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साहित्य
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ये लाल रंग, कब हमें छोड़ेगा

Deepak Acharya
Deepak Acharya
December 30, 2021
ये लाल रंग, कब हमें छोड़ेगा

कुछ दशकों पहले तक लालफीताशाही शब्द खूब प्रचलन में था। इसके बाद इसी गर्वीले सुकून और समृद्धि मार्ग को गौरवान्वित करने वाले नए-नए और असरकारी शब्दों ने इसे गौण कर भुला दिया। आज भी बस्ते इसी प्रकार लाल होते हैं। यह रंग ही ऎसा है। किसी को भी लाल सूर्ख कर सकता है, गालों और चेहरे से लेकर घर-परिवार तक को लाली दे सकता है, वहीं किसी को भी लाल कर सकता है।

ठेठ देहाती अंदाज में कहें तो यह किसी की भी लाल कर सकता है, बत्ती करने से लेकर बत्ता तक करने में समर्थ है। अब लालफीताशाही के बदले बहुत बड़े-बड़े शब्द आ गए हैं क्योंकि कभी लाल फीते दिखते हैं और कभी बिना फीतों के ही सब कुछ होने लगा है। भीतर सारे के सारे ऎसे ही हैं कि फीते की जरूरत तक नहीं पड़ती। अपनी-अपनी सुविधा, अपना-अपना सुख, सहजता और तीव्रता का मामला है। ये अन्दर की बात है।