पुरानी यादें - सच्ची बातें, अपनी-अपनी स्टाईल


बुजुर्गों के मुँह से सुनी जाने वाली पुरानी बातों में जीवन के अनुभवों, अर्जित ज्ञान और लोक व्यवहार से लेकर बहुआयामी जीवन प्रबन्धन के कई सारे गूढ़ रहस्य और सफलता के सूत्र छिपे होते हैं।
बीते समय की इन्हीं पुरानी बातों में बांसवाड़ा जिले की ही एक बात सत्तर के दशक की है। किसी जमाने मेंं भूखिया के नाम से चर्चित आनन्दपुरी क्षेत्र बांसवाड़ा जिले का वह इलाका है जो गुजरात राज्य से सटा हुआ है।
भूखिया का नाम बदलकर आनन्दपुरी रखने की भी अलग कहानी है। कुछ नाम सब जगह ऐसे होते हैं जिन्हें स्मरण करने से कहा जाता है कि उस दिन खाना भी नसीब नहीं होता। ऐसा ही कुछ दुर्योग भूखिया नाम के साथ था। कहा जाता है कि भूदान आन्दोलन के प्रणेता विनोबा भावे उन दिनों इस क्षेत्र में आए थे और वहां की नैसर्गिक रमणीयता के आनन्द को अनुभव कर उन्होंने लोक परम्परा में अभिशप्त कहे जाने वाले भूखिया का नाम बदलकर आनन्दपुरी कर दिया।
इसी आनन्दपुरी पंचायत समिति में विकास अधिकारी रहे हैं श्री ब्रजमोहन त्रिवेदी। बांसवाड़ा जिले में उन दिनों विकास अधिकारी के पद पर काम करने वाली तीन-चार हस्तियां ऐसी थीं जिन्हें बीडीओ साहब के नाम से ख्याति प्राप्त थी। वो पुराना जमाना जरूर था लेकिन काबिल अफसरों की कमी नहीं थी, जो निष्ठा और समर्पण भाव के साथ राज-काज का संपादन करते और जहां रहे वहां सफल प्रशासन और कर्मयोग की छाप छोड़ी।
इनमें श्री ब्रजमोहन त्रिवेदी, घनश्याम जोशी, देवशंकर त्रिवेदी और ध्रुवनारायण पाण्डेय का नाम लिया जाता है। और ये सारे ही राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री श्री हरिदेव जोशी के ख़ास घनिष्ठ महानुभावों में गिने जाते थे। इन सभी का अपनी तरह का विशिष्ट व्यक्तित्व और प्रभावी आभामण्डल था।
आनन्दपुरी की ही दशकों पुरानी बात है। और सारी कहानी है पंचायत समिति दफ्तर की। इस बारे में पंचायत समिति में कार्यरत रहे बाबू श्री बदामीलाल शाह ने पारस्परिक बातचीत के दौरान् यह रहस्योद्घाटन किया। श्री शाह समायोजन होने पर बाद में माही परियोजना में लाइजन ऑफिसर भी रहे।
उन्होंने उस दौरान् बताया कि वहां पंचायत समिति में विकास अधिकारी (बीडीओ साहब) ब्रजमोहन त्रिवेदी के समय कार्यालय प्रबन्धन बेहतर ढंग का रहा।
सामान्य पत्राचार और आदेशों के ड्राफ्ट तो मंत्रालयिक कार्मिक अपने स्तर पर बना कर प्रस्तुत कर दिया करते लेकिन अंग्रेजी में आने वाले पत्रों के उत्तर देना और इन पर कार्यवाही करना टेढ़ी खीर था क्योंकि उस समय स्टाफ अंग्रेजी के मामले में आमतौर पर अनभिज्ञ ही रहता था।
ऐसे में बीडीओ साहब श्री ब्रजमोहन त्रिवेदी अंग्रेजी में आने वाले पत्रों और आदेशों का उत्तर देने का काम स्वयं करते। वे अंग्रेजी भाषा के अच्छे जानकार होने से अंग्रेजी भाषा पर उनकी गहरी पकड़ थी।
बीडीओ साहब अपने दफ्तर में आने वाले कागजातों को सलीके से रखने के आदी थे। बीडीओ साहब ने इसके लिए अपने चैम्बर की टेबल पर कागजात रखने की 2 ट्रे रखी हुई थी। इन दोनों की अपनी ख़ासियत थी।
जो भी पत्रादि कागजात आते, उन्हें छांट कर अलग-अलग रख दिया जाता। एक में हिन्दी वाले पत्र जिनका जबाव स्टाफ के स्तर पर ही तैयार हो सकता था या जिन पर सामान्यतया नियमित कार्यवाही होनी होती थी। दूसरी ट्रे में अंग्रेजी भाषा में आने वाले कागजात रखे जाते।
इसका मूल कारण यह था कि नीचे का स्टाफ आमतौर पर अंग्रेजी में काम करने का वाकिफ नहीं था इसीलिये हिन्दी व अंग्रेजी के पत्रों को अलग-अलग ट्रे में रखा जाता। जब निस्तारण करना होता, तब बाबू से पूछ लेते कि किस भाषा का पत्र है।
अंग्रेजी भाषा वाले पत्रों का जवाब तैयार करने का काम वे स्वयं करते क्योंकि अंग्रेजी भाषा पर उनकी गहरी पकड़ थी। इस व्यवस्था से सब खुश। सरकारी काम भी अपने हिसाब से चलता रहता। यह बताते चलें कि इस पूरी कथा में वर्णित सभी महानुभाव अब इस दुनिया में नहीं हैं।
