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जीवन में आशातीत सफलता पाने सूर्य साधना अपनाएँ

Deepak Acharya
Deepak Acharya
June 6, 2021
जीवन में आशातीत सफलता पाने सूर्य साधना अपनाएँ

सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं जो बुद्धि, ओज-तेज, नेत्र और तेजस्वी व्यक्तित्व प्रदान करने वाले दैव के रूप में पूजे जाते हैं। शेष सभी देवी-देवताओं की पूजा-उपासना मूर्तियों में की जाती है जबकि सूर्य का दर्शन और अनुभव हमें हमेशा प्रत्यक्ष रूप में रोजाना होता है। भगवान सूर्यनारायण के दर्शन और उन्हें नमस्कार करने मात्र से वे प्रसन्न हो जाते हैं।

आदित्य हृदय में कहा गया है - आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने-दिने, जन्मान्तरसहस्त्रेषु दारिद्रयं नोपजायते। ( अर्थात जो व्यक्ति हर रोज भगवान भास्कर को प्रणाम करता है उसे हजारों जन्मों भी दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता। )

भगवान सूर्यनारायण की साधना प्रत्येक मनुष्य को करनी चाहिए। इससे बुद्धि और नेत्र ठीेक रहते हैं, ओज-तेज के साथ अपने व्यक्तित्व का आकर्षक एवं मुग्धकारी प्रभाव दिखने लगता है। सभी प्रकार के आरोग्य, सुख-समृद्धि के द्वार खुलने के साथ ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। सूर्य उपासना से जातिस्मरता अर्थात् पूर्वजन्मों की बातों को जान लेने की क्षमता विकसित होती है। पूर्वाभास होने लगता है। सभी प्रकार के इहलौकिक एवं पारलौकिक लक्ष्यों में आशातीत सफलता प्राप्त होती है। यों भी सनातन धर्मियों के लिए नित्यप्रति पंचदेव उपासना का विधान है और इनमें सूर्यदेव भी शामिल हैं। इस दृष्टि से सूर्य उपासना किसी न किसी रूप में हम सभी को करनी ही चाहिए।

सूर्य उपासना से व्यक्ति का जीवन हर तरह से आलोकित रहता है। इसके लिए पहली शर्त यह है कि साधक का जागरण सूर्योदय से पूर्व ब्रह्ममुहूर्त में अर्थात् प्रातःकाल 4 से 5 बजे के बीच हो जाना चाहिए। जो भी व्यक्ति सूर्योदय से पहले उठ जाते हैं उनके घर-परिवार पर सूर्य की कृपा बनी रहती है। इसके विपरीत जो लोग सूर्योदय के समय व बाद तक सोये पड़े रहते हैं उनके जीवन में समस्याएं बनी रहती हैं, आँखों के व अन्य रोग हो जाते हैं, दृष्टि विकार के साथ ही चेहरे की चमक-दमक और शरीर का आरोग्य निरन्तर क्षरित होता रहता है। सूर्योदय से पूर्व बिस्तर त्याग देने वाले लोेग लम्बी आयु पाते हैं जबकि सूर्योदय के समय नींद निकालते रहने वाले लोग अपनी कुल आयु से 20 वर्ष पूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

सूर्य के प्रत्यक्ष प्रभाव को बहुत कम दिन में ही अनुभव करना हो तो सूर्योदय से पूर्व स्नान कर लें और उदयकालीन सूर्य की ओर एकटक दृष्टि जमाकर ॐ सूर्याय नमः अथवा किसी भी अन्य सूर्य मंत्र से प्राणायाम करें। इसमें पूरक, कुंभक और रेचक तीनों ही क्रियाओं को सूर्य मंत्र से करें। फेफड़ों में साँस भरी रखकर सूर्य बिम्ब पर त्राटक करते हुए सूर्य मंत्र के जप करें। इसी प्रकार साँस को बाहर ही रोक कर त्राटक के साथ सूर्य मंत्र के जप करें। ज्यादा जोर न दें, यथाशक्ति ही करें जितना समय कर सकते हैं। 2-4 मिनट का यह प्रयोग करने के बाद सामान्य स्थिति में आकर सूर्य बिम्ब को एकटक देखते रहें। इसके साथ ही सूर्य भगवान को अघ्र्य भी अर्पित करें।

इससे ऎसा अनुभव होगा कि सूर्य बिम्ब और हमारे शरीर के मध्य रश्मियों का सीधा संबंध स्थापित हो गया है तथा सूर्य की ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश कर रही है। यह भी अनुभव में आएगा कि हमारे शरीर के चारों तरफ एक दिव्य आभा मण्डल(ओरा) का निर्माण हो रहा है। कुछ दिन तक लगातार यह प्रयोग करते चले जाने से विलक्षण अनुभूति होगी और यह पक्का विश्वास हो जाएगा कि सूर्य भगवान की ओर से हमारे शरीर को दिव्य कवच प्राप्त हो गया है। इस साधना को निरन्तर जारी रखने से सूर्य भगवान की कृपा और चमत्कारों को देख कर अभिभूत हो उठेंगे।

कुछ माह के लगातार प्रयोग से प्रकृति और शरीर के मध्य ऎसा सीधा संतुलन कायम हो जाएगा कि न शीतकाल में सर्दी लगेगी, न भीषण गर्मियों में गरमी का अहसास। इसके साथ ही दिन में किसी भी सूर्य मंत्र की 11 माला कर ली जाए तो एक समय बाद यह स्थिति भी आ सकती है कि जब भूख-प्यास लगे तब सूर्य की ओर मुख करके भगवान से निवेदन करें, अपने आप भूख-प्यास मिट जाएगी और शरीर तरोताजा एवं ऊर्जावान् बना रहेगा।

सूर्य साधना की यह अवस्था आने पर कोई सा काम हो, भगवान भास्कर को प्रणाम कर उन्हें निवेदन कर दें, स्वतः होने लगेगा। यहाँ तक कि हजारों किलोमीटर बैठे किसी व्यक्ति को कोई संदेश पहुंचाना हो तो सूर्य के सम्मुख जोर से संदेश बोल दें। अगला व्यक्ति जैसे ही सूर्य के प्रकाश के सम्पर्क में आएगा, उस तक वह संदेश अपने आप पहुँच जाएगा। सूर्य साधना के और अधिक प्रखर एवं तीव्र होने की स्थिति में सूर्य के सम्मुख सूर्य मंत्र से हवन करने पर धूम्र मार्ग से उसका प्रभाव लक्ष्य तक पहुंचने लगेगा। विद्यार्थियों और बौद्धिक कार्य करने वालों के लिए सूर्य भक्ति वरदान ही है। इससे बुद्धि प्रखर होती और हर परीक्षा में साधक खरा उतरता है।

जिन लोगों को आँखों के रोगों से मुक्ति पानी है, चेहरे का लावण्य और सुन्दरता चाहिए, समाज-जीवन के हर क्षेत्र में प्रभावोत्पादक आकर्षण की कामना हो, रोग मुक्त और खुशहाल जीवन चाहते हों, उन्हें सूर्य भगवान की उपासना को अपनी नित्य प्रति की पूजा में शामिल करना ही चाहिए। प्रत्यक्ष देवता सूर्य की साधना को अंगीकार करें और जीवन लक्ष्यों में आशातीत सफलता पाएं। सूर्योपासना से जीवन और जगत की सभी प्रकार की कामनाओं को पूर्ण किया जा सकता है।

जीवन और जगत के तमाम प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया और घातक वायरस को समूल नष्ट करने की क्षमता सूर्य में ही है। वर्तमान काल में सूर्य उपासना से अपने शरीर के चारों ओर सूर्य की मंत्र शक्ति से कवच बनाकर परिवेशीय बीमारियों और महामारियों से अपने आपको सुरक्षित रखा जा सकता है।

अथ शिवप्रोक्तं सूर्याष्टकम्

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥ 1॥

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्। श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यम् प्रणमाम्यहम् ॥ 2॥

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम्। महापापहरं देवं तं सूर्यम् प्रणमाम्यहम् ॥ 3॥

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम्। महापापहरं देवं तं सूर्यम् प्रणमाम्यहम् ॥ 4॥

बृहितं तेजःपुञ्जं च वायुमाकाशमेव च । प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यम् प्रणमाम्यहम् ॥ 5॥

बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् । एकचक्रधरं देवं तं सूर्यम् प्रणमाम्यहम् ॥ 6॥

तं सूर्यम् जगत्कर्तारं महातेजः प्रदीपनम् । महापापहरं देवं तं सूर्यम् प्रणमाम्यहम् ॥ 7॥

तं सूर्यम् जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् । महापापहरं देवं तं सूर्यम् प्रणमाम्यहम् ॥ 8॥

इति श्री शिवप्रोक्तं सूर्याष्टकमं सम्पूर्णम्