गर्व से कहो - हम सब हैं झूठे और बेशर्म


इंसान का पूरा जीवन ऎसा विचित्र अभिनय होकर रह गया है जिसमें वह चाहते हुए भी सच नहीं बोल सकता, या कि सच बोलने का माद्दा ही नहीं रहा। उसे वही सब करना पड़ता है जो अब से पहले तक होता रहा है, पहले वाले लोग करते आ रहे हैं। इन्हें हम सीधी और सरल भाषा में ओढ़ी हुई मजबूरी कह सकते हैं या फिर परम्परागत भेड़ चाल का अनुगमन।मरने के बाद और रिटायरमेंट के समय नालायकों की भी केवल झूठी तारीफ ही तारीफ करने की परंपरा के कारण ही इनके जीवन का श्वेत-श्याम सत्य समाज के सामने नहीं आ पाता। फिर समाज कैसे सुधरेगा-सँवरेगा। सच को छिपाए रखना पाप भी है और सामाजिक अपराध भी। खुलकर सच कहें ताकि आने वाली पीढ़ियां सीख और सबक ले सकें।
हालात ये हैं कि जो लोग पूरी नौकरी के दौरान महा निकम्मे, भ्रष्ट, रिश्वतखोर और काम अटकाऊ, खाऊ और संग्राहक ही बने रहकर संस्थान, समाज और देश पर भार बने रहते हैं, नेताओं की चमचागिरी और अफसरों की चापलुसी में रमे रहकर मजे लेते रहते हैं, ड्यूटी टाईम में चाय-पकौड़ों और नाश्ते की दुकान पर मिलते हैं, दिन भर टन्न रहते हैं, भ्रष्टाचार की कमाई में डूबे रहते हैं, व्यभिचार में डूबे रहते हैं, सरकारी सामान घर में वापरते हैं और फिर लौटाते तक नहीं, एक्स्ट्रा इंकम के लिए मरते हैं, फुटपाथी भिखारियों की तरह पार्टी, दारू, मीट और दूसरे सब कुछ भोग-विलासी संसाधन और मानव संसाधन मांगते हैं, किसी का भला करने की बजाय दुःखी करते हैं, ऎसे लोगों के रिटायरमेंट पर इनकी प्रशस्ति की ओलावृष्टि के साथ मिथ्या गान होता है, फूलमालाओं से लाद दिया जाता है, इतना अधिक महिमागान होता है कि बेचारे खुद शरमा जाते हैं, और फिर इतना महान बताया जाता है कि जैसे इनके रिटायर हो जाने के बाद तो संस्था चलानी ही मुश्किल पड़ जाएगी। समाज और देश का विकास अवरूद्ध हो जाएगा।
सबसे अधिक हैरत की बात यह है कि हर मामले में कमीशन और एकतरफा आवक ही आवक में रमे रहने वालों को ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और समर्पित बताने वालों की कोई कमी नहीं रहती। आखिर इतना सारा झूठ बोलकर हम कहां जाएंगे। न हमें अपनी आत्मा का भय है, न ईश्वर का खटका। कइयों की तो यह भी मजबूरी है कि आज इनके बारे में अच्छा ही अच्छा नहीं कहेंगे तो कल हमारा रिटायरमेंट आने पर लोग हमारी कलई उतार देंगे। इसलिए यह अघोषित समझौते भरा एजेण्डा है कि हम सभी एक-दूसरे के भ्रष्टाचार, कामचोरी और आलस्य पर परदा डालें रहें ताकि किसी को किसी और से कोई खतरा न रहे। चोर-चोर मौसेरे भाई, डकैत-डकैत सगे भाई जैसा माहौल नज़र आता है।
मिथ्या महिमा गान से बेचारे उन लोगों की भी सेवाओं का कोई मूल्यांकन नहीं होता जो वास्तव में पूरी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और समर्पित भावों से मेहनत करते हुए वाकई अपने पूरे सेवाकाल को गरिमामय बनाने में जिन्दगी के बहु मूल्य क्षण होम देते हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो रिटायरमेंट की पार्टियां झूठी तारीफों के पुल बांधने और झूठ ही झूठ अभिव्यक्ति के दौर से ऎसी भरी रहती हैं कि बोलने वाला भी अच्छी तरह जानता है कि वह झूठ बोलकर अभिनय कर रहा है और सुनने वाला भी समझता है कि इन बातों का सच्चाई या बुनियाद से कोई संबंध नहीं है। यानि चौतरफा झूठ ही झूठ, और वह भी दूसरों को खुश करने के लिए अपनी आत्मा के साथ दगा। राम-राम।
क्यों नहीं रिटायरमेंट की पार्टी के दौरान ही रिटायर होने वालों के असली चरित्र पर प्रकाश डालें ताकि नई पीढ़ी में इनके बारे में जानकर अनुकरण करने की उदारता कर सके। अच्छाइयों को भी बताएं और कमियों-बुराइयों को भी। इनकी करतूताेंं और कारगुजारियों के बारे में सभी लोग साफ-साफ बोलें और बताएं कि इन्होंने किस तरह हरामखोरी और भ्रष्टाचार किया है और पूरी नौकरी लोगों को तंग करने के सिवा कुछ नहीं किया है। यों तो हम सब अपने आपको गांधीजी के भक्त मानते हैं लेकिन असल में हमारा मूल्यांकन किया जाए तो सामने आएगा कि हम गांधी के नहीं गांधी छाप के भक्त हैं और इस भक्ति में डूबे रहकर हम कुछ भी करने को स्वतंत्र ही नहीं स्वच्छन्द हैं और पूरी स्वेच्छाचारिता के साथ सारी मर्यादा, लज्जा और मूल्य त्यागने में गर्व और गौरव का अनुभव करते रहे हैं।
इसी प्रकार यह भी गलत परंपरा है कि मरने के बाद व्यक्ति की अच्छाई ही कही जानी चाहिए। कहां लिखा है कि झूठ बोलना चाहिए, सच का बखान नहीं करना चाहिए। बड़े-बड़े भ्रष्ट, उठाईगिरों, लूटरों और शोषकों, गुण्डों और असामाजिक तत्वों की मौत के बाद भी इनका महिमागान होता रहता है।और तो और इनकी पगड़ी रस्म के दिन बटरिंग प्रजाति के कुछ चुनिन्दा लोग इस तरह शोक संदेश तैयार कर लाते हैं और पढ़ते हैं जैसे कि महान सेवाभावी, परोपकारी और लोकप्रिय रही मृतात्मा के लिए अभिनंदन ग्रंथ के पन्ने पढ़ते जा रहे हों।
हद है, कोई सच बोलना ही नहीं चाहता। सारे असत्य और लफ्फाजी भरा महिमा गान ही करते रहते हैं। इतना अधिक प्रशस्तिगान कि प्रेत योनि में पड़ी जीवात्मा भी यह सब सुन कर रोने लगती होगी कि इंसान इतना अधिक झूठ क्यों बोलता रहता है। और तो और श्रद्धान्जलि अर्पित करने वालों में से अधिकतर इनके चले जाने को अपूरणीय क्षति बताते हैं जैसे कि इनके जाने के बाद देश-दुनिया का पहिया थम जाएगा, कोई भूचाल आ जाएगा। किसी भी इंसान की मौत को अपूरणीय क्षति बताना प्रकृति और परमेश्वर दोनों का अपमान है जिनके जिम्मे सृष्टि निर्माण है।
सदियों से लोग मरते रहे हैं और हम इनके परिजनों और बाद वालों को खुश करने के लिए हमेशा इन दो शब्दों का प्रचुर मात्रा में इस्तेमाल करते रहे हैं - अपूरणीय क्षति। यह शब्द आँखों के सामने आने और कानों में पड़ते समय लगता है कि रत्नगर्भा वसुन्धरा धरती बीज खा गई और अब ऎसे लोगों का प्रजनन पूरी तरह अवरूद्ध ही हो जाएगा। यही सब चलता रहा है इसलिए समाज और क्षेत्र में अच्छे-बुरों में कोई फर्क नहीं। हालांकि यह भी सच है कि जिन्दगी भर हराम की कमाई और झूठन का खान-पान करने वाले लोग कभी सच नहीं बोल सकते। निर्भीकता के साथ सच वही बोल सकता है जिसका हाड़-माँस खुद के परिश्रम से अर्जित कमाई से बना हो, जीवन में सर्वांग शुचिता हो और स्वाभिमानी जीवन जीने का आदी हो।
अच्छों को अच्छा कहने की उदारता रखें और बुरे को बुरा कहने का साहस। तभी समाज को सही दिशा और शुचितापूर्ण दशा प्राप्त हो सकती है। समाज, क्षेत्र और देश की अधिकांश समस्याओं का मूल कारण हमारा दोहरा चरित्र और तटस्थ बने रहकर हमेशा सकारात्मक छवि की चादर ओढ़े रहना ही है। यह याद रखें कि औरों को खुश रखने और करने के लिए धरती पर जितना अधिक झूठ बोला जाएगा, उतनी ही अधिक नारकीय यंत्रणाओं को भोगना पड़ेगा। और दुबारा इंसान बनने का मौका भी हाथ से चला जाएगा।
