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साहित्य
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श्री श्याम अश्याम ः फक्कड़ी जीवनशैली भरा अद्भुत व्यक्तित्व

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 9, 2022
श्री श्याम अश्याम ः फक्कड़ी जीवनशैली भरा अद्भुत व्यक्तित्व

मुक्ताकाशी व्यवहार माधुर्य से झरते रहे जीवन-उल्लास भरे रस-रंग

वागड़ वसुंधरा रत्नों की खान रही है जिसने इस अंचल में समाज-जीवन के विविध क्षेत्रों में बहुआयामी शखि़्सयतों को जन्म दिया है। इन व्यक्तित्वों ने वागड़ की वादियों से लेकर राष्ट्रीय क्षितिज तक अपनी मेधा के बल पर धाक जमायी है। इन्हीं में श्याम अश्याम वह जाने-माने हस्ताक्षर रहे हैं जिन्होंने वरिष्ठ साहित्यकार व चिंतक के रूप में प्रदेश-देश में ख़ासा नाम कमाया।

शिक्षा, साहित्य, समाजसेवा, लोक जागरण सहित सामाजिक-वैकासिक चिन्तन के कई-कई क्षेत्रों में महारथ रखने वाले श्याम अश्याम का जन्म 10 जनवरी 1931 को कुशलगढ़ में अनारसिंह के घर श्रीमती नाथकंवर की कोख से हुआ। श्री श्याम अश्याम खुद बताते थे कि उनका जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, विक्रम संवत् 1988 तदनुसार 23 दिसम्बर 1930 को हुआ लेकिन उनके अभिभावकों ने शिक्षा-दीक्षा आरंभ करने के समय जन्म दिनांक 10 जनवरी 1931 दर्ज करवा दी थी, तभी से उनका जन्म दिन 10 जनवरी को मनाया जाता रहा। जन्म के समय आपका नाम केसरसिंह था लेकिन बाद में लेखन में उपनाम के प्रथा के चलते श्याम अश्याम कर दिया।

अनथक रचनाधर्मिता भरी सृजन यात्रा में लेखन और पत्रकारिता के कई-कई नवीन आयाम स्थापित करने वाले श्याम अश्याम ने प्रगतिशील लेखक संघ, world सोश्यल फोरम इण्डिया, जनवादी लेखक संघ, इंसाफ आदि से संबद्ध रहकर कई आयोजनों में हिस्सा लिया।

आदिवासियों एवं पिछड़े क्षेत्रों में प्रौढ़ शिक्षा के प्रचार तथा आदिवासियों की सांस्कृतिक सुरक्षा एवं समृद्धि संबंधी सराहनीय कार्यों के लिए गणतंत्र दिवस 1984 को जिला स्तरीय प्रशंसा पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। भारत स्काउट एण्ड गाइड़ के नेशनल हेड़ क्वार्टर ने 4 मार्च 1988 को उन्हें प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया व उनकी सेवाओं को सराहा।

सेन्टर फॉर ह्यूमन डवलपमेंट एंड सोश्यल चेंज, मद्रास (तमिलनाडु) से साक्षरता परियोजना अधिकारी के रूप में 3 से 10 सितम्बर 1985 तक मद्रास में आयोजित विकास के लिए प्रौढ़ शिक्षा कार्यशाला में हिस्सा लिया। वागड़ विकास संस्थान बांसवाड़ा की ओर से राजस्थान दिवस 1999 को मानवीय मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन, लोक शिक्षा, पर्यावरण चेतना एवं समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में श्लाघनीय व अनुकरणीय सेवाओं के लिए कर्मवीर अलंकरण से नवाज़ा गया। भारत सरकार के संचार मंत्रालय द्वारा उन्हें 2001 में दूरसंचार सलाहकार समिति में 2 वर्ष के लिए सदस्य मनोनीत किया गया। इसी प्रकार जनजाति साक्षरता वृद्धि में सराहनीय कार्य के लिए 26 जनवरी 1991 को गणतंत्र दिवस समारोह में जिला स्तरीय सम्मान प्रदान किया गया।

प्रजापिता ब्रह्मा कुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय द्वारा माउंट आबू में 28 से 31 अक्टूबर 1999 तक आयोजित मूल्यपरक शिक्षा आधारित सेमीनार में संभागीत्व किया। इण्डियन इन्सटीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आई.आई.एम.) द्वारा प्रौढ़ शिक्षा के मूल्यांकन में ख़ास भूमिका के लिए 8 मई 1986 को उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया गया।

प्रारंभिक शिक्षा तत्कालीन कॉल्विन मिडल स्कूल कुशलगढ़ में प्राप्त की। वहां छात्र प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रहे। इसके बाद उन्होंने झाबुआ, मध्यप्रदेश के दरबार हाईस्कूल में कक्षा नवीं में दाखिला लिया। वे वहां राजपूत बोर्डिंग हाउस में रहकर पढ़े। इस दौरान वाद-विवाद सोसायटी में अध्यक्ष रहे।

इसके उपरांत श्याम अश्याम वापस कुशलगढ़ आ गए। वहां उन्होंने एस. डी. ओ. ऑफिस में सन् 1950 में उम्मेदवारी (अप्रेन्टिशीप) का काम किया। उन्हें कुशलगढ़ में लेवी वसूली का अंशकालीन नायब तहसीलदार बनाया। इसी दरम्यान गडबड़ी करने वाले एजेंट को गेहूं के बोरों में मिलावट के कारण पकड़वा दिया। फिर आपने इस नौकरी को छोड़ दिया।

श्याम अश्याम ने शिक्षा विभाग में सन् 1950 में राप्रावि भोपतपुरा (सज्जनगढ़) में प्रधानाध्यापक पद से नौकरी शुरू की। उस समय उन्हें तीस रुपए मासिक वेतन मिलता था। श्याम अश्याम शिक्षा विभाग की पूरी नौकरी में कई स्थानों पर प्रधानाध्याक, उपाचार्य, प्रधानाचार्य, सहायक निदेशक अनौपचारिक शिक्षा, वरिष्ठ उप जिला शिक्षा अधिकारी आदि पर रहकर 31 जनवरी 1992 को रिटायर्ड हुए।

बांसवाड़ा बी.एड़. कॉलेज में लेक्चरार के पद पर आपने सेवाएं दी। साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा में आप राष्ट्रीय स्तर के संदर्भ व्यक्ति रहे हैं। विभागीय पुस्तकों के लेखन सम्पादन में श्याम अश्याम की भूमिका अहम रही है। आदिवासी जनजीवन पर लेखों के अतिरिक्त विविध विषयों तथा व्यंग्य रचनाओं के ख्यातनाम रचनाधर्मी हैं श्याम अश्याम। उन्होंने एम, एम.एड., साहित्य रत्न (हिन्दी, अर्थशास्त्र व राजनीति शास्त्र) किया है।

राजकीय सेवा से निवृत्ति के बाद श्याम अश्याम ने सामाजिक रचनात्मक आंदोलन को अपनाया। सन् 1992 में भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश कर बौद्धिक प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष का दायित्व निभाया। सन् 1993 में बांसवाड़ा विधानसभा सीट से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी के निधन की वजह से सन् 1995 में जब उपचुनाव हुआ तो दुबारा निर्दलीय रूप में पर्चा भरा तथा जनता दल प्रत्याशी को समर्थन दिया।

जनता दल में श्याम अश्याम ने शहर अध्यक्ष व प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी संभाली। आदिवासियों के मसीहा मामा बालेश्वर दयाल, केशवचंद्र भ्राताजी, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया सहित अनेक समाजवादी नेताओं से आपका जीवंत सम्पर्क रहा तथा जनता दल में रहते हुए में रहते हुए विभिन्न आयोजनों में सक्रिय भागीदारी का निर्वाह किया। कई सामाजिक, राजनैतिक आन्दोलनों में उनकी प्रभावी भूमिका रही है। समता पार्टी के बांसवाड़ा जिलाध्यक्ष पद भार 28 जून 2003 को सौंपा गया। इस पर पर वे 2 वर्ष तक रहे। पिछले कुछ वर्ष से आपने राजनैतिक क्षेत्र की बजाय अपना समूचा ध्यान साहित्यिक सांस्कृतिक व सामाजिक क्षेत्रों पर केन्दि्रत किया हुआ था।

एशिया के अनेक हूज-हू में भी आपका सचित्र वर्णन बांसवाड़ा को गौरवान्वित करता रहा है। राजस्थान सरकार शिक्षा विभाग राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त श्याम अश्याम के व्यक्तित्व व कृतित्व की जानकारी एशियाज हूज हू में समाहित है। साहित्य संसार के इस दैदीप्यमान नक्षत्र ने लेखन यात्रा की शुरूआत सन् 1944 में की। आप राजस्थान शिक्षक संघ (शेखावत) के जिलाध्यक्ष भी रहे।

साक्षरता, प्रौढ़ शिक्षा और पाठ्यसामग्री लेखन के क्षेत्र में श्याम अश्याम वह शखि़्सयत हैं जिन्होंने समर्पित योगदान का इतिहास रचा हैं। बांसवाड़ा जिला सम्पूर्ण साक्षरता अभियान की प्रथम व द्वितीय प्रवेशिका (वागड़ जोत) के निर्माण, वातावरण निर्माण सहित तमाम गतिविधियों में उल्लेखनीय भूमिका के लिए तत्कालीन जिला कलक्टर डॉ. बी. शेखर ने प्रशस्ति पत्र प्रदान कर अनेक बार सम्मानित किया।

श्याम अश्याम को सुरभि साहित्य एवं कला परिषद, बांसवाड़ा, दीप शिखा साहित्य संगम बांसवाड़ा, अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान कोटा, हिन्दी साहित्य समिति, भरतपुर एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया जाता रहा है।

आप पूर्व में गौ शाला, बांसवाड़ा के अध्यक्ष भी रहे। श्याम अश्याम महावीर समता संदेश पाक्षिक उदयपुर के सह संपादक के रूप में जुड़े हुए रहे हैं। श्याम अश्याम की बातें ही ऎसी हुआ करती थीं कि हर किसी को भीतर तक गुदगुदा देने में समर्थ थी। भीलों पर उनके लेखन को राहुल सांस्कृतायन द्वारा भी सराहा गया। प्रेम और श्रृंगार के साथ ही मुक्त विचारों के लिहाज से वे अलग ही व्यक्तित्व थे। जो एक बार उन्हें मिल लेता, सुन लेता, वह हमेशा के लिए उनका मुरीद हो जाता।

श्याम अश्याम वयोवृद्ध अवस्था होने के बावजूद अपनी पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ बांसवाड़ा जिले की रचनात्मक गतिविधियों में जुटे हुए रहकर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए रहे। कुछ वर्ष पूर्व ही सन् 2018 में 87 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

बांसवाड़ा जिले की शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और रचनात्मक गतिविधियों से उनका जुड़ाव हमेशा रहा। यही कारण है कि उनकी यादें आज भी सभी वर्गों के लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। वागड़ के साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों की ओर से उनकी जयन्ती पर भावपूर्ण स्मरण एवं हार्दिक श्रद्धान्जलि।