छद्म युवा न बने रहें, कुछ करें युवाओं के लिए


सब लोग आडम्बरी और बहुरूपियों की तरह जीने के आदी होते जा रहे हैं। मन कमजोर हो जाए, दिमाग सठिया जाए और शरीर बीमारियों व अशक्ति के कारण भले ही जवाब देने लग जाए, हममें से अधिकांश लोग इन हालातों के बावजूद अपने आपको युवा मानने का भ्रम पाले रहते हैं।
खुद को जवान दिखने और दिखाने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी का इतना अधिक समय खर्च कर दिया करते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।
सब तरफ देखा जा रहा है कि खुद को युवा बनाए रखने और अपने बारे में जमाने भर को भ्रमित रखने के लिए हम खूब सारे जतन करते रहते हैं और इनका कोई अंत नहीं है।
बूढ़ऊ, खल्वाट, केशलेस टकले हो जाने, मानसिक और शारीरिक अक्षमताओं के बावजूद हम चेहरे-मोहरे और दिखावे से स्वयं को जवान और शक्तिमान मनवाने के फेर में दिन-रात लगे रहते हैं।
हमारी यही कोशिश रहती है कि अपनी असलियत कोई समझ नहीं पाए और हमें मरते दम तक खुद को ऊर्जावान व जवान समझते रहें। इससे हमारा आकर्षण बना रहे और संसार के लोग हमें समर्थ मानते हुए आदर-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा नवाजते रहें और इसी शान और शौकत में ही हम ऊपर चले जाएं।
अधिकांश लोग अपने आपको युवाओं की श्रेणी में रखते हुए इसी फिराक में रहने लगे हैं कि उनके लिए जिन्दगी के शेष सारे अवसर सहज सुलभ होते रहें और लोग उन्हें यह समझकर मौके देते रहें कि अभी लम्बी पारी बाकी है।
एकमात्र यही वजह है कि हम लोग अपने आपको युवा दिखाने के लिए ही सब कुछ कर रहे हैं। खासकर विज्ञापनों, पोस्टरों और संदेशों से लेकर सार्वजनिक प्रदर्शन के आयोजनों में तो यही दिखता है, जहां हम अपनी जवानी के फोटो को ही तरजीह देते रहे हैं।
जो लोग इस तरह नकली युवा बनने की कोशिश करते रहते हैं वे युवाओं के किसी काम के नहीं होते बल्कि युवाओं के नाम पर खुद को प्रतिष्ठित और समृद्ध बनाने की कोशिश करते रहते हैं।
जो लोग युवाओं को आगे लाना चाहते हैं उन सभी लोगों को चाहिए कि वे अपनी युवा आयु के अवधिपार होने को समझें और युवाओं की श्रेणी में खुद को स्वैच्छिक रूप से बाहर करें तथा युवाओं के लिए मार्गदर्शक के रूप में सामने आएं।
युवाओं का उत्थान तभी संभव है कि जब इसके लिए वास्तविक युवा ही भागीदारी निभाएं और मुख्य धारा में बने रहें।
आज युवाओं के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण यही है कि युवाओं के नाम पर प्रतिष्ठा पा रहे अधिकांश लोग युवावस्था को पार कर चुके हैं और इन्हें युवाओं की श्रेणी में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।
जो लोग अवधिपार युवा हो चुके होते हैं वे युवाओं की ऊर्जा, स्फूर्ति और ज़ज़्बा खो चुके होते हैं और इस वजह से इनमें यौवनजन्य चुस्ती-फुर्ती की बजाय यथास्थितिवादी भावनाएं हावी होने लगती हैं, जिस कारण से ये लोग युवाओं के लिए उतने अधिक उपयोगी एवं मंगलकारी साबित नहीं हो सकते, जितने की वास्तविक युवा।
यह बात उन सभी लोगों को समझनी चाहिए जो कि युवाओं के किसी न किसी काम से जुड़े हुए हैं। जो ज्ञानी और अनुभवी लोग संरक्षक और मार्गदर्शक की भूमिका में आ चुके हैं, युवावस्था को पूर्ण भुगत कर प्रौढ़ावस्था का वरण कर चुके हैं, उन सभी को आत्मा की आवाज सुनकर मुख्य धारा से हटना चाहिए, तभी युवाओं का कल्याण हो सकता है, अन्यथा कभी नहीं।
छद्म युवा दिखने-दिखाने के फेर में युवाओं के अधिकारों पर कब्जा जमाए बैठे रहने से कहीं अधिक अच्छा है कि हम अपनी मौलिकता के नैसर्गिक दायरों में बने रहें और जीवन की वास्तविकता को अपनाएं।
आज युवाओं को सबसे अधिक और बड़ी तकलीफ उन लोगों से है जो प्रौढ़ होने के बावजूद खुद को युवावस्था में ही देखने-दिखाने के आदी हो गए हैं, पगड़ियों और साफों से गंजेपन को छिपा रहे हैं, खिजाब लगाकर बालों को काले कर रहे हैं, ब्यूटी पॉर्लरों और स्पॉ पार्लरों के बूते जवानी का अहसास करा रहे हैं, दवाइयों के नाश्ते के सहारे खुद को दूसरों से अधिक जवान दिखाने पर तुले हुए हैं और नित नए परिधानों , कॉस्मेटिक्स, आकर्षण बढ़ाने वाले रसायनों और आभूषणों का सहारा लेकर चिर युवा होने के स्वप्न देखते हुए संसार को भ्रमित कर रहे हैं।
इन छद्म युवाओं पर अब युवाशक्ति का भरोसा नहीं रहा क्योंकि इनके कर्म, व्यवहार और स्वभाव को भुगतते रहने के बावजूद कहीं से नहीं लगता कि ये युवाओं के लिए कुछ कर पाएंगे।
युवाओं के उत्थान के लिए युवाओं की सम्पूर्ण भागीदारी के बिना कुछ नया होना संभव नहीं है। इस मामले में देश और दुनिया में एक ऎसा स्वच्छता अभियान चलाने की जरूरत है जिसमें युवाओं के पाले बैठे हुए प्रौढ़ों, बुजुर्गों और अवधिपार लोगों को बाहर धकेला जाए ताकि युवाओं को भरपूर मौका मिले और वे अपने ज्ञान, हुनर तथा प्रतिभाओं का खुलकर प्रयोग एवं प्रदर्शन कर सकें।
आज की परिस्थतियों में युवाओं के लिए बातें करने से कहीं ज्यादा जरूरी है उन्हें सुनहरे भविष्य की बुनियाद दिलाने के लिए ठोस प्रयास करने की, ताकि इन्हें अपनी जिन्दगी बोझिल और निरर्थक नहीं लगे।
देश और दुनिया में मानव संसाधन की दृष्टि से सर्वाधिक संख्या युवाओं की है और इन्हें किसी न किसी प्रकार के अवसरों से जोड़कर उन्हें खुशहाल जीवन की बुनियाद से जोड़कर आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और सम्मानजनक जीवनयापन का आधार मुहैया कराना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
स्वामी विवेकानंद के पास यह दिव्य और कल्याणकारी दृष्टि थी। उन्होंने युवाओं के समगर््र उत्थान के जो स्वप्न संजाये थे उन्हीं को पूरा करने के लिए उन्हीं के नाम पर युवा दिवस मनाया जाता रहा है।
आईये बातों, नारों, वादों और आयोजनों की तमाम औपचारिकताओं और सतही कामों से ऊपर उठकर युवाओं को सुनहरा भविष्य दिलाने के लिए कुछ करें और देश-दुनिया के युवाओं को कुछ सच्चा और अच्छा देकर जाएं।
सभी युवाओं को स्वामी विवेकानंद जयन्ती और युवा दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ......।
