भक्ति का पाखण्ड छोड़ें, असली भक्ति का आश्रय पाएं


भगवान के फोटो/वीडियो पोस्ट करना भक्ति नहीं बल्कि पाखण्ड है जो यह सिद्ध करता है कि प्रभु हमारे हृदय में नहीं हैं बल्कि हम ही भटकते हुए उन्हें जगह-जगह ढूंढ़ रहे हैं। प्रभु और भक्ति तथा साधना-उपासना पूरी तरह हृदय के विषय हैं।
जैसे-जैसे भक्ति बढ़ती है, भगवान की कृपा और विभूति का अनुभव होता है, साधक बाहरी प्रपंचों और व्यवहारों को त्याग कर अपने भीतर ही भीतर डूबता चला जाता है और वहीं उसे परमात्मा के दर्शन तब होते हैं जब भक्त और भगवान के बीच न कोई वस्तु हो, न व्यक्ति, और न ही किसी प्रकार का कोई व्यवहार या हलचल।
भगवान के फोटो और वीडियो पोस्ट कर भक्ति दर्शाना केवल और केवल पाखण्ड है। यह भीड़ का मौलिक स्वभाव है। जब तक मनुष्य भीड़ का हिस्सा और भेड़चाल का अनुगामी बना रहता है तब तक उसे न भगवान मिल सकते हैं, न सिद्धि। इस प्रकार के लोग जीवन भर असन्तुष्ट, अतृप्त और उद्विग्न बने रहते हैं और मृत्यु के उपरान्त भी गति-मुक्ति नहीं हो पाती।
फुरसत निकाल कर ईमानदारी से सोचें कि जो लोग भगवान के फोटो और वीडियो भेजकर रोजाना भक्ति का आडम्बर करते हैं उनमें से कितने ऎसे हैं जिन्हें परमात्मा की कृपा, सिद्धि या आत्मतोष प्राप्त हो पाया है। शायद शून्य ही शून्य। फिर भला क्यों हम लोग भीड़ का स्वभाव अपना कर पाखण्ड में रमे रहते हैं।
अच्छा हो कि परमात्मा का चिन्तन करें, ईष्ट के किसी न किसी एक छोटे से मंत्र का आश्रय प्राप्त कर इसके अधिकाधिक संख्या में निरन्तर जप करें और बाहरी मायावी पाखण्ड और दिखावों को छोड़कर एकनिष्ठ भाव से ऎसा चिन्तन-मनन और ध्यान करें कि जहाँ हमारे और भगवान के बीच कोई भी तीसरा व्यक्ति या किसी भी प्रकार का तीसरा पदार्थ न हो, तभी सूक्ष्मतर भावों की प्रगाढ़ स्थिति पाकर हमें भगवत्प्राप्ति हो सकती है।
इस तथ्य को स्वयं भी समझें और दूसरों को भी समझाएं। अपना अमूल्य समय बचाएं और दूसरे लोगों के समय की भी कद्र करें। धर्म और भक्ति के मूल मर्म को आत्मसात करें और अपने कल्याण का मार्ग प्राप्त करें।
