
महामारी का ताण्डव हो या मौत का सिलसिला। हमारी संवेदनाएं, मानवीय मूल्य और नैतिक आचरण सब कुछ पलायन करते जा रहे हैं। वैश्विक महामारी से मुक्ति पाने चाहे लाख जतन किए जाएं, कितनी ही पाबन्दियां लगाई जाएं, आत्म अनुशासन और संयम के चाहे कितने पाठ पढ़ाए जाएं, दिन-रात हमारे कानों में माईक से लगातार कितना ही कुछ ठूँसा जाता रहे, मगर हम हैं कि मौजूदा विषमताओं, भयावह संकट और आसन्न काल के दौर में भी कुछ मानने को तैयार नहीं हैं।
हम वही कुछ कर रहे हैं जो हमारा मन करता है। इतनी सारी पाबन्दियों की यदि हरेक इंसान ईमानदारी से स्वप्रेरणा के साथ पालन करता तो आज परिदृश्य कुछ अलग ही होता। लेकिन हम हैं कि कुछ मानने या अपनाने को तैयार ही नहीं हैं।
चाहे लॉक डाउन लगाया हो या कफ्र्यू, या फिर और कुछ। हर बार देखा गया है कि हम स्वयं स्फूर्त प्रेरणा से कुछ करना चाहते ही नहीं, आदेशों, निर्देशों और नियमों का उल्लंघन करने वालों की हमारे यहाँ कोई कमी नहीं हैं।
सब तरफ स्वेच्छाचारियों की भरमार नज़र आ रही है और इन पाबन्दियों की पालना करने-कराने के लिए बहुत बड़ी संख्या में मानव संसाधन लगाना पड़ रहा है। कई लोग अपनी हेंकड़ी को जताने के लिए घूमने को ही जिन्दगी समझ बैठे हैं।
इंसानों को मर्यादित रखने के लिए इंसानों को लगाना पड़ रहा है। अपने-अपने बाड़ों से बिना किसी काम के तफरी के लिए बार-बार बाहर निकल पड़ने वाले लोगों को समझा-बुझाकर और सख्ती कर वापस घरों की ओर लौटाना पड़ रहा है।
कोई क्षेत्र ऎसा नहीं होगा जहाँ इस तरह के आवारा इंसानों की न्यूनाधिक संख्या न हो, जिनके साथ पशुओं की तरह बर्ताव किया जाकर घरों में भेजना पड़ रहा हो। हम सभी लोग बेचारे मूक पशुओं को आवारा कहकर उनकी तोहीन करते रहे हैं जबकि आवाराओं की असली जनगणना का समय तो अब आया है।
सामाजिक प्राणी कहे जाने वाले लोगों को बाड़ों में बंद रखने के लिए बेरिकेडिंग करनी पड़े, दूरी बनाए रखने को कहना पड़े, हिदायतों का पालन करने के लिए बार-बार याद दिलाना पड़े, इसे क्या कहा जाए।
इन हालातों ने हमारे इंसान होने पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। मानवीय संवेदनाओं के साथ सेवा और परोपकार के लिए तन-मन और धन को लगाने की जहाँ जरूरत है वहाँ मजबूरियों का फायदा उठाकर मुनाफा कमाने का भूत सवार है।
दवाइयों, इंजेक्शन और ऑक्सीजन के नाम पर कई लोग लूटमारी करने में पीछे नहीं रहे, साहूकार कहे जाने वाले कई व्यापारी चोरी छिपे दुकान खोलकर कारोबार करते हुए कई गुना दामों पर सामान बेचने में भिड़े होने की खबरें आ रही हैं।
ये सारी स्थितियां यही बताती हैं कि हम आवाराओं और अवसरवादियों का ईलाज डण्डे के बल पर ही हो सकता है। कारण यह भी हो सकता है कि पूर्वजन्म की हमारी पशुता रह-रहकर हमें याद आ जाती है या कि आवारागिर्दी का हमारा मौलिक और जन्मजात हुनर हमें घर पर रहने नहीं देता, बार-बार सड़कों पर भटकने, दुकानों के आगे, पाटों, चौराहों, सर्कलों आदि पर बैठकर गपियाने और दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ में नष्ट कर देने के लिए पे्ररित और विवश करता रहा है।
इन हालातों में हम आवाराओं और पशुबुद्धि के साथ जीवन व्यवहार चलाने वाले लोगों के लिए डण्डादेव ही एकमात्र प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं। पिछले डेढ़-दो साल से चल रहे हालातों ने तो यही सिद्ध किया है कि बिना डण्डों के हम मानने वाले नहीं।

