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साहित्य
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शून्यकाल को स्वर्णकाल बनाएं

Deepak Acharya
Deepak Acharya
May 3, 2021
शून्यकाल को स्वर्णकाल बनाएं

जब प्रकृति रूठ जाए, प्राकृतिक आपदाएं आसन्न घेरे हुए हों, चारों तरफ दैहिक, दैविक और भौतिक तापों का माहौल हो, बाहरी पाबंदियां लगी हों, तब इंसान को इस तरह मर्यादित व्यवहार करना चाहिए कि जिससे मर्यादाओं का व्यतिक्रम न हो, लक्ष्मण रेखाएं लांघने का दुस्साहस न किया जाए,, हर कोई अपनी-अपनी सीमाओं में सिमटा रहे। और किसी भी एक के कारण दूसरे या समुदाय को कोई कष्ट न पहुंचे।

यह दैव दुर्लभ समय अपने आप में इंसान को इंसान की तरह रहने और इंसान बनकर दिखाने का महान अवसर है। आज पूरी दुनिया में यही सब चल रहा है। सब तरफ कठोर पाबंदियां लगाने की विवशता आन पड़ी है। हर एक से दूसरे को संक्रमण का भय है। और सबसे बड़ा भय है बेवक्त अनचाही मृत्यु का, बिना किसी गंभीर बीमारी के, आकस्मिक। और वह भी एक महीन वायरस से।

वर्तमान पीढ़ी ने शायद ही अपने सम्पूर्ण जीवन में ऎसा त्रासद मंजर कभी सुना या देखा हो, जैसा कि पिछले कुछ माहों से हम भुगत रहे हैं। जब इंसान ईश्वरीय सत्ता और प्रकृति के सम्मान को भूल जाता है तब हर सदी में ऎसा अक्सर होता ही है। इसे एक या दो पीढ़ियां नहीं समझ सकती।

यह समूचा संसार निहारने, भोगने और आनंद पाने के लिए है, कर्म की निरन्तरता के साथ श्रेष्ठता पाने के लिए है, जीव और जगत के कल्याण और मंगलकारी दिशा-दृष्टि की वृष्टि के लिए है। लेकिन हमने अपने अस्तित्व की नींव और अपने होने के अर्थ को कभी समझा ही नहीं, यही आज हो रहे अनर्थ का सबसे बड़ा और दुर्भाग्यजनक कारण है।

तभी यह बड़ी ही आसानी से कहा जाने लगा है कि ये इंसान ही है जिसके कारण से पशु-पक्षी और स्वयं इंसान भी खतरे में आ गया है। यही नहीं तो पूरी की पूरी प्रकृति और धरती भी स्वयं पीड़ित है।

हमने धरती पर आकर इतना अधिक और निर्मम, निर्लज्ज शोषण किया है कि धरती का रूप-रंग और कलेवर ही बिगाड़ कर रख दिया है। इंसान के बारे में कहा तो ये जाता है कि ये सामाजिक प्राणी है, किन्तु उसकी स्वेच्छाचारिता, उन्मुक्त व अमर्यादित व्यवहार और स्वार्थ से भरी हरकतों को देख कर अच्छी तरह अनुभव किया जा सकता है कि वह धरती पर सबसे बड़ा असामाजिक है।

इसकी एकाधिकारवादी हीन और मलीन हरकतों, साम्राज्यवादी सोच, हड़पाऊ और लूटेरी मनोवृत्ति, भ्रष्ट आचरण और अपने स्वार्थ के लिए औरों को किसी भी हद तक नुकसान पहुंचा देने की कुत्सित वृत्तियां ही हैं जिनके कारण आज इंसान और वर्तमानकालीन इंसानियत के नारों पर से विश्वास उठता जा रहा है।

सब तरफ निराशा और हताशा का माहौल इस कदर पसर गया है कि या तो आदमी में जीने की तमन्ना ही नहीं रही अथवा लोग उसे आसानी से जीने नहीं देते। इस मामले में बीते हुए सारे युगों के राक्षस इसी समय धरती पर सब जगह पैदा हो चुके अनुभवित होते हैं।

इन नर पिशाचों ने भूत-प्रेतों, जिन्नों, ब्रह्मराक्षसों और बैतालों तक को पीछे छोड़ दिया है। और यही वजह है कि लोग खुले तौर पर यह स्वीकार करने लगे हैं कि कलियुग का बुरा वक्त शुरू हो चुका है।

सब तरफ लूटमार, व्यभिचार, हिंसा, शराबखोरी, माँसाहार और भ्रष्टाचार का ताण्डव इस कदर हावी होता जा रहा है कि असली, सेवाभावी और परोपकारी इंसानों की प्रजातियां लुप्त होने लगी हैं। कुछ फीसदी बिरले ही बचे होंगे, जो अपने बारे में पूरे दमखम से कह सकते हैं कि वे इंसान हैं और इंसान की तरह उन्हें जीना आता है, जी भी रहे हैं।

पर अधिकांश तो यह कहने की स्थिति में भी नहीं हैं कि वे इंसान की तरह जीवनचर्या अपनाते हुए जी रहे हैं और उनमें मानवीय मूल्यों के संस्कार भरे हुए हैं। हम सभी किसी न किसी तरह के न्यूनाधिक अपराध बोध से भरे हुए हैं। हमारी आत्मा जानती है कि हमने कौन से अपराध किए हैं, कौन से अपराध कर रहे हैं और किन अपराधों की खिचड़ी हमारे दिमाग में पक रही है।

और यही सब कारण हैं जिनकी वजह से आज प्रकृति कुपित होकर हाथ धोकर हमारे पीछे पड़ी है। एक छोटे से वायरस ने हमें नज़रबन्द कर रखा है, हमारे सुख-चैन और आवाजाही छीन ली है, आम इंसान की तरह जिन्दगी जीने से भी दूर कर दिया है।

हमारे सारे अहंकार और गर्व को चूर-चूर कर दिया है और साफ-साफ बता दिया है कि हम कितने ही उच्च पदासीन, सम्राट, लोेकप्रिय और वैभवशाली, अधिकारसम्पन्न, परम शक्तिमान क्यों न हों, हमारी औकात कुछ नहीं।

बाहर के तमाम खतरों को देख कर ही पाबन्दियों के पहरे लगे हुए हैं फिर भी हम हैं कि सीमा रेखाओं को लांघने में आनंद का अनुभव करते हैं। हमारी टुच्ची आवारागिर्दी और लुच्चे-लफंगों की तरह भटकने की आदत के मारे सब लोग परेशान हैं, और हम हैं कि हमें न मृत्यु का भय दिख रहा है, न बीमारी का।

हो सकता है कि सस्ते मनोरंजन की बदौलत हमारा अनचाहा गर्भ समापन न हो पाया और अनायास जन्म हो गया हो, हमारे जीवन का कोई मूल्य या उपयोगिता भले न हो, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे लोगों का जीवन समाज, क्षेत्र और देश के लिए अमूल्य है और उनका जीवन सुरक्षित रहना ही चाहिए। पर हम नादान आवाराओं और स्वेच्छाचारी अहंकारियों के कारण उनका जीवन भी हम संकट में डालने से नहीं चूक रहे।

जिन्दगी भर हम अनुभवों में जीते हैं, अनुभवों से सीखते हैं और ऎसे में वर्तमान के शून्यकाल को भी हमेंं अपने जीवन में पूरी तरह ढालना होगा। संयम, सदाचार और सादगी को अपनाए बिना हम सहज, शान्त और आत्मतोषदायी जीवन नहीं जी सकते।

यह शून्य काल हमें चातुर्मास की तरह जीने की आदत डालने के लिए पर््रेरित करता है जहाँ शुचिता और सादगी के साथ आत्मचिन्तन का अवसर उपलब्ध है और इसका भरपूर उपयोग ज्ञानार्जन, साधना और नवाचारों, स्वाध्याय, लेखन, ध्यान, योग अथवा किसी दिव्य उपलब्धि को पाने के लिए करना चाहिए।

ऎसा शून्यकाल जीवन में चाहे जाने पर भी कभी नहीं आता। और हम हैं कि इसके महत्त्व को न समझ पा रहे हैं, न स्वीकार कर पा रहे हैं। उलटे उद्विग्न, असन्तुष्ट और अशांत बने हुए कभी भगवान को कोसते हैं, कभी समय को।

यह समय है अपने बारे में चिन्तन करने का कि आखिर प्रकृति ने हम पर कहर ढाया है तो हम भी इसके लिए कितने फीसदी दोषी हैं। इन दोषों के लिए प्रकृति और भगवान से क्षमायाचना करें, पुनरावृत्ति नहीं करने की शपथ लें और इंसान की तरह जीने की आदत डालें। ऎसा कर पाए तो ठीक है अन्यथा प्रकृति तो अपना काम करेगी ही।