बाँधे रहते हैं।

मुग्ध कर देती है मनोहारी माववाणी

इस दौरान अवतारी पुरुष संत मावजी महाराज की वाणियों का गायन, लीलाओं का स्मरण और कृष्ण-गोपियों की संवाद श्रृंखला का क्रम निरन्तर बना रह कर श्रद्धा और प्रेमसिक्त भक्ति का ज्वार उमड़ाता है। इसके पास ही मनोरम प्रकृति के बीच नीलकण्ठ शिवालय है जहाँ जाकर मेलार्थी दर्शन करते हैं। युगों से यह वनवासी तीर्थ जन-जन में आस्था, सामाजिक चेतना और लोक मंगल का केन्द्र बना हुआ है।