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साहित्य
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धर्म के मर्म को आत्मसात करें, तभी आत्म कल्याण संभव

Deepak Acharya
Deepak Acharya
February 8, 2025
धर्म के मर्म को आत्मसात करें, तभी आत्म कल्याण संभव

धर्म के मर्म को समझे बिना जीवन की सार्थकता और आत्म कल्याण संभव नहीं है। अतः चित्त की शुद्धि और पवित्रता के भाव पैदा करने का प्रयास सर्वोच्च प्राथमिकता से होना चाहिए। जिस हृदय में पवित्रता की सरिता प्रवाहित होती है वहां से ही कल्याण का मार्ग शुरू होता है।

जीवन में दो अवस्थाएं होती हैं - एक संतोष की तो दूसरी असंतोष की । एक आनंद की तो एक ईर्ष्या की, एक सुख की तो एक दुःख की। व्यक्ति दुखः, संकट, रोग आदि समय में परमात्मा को याद करता है, लेकिन सुख में वह परमात्मा को विस्मृत कर जाता है। परमात्मा अगोचर है, लेकिन हृदय में श्रृद्धा भाव से याद किया जाए तो उसकी अनुभूति सहज ही हो जाती है।

व्यक्ति परमात्मा से भौतिक सुखों की कामना करता है, जो कि क्षणिक होते हैं। परमात्मा से यदि मांगना ही है तो आध्यात्मिक सुख और स्वयं परमात्मा को ही मांग लिया जाए, जिससे जीव से लेकर जगत और आत्मा तक का कल्याण अवश्यम्भावी होता है।

इस भौतिक युग में व्यक्ति दूसरों के लिए ईर्ष्या भाव रखते हैं, जिससे आनंद उससे दूर हो जाता है। अतः चित्त को सदैव परमात्मा की भक्ति में लगाना चाहिए और हरेक के प्रति कल्याण की कामना करनी चाहिए।

गुलाब काँटों से घिरा रहता है लेकिन वह दूसरों को सदैव मुस्कारहट रूपी महक देता है। ठीक उसी तरह व्यक्ति को संघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में दूसरों के प्रति सद्भाव अपनाने चाहिए तभी जीवन रूपी बगिया अपनी पहचान स्थापित करेगी, जहाँ आकर हर कोई आनन्द की अनुभूति करेगा।

हमें सद्मार्ग पर चल कर अपना जीवन सफल बनाना होगा और दूसरों के दुःखों को बांटना होगा।