साधक के लिए सर्वोपरि है चित्त की निर्मलता, जीवन की सरलता


जीवन में ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा, नियमित साधना-उपासना और चित्त की निर्मलता से लौकिक एवं पारलौकिक समस्त सिद्धियां सहज रूप से हासिल की जा सकती हैं। साधक तभी सफल हो सकता है जब उसका जीवन, कर्म और समूचा व्यवहार सरल, सहज एवं अहंकारमुक्त हो तथा चित्त निर्मल।
प्रत्येक साधना का प्राथमिक उद्देश्य चित्त को निर्मल बनाना, नाड़ियों का शोधन और शरीर में दिव्यता लाकर चक्रों का जागरण करना है। दैवत्व के आविर्भाव के लायक भावभूमि निर्मित होने केे बाद ही दैवीय शक्तियों का अहसास किया जा सकता है।
वास्तविक साधक वही है जिसका चित्त शुद्ध है और बुद्धि निर्मल। इसी प्रकार के साधक पर देवी-देवता मेहरबान होते हैं और वरदान लुटाकर दिव्यता प्रदान करते हैं।
मन-बुद्धि के मलीन होने पर की जाने वाली साधना पाखण्ड, आडम्बर और दिखावे के सिवा कुछ नहीं है और इससे मनुष्य का भला नहीं हो सकता।
जीवन में जो भी साधनाएं की जाएं, वे एकान्त में हों और पूरी तरह गोपनीय रहें तभी इनका असर दिखता है। इसके लिए साधना के भेदों के अनुरूप तुरीय संध्या अथवा ब्रह्ममुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है। जो साधक सूर्योदय के बाद तक सोते रहते हैं उनके जीवन की कोई साधना कभी सफल नहीं हो पाती है। ऎसे प्रमादी लोगों को साधक कहना बेमानी है।
साधक का प्रथम कत्र्तव्य है कि जीवन का हर कार्य ईश्वर की साक्षी मानकर करे तथा चित्तको उत्तरोत्तर निर्मलता देने के लिए सतत अभ्यास किया जाए। जीवन में मनोमालिन्य की समाप्ति पर प्रेम अपने आप उमड़ने लगता है और यह दैवीय शक्तियों का संयोग प्राप्त कर भीतर के आनन्द की असीम वृष्टि करता है।
द्विजों के लिए गायत्री उपासना और संध्या सशक्त भावभूमि तैयार करने वाले कारक हैं। संध्या, अध्र्य आदि के साथ जो व्यक्ति छह माह तक नित्य प्रति तीन हजार गायत्री मंत्र करता है, देवता भी इसकी पूजा करते हैं। देवी भागवत इस बारे में स्पष्ट लिखा है कि ‘‘सहस्र त्रितयं जप्त्वा देवपूज्यो भवेन्नरः।’’ गायत्री उपासक को दूसरी बार किसी को गुरु बनाने की आवश्यकता नहीं होती, गायत्री साधना से ही उसके सभी मंत्र और मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं।
