सदियों पुरानी परम्परा में वसन्तोत्सव की धूम,वनवासी भगतों का इन्द्रधनुषी ध्वज ही चढ़ता है हरि मन्दिर पर


कल्कि अवतार वाले मन्दिर में अनूठे आयोजनों से होता है माघ महोत्सव का श्रीगणेश
आम्र मंजरियों की मादक महक, फूली-पीली सरसों से लहलहाते खेत, कोयल की कूक और मनोहारी नैसर्गिक परिवेश के बीच वनाँचल में वसंत उत्सव हर कहीं उल्लास के साथ मनाया जाता है। देवी सरस्वती के आह्वान और पूजन-अर्चन के इस परम्परागत उत्सव पर वासन्ती हवाएँ तन-मन को आह्लादित कर देती हैं।
चतुर्दिक आनन्द और उमंग की भावभूमि
अन्य पर्वों और उत्सवों की तरह वसंतोत्सव भी वनवासी अंचल वागड़ में अनूठे अंदाज से मनाया जाता है। शिक्षालयों में देवी शारदा का पूजन, वासन्ती परिधानों का प्रचलन और “पाटी-प्रेम“ तथा पुस्तक पूजा के साथ ही करोड़ों श्रृद्धालुओं की अगाध आस्था के केन्द्र अलौकिक संत मावजी महाराज की जन्मस्थली साबला(डूंगरपुर जिला, राजस्थान) में प्राचीन समय से वसंतोत्सव वनवासी भगतों का अनूठा उत्सव रहा है।
वैश्विक तीर्थ है हरि मन्दिर
जन-जन की अगाध श्रृद्धा का यह धाम बाँसवाड़ा-उदयपुर मार्ग पर साबला कस्बे में है। यहीं पर हरि मन्दिर है जिसे निष्कलंक सम्प्रदाय का वैश्विक पीठ कहा जा सकता है, जहां भगवान श्री निष्कलंक की सुन्दर प्रतिमा है। दुनिया के आश्चर्यों में से एक यह धाम भी है जहां उन कल्कि अवतार भगवान श्री निष्कलंक की पूजा सदियों से हो रही है, जिनका अवतार कलियुग में होना है।
मावजी महाराज के तपस्या स्थल के रूप में जगविख्यात इस हरि मन्दिर में हर वर्ष बसंत पंचमी पर आयोजित होने वाले परंपरागत वसंतोत्सव में दूर-दूर से भगत हिस्सा लेते हैं। ये भक्त ज्ञानोपदेश देकर जीवन धन्य करने वाले अलौकिक लीलावतार मावजी महाराज एवं देवी शारदा के प्रति अगाध आस्था व्यक्त करते हैं।
गुरुपूजा उत्सव
वसंत पंचमी को हरि मन्दिर पर होने वाले इस उत्सव को ध्वजारोहण एवं गुरुपूजा उत्सव भी कहा जाता है। इस दिन जनजाति बहुल डूंगरपुर जिले के ठेठ आदिवासी अंचल सुराता पाल क्षेत्र के भक्तों का समूह प्रभात में वहां के महंत महाराज के नेतृत्व में भजन-कीर्तन करता हुआ हरि मंदिर पहुँचता है।
इन भक्तों की मौजूदगी में बेणेश्वर पीठाधीश्वर गोस्वामी श्री अच्युतानन्द जी महाराज द्वारा भगवान निष्कलंक की मूर्ति सहित अन्य देव प्रतिमाओं का विशेष श्रृंगार एवं पूजन होता है।
इस अवसर पर मेधा की देवी सरस्वती एवं बेणेश्वर धाम के तमाम पूर्ववर्ती पीठाधीश्वरों का स्मरण किया जाता है।
आम आदमी की भावनाओं को महत्व देने वाले संत मावजी के काल से ही यह परम्परा चली आ रही है कि हरि मन्दिर पर हर साल वसन्त पंचमी को ध्वज वनवासी भक्तों की ओर से ही चढ़ाया जाता है। इसी दिन से माघ महोत्सव की शुरूआत हो जाती है और बेणेश्वर महामेले की गतिविधियों का श्रीगणेश होता है।
माव महल पर सप्तरंगी ध्वजारोहण
गाँव-गाँव से आए भगत मावजी की आगम वाणी का गान करते हुए बेणेश्वर धाम के पीठाधीश्वर गोस्वामी महंत श्री अच्युतानंद जी महाराज के दर्शन कर चढ़ावा चढ़ाते हैं तथा थोड़ी देर विश्राम के बाद शुभ मुहूर्त में शुरू होता है परंपरागत ध्वजारोहण समारोह।
स्वस्तिवाचन मंत्रों एवं विजय मंत्रों के बीच पीठाधीश्वर महंत अच्युतानंद जी महाराज हरि मन्दिर के मुख्य द्वार पर स्थित “माव महल“ पर वनवासी भगतों द्वारा लाई गयी सात रंगों वाली धर्म ध्वजा (निसान) चढ़ाते हैं।
वसंत के उल्लास एवं लोक जीवन में वासन्ती रंगों के आवाहन के प्रतीक रूप में इस पर आम्र मोर (मंजरियाँ) चढ़ाया जाता है। समूचा परिवेश इस वक्त “मावजी महाराज नी जै“, “निकलंग बावसी नी जै “ और ‘जय महाराज’ के उद्घोषों से गूंज उठता है।
पीठाधीश्वर गोस्वामी महन्त श्री अच्युतानंद जी महाराज इस दिन मावजी महाराज द्वारा लिखित एवं हरि मंदिर में रखे “साम सागर“ नाम चौपडे का पूजन करते हैं। इस चौपड़े में मुख्य रूप से सचित्र भविष्यवाणियों, भौगोलिक एवं परिवेशीय परिवर्तनों के संकेत, गीता ज्ञानोपदेश आदि समाहित है।
भक्तों के लिये महंत की ओर से वसंत पंचमी को विशेष रुप से स्थानीय पकवान ’शीरा(हलवा)’ युक्त महाप्रसाद(भोजन) की परम्परा विद्यमान रही है। विभिन्न अनुष्ठानों के बाद महंतश्री के प्रवचन होते हैं। इन कार्यक्रमों की पूर्णाहुति के बाद सुराता पाल क्षेत्र से आए भक्तों के समूह को आदर सहित विदा किया जाता है।
