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भगवत्कृपा के लिए मानसोपचार सर्वोपरि

Deepak Acharya
Deepak Acharya
September 12, 2021
भगवत्कृपा के लिए मानसोपचार सर्वोपरि

धर्म-कर्म और भक्ति का सीधा संबंध भावना से होता है। जिस कर्म या भक्ति में अगाध श्रद्धा, भगवान के प्रति अनन्य भावना, निष्ठा तथा समर्पण की सम्पूर्णता होती है, उसी में आशातीत सफलता प्राप्त हो पाती है अन्यथा भक्ति और ईश स्मरण से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों में भौतिक पदार्थ, मुद्रा और वैयक्तिक अहमन्यता का कोई अस्तित्व या प्रभाव नहीं होता।

यह केवल अपने आपको धार्मिक या भगत मानने-मनवाने और जगत को दिखाने भर के लिए है अन्यथा भगवान की सर्वोपरि भक्ति वह है कि जिसमें किंचित मात्र भी किसी भौतिक वस्तु या रुपए-पैसे आदि का उपयोग न हो। अनाप-शनाप द्रव्यों के साथ साधना-उपासना या भक्ति भले की जाए, ऎसी भक्ति यदि भाव शून्य है तो इसका कोई अर्थ नहीं है, यह केवल दिखावा, आडम्बर और पाखण्ड ही है।

ऎसा करने वाला आत्ममुग्ध होकर अपने अहंकारों की नाव पर सवार रहने का एकतरफा सुकून प्राप्त कर सकता है, जगत मेंं अपने आपको महान भक्त के रूप में प्रचारित कर या करवा सकता है किन्तु ऎसी भक्ति कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकती।

वास्तविक भक्ति और साधना वह है जिसमें भक्त और भगवान के बीच कोई भी तीसरा व्यक्ति या वस्तु न हो, केवल हृदय के एकनिष्ठ भाव हों, परमात्मा की कृपा और सान्निध्य प्राप्त करने की तीव्रतर मुमुक्षा हो तथा भगवान के सिवा कुछ भी अभीष्ट न हो। इसमें न माईक और स्पीकर हों, न दूसरे लोगों की निगाह हो, और न ही संसार की माया का कोई दिखावा हो।

भक्ति के नाम पर जो कुछ किया जाए, उसके बारे में तीसरे को भनक तक नहीं पड़नी चाहिए। इस तरफ भक्त या साधक हो तथा दूसरी तरफ भगवान। आजकल भक्ति और साधना के नाम पर धार्मिक कहे जाने वाले लोग भक्त और भगवान के बीच कई प्रकार के भौतिक यंत्र और वस्तुएं ले आते हैं, भगवान को खुश करने के लिए विभिन्न उपचारों और जाने कैसे-कैसे आधुनिक एवं लुभावने द्रव्यों के नाम पर खूब सारी सामग्री का प्रदर्शन और उपयोग करवा देते हैं और इसके माध्यम से भगवान के नाम पर अपनी दुकानदारी चला लेते हैं।

इस स्थिति मेंं यह दिखावटी भक्ति कारोबार से कम नहीं है, जहाँ हम भगवान की नज़रों में भी गिरने लगे हैं और भक्तों को भी उल्लू बना रहे हैं। असली भक्ति और साधना वही है जिसमें एक धेला खर्च न हो, सब कुछ भावना प्रधान हो।

भौतिक वस्तुओं के साथ की जाने वाली पूजा से हजारों गुना फल प्राप्त होता है मानसोपचारी पूजा और भक्ति से। जहाँ भक्त और भगवान के बीच न कुछ होता है, न कुछ चाहिए। इस बात को अपने आस-पास के लोगों और परिचितों के जीवन से समझें, जो कि विभिन्न द्रव्यों, धन-सम्पदा और तरह-तरह के पदार्थों के साथ बरसों से भक्ति या साधना करते आ रहे हैं लेकिन उनके जीवन में भगवत्कृपा या आत्म आनंद की उपलब्धि के बारे में देखा जाए तो शून्य ही सामने आता है।

इसका यह कारण भी हो सकता है कि उनकी भक्ति निष्काम न होकर सकाम हो। सकाम भक्ति की स्थिति में रोजाना की जाने वाली भक्ति से प्राप्त ऊर्जा या पुण्य अपने रोजमर्रा के कामों से जुड़े संकल्पों और इच्छाओं के चित्त में आते ही खर्च हो जाता है। इससे सांसारिक कार्यसिद्धि और भौतिक सुख-समृद्धि में भले ही थोड़ा-बहुत असर सामने दिखे, मगर संचित दैवीय ऊर्जा का क्षरण तो होता ही है। यह ठीक उसी तरह है कि जैसे पानी पीने के लिए रोज नया कूआ खोदना।

इसमें भी मामूली काम तो संभव हो सकते हैं किन्तु अपने जीवन या घर-परिवार से संबंधित बड़े व स्थायी कामों का होना असंभव है क्योंकि इनके लिए अधिक परिमाण में संचित दैवीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। वहीं दूसरी ओर मनुष्य अपने दैनंदिन जीवन और व्यवहार में मिथ्या भाषण, पतितों से सम्पर्क एवं व्यवहार, बुरे कर्म और कई ज्ञात-अज्ञात पाप करता रहता है।

जीवात्मा से इन पापों का भार कम करने के लिए भी काफी मात्रा में पुण्य और दैवीय ऊर्जाओं की आवश्यकता होती है। ऎसे में उतना भजन-पूजन या साधना-उपासना नहीं हो पाती, जितनी कि आवश्यक होती है। ऎसे में इच्छित कार्य पूर्ण हों या न हों, जीवात्मा द्वारा संचित पुण्य और साधना या भक्ति की ताकत क्षीण हो जाती है।

इसलिए यह तय मानकर चलें कि साधना या भक्ति में न पैसा चाहिए, न भौतिक वस्तुएँ। बड़े-बड़े साधकों का अनुभव रहा है कि भक्ति और साधना में केवल भगवान के प्रति अनन्य भक्ति का भाव होना चाहिए और ईष्ट के प्रति एकनिष्ठ एवं अगाध श्रद्धा के साथ मुमुक्षा।

यों भी भगवान की साधना-भक्ति में भौतिक पदार्थों या पैसों का संबंध है ही नहीं। धर्म के नाम पर कारोबार करने वालों ने इसे इतना अधिक व्यापक स्वरूप दे डाला है कि यह एक विराट उद्योग की तरह चल निकला है और बढ़ता ही चला जा रहा है। जो लोग समृद्ध हैं उनके लिए भक्ति या साधना में भौतिक द्रव्यों और मुद्रा तथा सम सामयिक दिखावों का प्रचलन समझ में आता है किन्तु आम लोगों के लिए भक्ति या साधना में विभिन्न वस्तुओं के नाम पर खूब सारा खर्च करना या करवा देना शास्त्र सम्मत भी नहीं है।

कहा तो यहां तक गया है कि भक्ति और साधना का कोई भी कार्य कर्ज लेकर या जीवनोपयोगी अन्य अत्यावश्यक जरूरतों में कटौती करके किए जाने वाले धार्मिक कृत्यों का कोई फल प्राप्त नहीं होता। इस स्थिति में धर्म, साधना और भक्ति के मूल तात्ति्वक रहस्य को जानने की आवश्यकता है। और वह यह कि ईश्वर की उपासना या भक्ति में भौतिक द्रव्यों और धन के प्रयोग की बजाय साधना और भक्ति की सारी क्रियाएं भक्त या साधक द्वारा मानसिक रूप से संपादित की जाएं, तो उसे हजार गुना लाभ एवं फल प्राप्त होता है।

इस स्थिति में पूजा-उपासना में न किसी षोड़शोपचार या राजोपचार की आवश्यकता होती है, न एक पैसे की। जो कुछ होता है वह मानसिक स्तर पर ही होता है। इसे मानसोपचार के रूप में मान्यता दी गई है। कोई पूजा-उपासना ऎसी नहीं है जिसमें मानसोपचार का विधान न हो। हर साधना में कहा गया है - मानसोपचारैः संपूज्य। इसके मूल में छिपे गहन रहस्य को आत्मसात करने की आवश्यकता है।

श्रद्धा-भावना के साथ मानसिक पूजा और उपासना करते समय चित्त की वृत्तियां पूरी तरह भगवद् प्रवाह से जुड़ जाती हैं और भगवान से भक्त का सीधा तारतम्य कायम हो जाता है। इसमें सब कुछ अर्पण किया जाता है मानसिक भावना करते हुए।

भक्ति और साधना के मामले में एक गूढ़ रहस्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि संसार से प्राप्त कोई भी पदार्थ उसे न भगवान से मिला सकता है, न मोक्ष दे सकता है। उसका अपना विशुद्ध शरीर ही है जिसकी ज्ञानेन्दि्रयों और कर्मेन्दि्रयों के माध्यम से ही वह भगवदीय लक्ष्य में सफलता हासिल कर सकता है। जो भी बाहरी पदार्थ हैं, वे किसी काम के नहीं। सांसारिक ऎषणाओं और इच्छाओं की पूर्ति के प्रयासों में ये सारे कुछ फीसदी सहायक सिद्ध हो सकते हैं किन्तु भगवत्प्राप्ति या मुक्ति में बाधक ही हैं।

केवल नाम जप में रमे रहने से भी भगवान को प्रसन्न किया जा सकता है, इसके सिवा कुछ न करें तब भी भगवान की कृपा और साक्षात्कार संभव है। भक्ति या साधना से शरीर की पवित्रता, चित्त की शुद्धि और विचारों की शुचिता प्राप्त होकर भक्त या साधक निर्मलता के उस घनीभूत स्तर तक आ पहुंचता है जहाँ उसके हृदय में ईश्वर प्रतिष्ठित व जागृत हो सकता है और उसे वह स्वयं अनुभूत कर सकता है।

मानसोपचारी पूजा का एक फायदा यह भी है कि दृढ़ संकल्पित साधक मानसिक पूजा व मानसोपचारी भक्ति करते-करते वह स्थान भी पा सकता है कि जब उसे सारे उपचार स्थूल रूप में भी सहज प्राप्त होने लगें। ईश्वर को पाने के लिए मानसोपचार को सर्वोपरि मानकर भक्ति या साधना में रमने वाले जल्दी सफल होते हैं और भगवान इन पर अधिक प्रसन्न होते हैं।

ऎसे नैष्ठिक साधक-भक्तों के शरीर तथा उनके ओज-तेज व प्रभाव को देखकर ही इनकी भक्ति के प्रभाव को जाना, समझा और अनुभव किया जा सकता है। वर्तमान में भक्ति या साधना से संबंधित उपचारों में भी मिलावट और मुनाफाखोरी चल निकली है, ठगी का प्रभाव भी देखने को मिलता रहा है। ऎसे में भक्ति के शाश्वत मूल मर्म और साधना के गूढ़तम रहस्य को आत्मसात करते हुए मानसोपचारी पूजा-उपासना और भक्ति को खुद भी अपनाएं, तथा दूसरों को भी प्रेरित करें।