साहित्यिक यात्रा में वापस
साहित्य
8 min read

एकला चालो, आसमान गुंजाओ और सुनहरे शिखरों का वरण करते रहो ...

Deepak Acharya
Deepak Acharya
November 9, 2021
एकला चालो, आसमान गुंजाओ और सुनहरे शिखरों का वरण करते रहो ...

औरों के पालतु श्वान, मुर्गे, गुर्गे, गधे, घोड़े और जानवर के रूप में उनके बाड़ों में रहकर उछलकूद और धींगामस्ती करने, मुफ्त की झूठन और पराये संसाधनों पर मौज उड़ाने,

औरों के आदमी या गुलाम, पालतु दास कहे जाने से बेहतर है खुद को पहचानें और अपनी शक्ति के बूते जीवन और जगत में कुछ नया और उल्लेखनीय ऎसा करके दिखाएं, जिससे कि आने वाली पीढ़ियाँ आदर-सम्मान के साथ याद करें और प्रसन्नतापूर्वक अनुकरण भी करें। भगवान ने इसलिए पैदा नहीं किया है कि ईश्वर प्रदत्त गुणधर्म, अपनी शक्ति और भीतरी ऊर्जा को भुलाकर मुफत की माल-मलाई, खुरचन और झूठन चाटने, हराम के पैसे जमा करने और अपना वजूद साबित करने के लिए औरों के पीछे-पीछे घूमते रहें, नालायकों और नुगरों का जयगान करते रहें और उन्हें बेवजह प्रतिष्ठित करते रहें, जिनमें कोई कुव्वत नहीं है। जो इंसान होने के लायक तक नहीं हैं, उन्हें हम देवराज और दरबारी, प्रबुद्धजन और महान व्यक्तित्व के रूप में पूजने के पाप में जुटे हुए हैं। यह हमारी कुल परंपरा, अपने पूर्वजों, देवी-देवताओं का अपमान है। खुद को बुलन्द करें, इसी में है जीवन की सार्थकता। अन्यथा श्वान परंपरा में जीते रहे तो आने वाला जन्म श्वान का ही होगा, फिर जन्म-जन्मान्तरों तक श्वान, गधे, कैंकड़ा जूओं, गिद्धों और साँप-बिच्छुओं की योनियों में सड़ते रहने का मलाल बना रहेगा। कभी नहीं हो पाएगी मुक्ति, और न ही पूर्वजन्मों के कुकर्मों के कारण फिर से मनुष्य योनि मिल पाएगी। ‘अप्प दीपो भव’ को अपनाएं या फिर अंधेरों के आवाहन में लगे रहें। ऎसे मकड़जाली लोगों का भला भगवान भी नहीं कर सकता जो इंसान होने के गौरव को भुलाकर पालतु जानवरों की तरह रहने के आदी हो गए हैं। कब तक मरे-अधमरे, आत्महीन और अपराधबोधी जीवों की तरह पड़े रहोगे। उठो, अपने आपको जानों और जीवन की दशा को सुधारते हुए सुनहरी दिशाओं की ओर प्रयाण करो। आज हर तरफ व्यक्ति के व्यक्तित्व पर भीड़त्व हावी दिखाई दे रहा है। एक अकेला इंसान सब कुछ कर सकता है लेकिन आत्महीनता ऎसी कि पूरी जिन्दगी भीड़ में बना और रमा रहना चाहता है, भीड़ का हिस्सा बने रहता है और उस भीड़ के साथ जीवन का अधिकांश समय गुजार देता है जिस भीड़ का अपना कोई चरित्र नहीं होता। भीड़ हमेशा व्यभिचारी होती है, वह किसी की सगी नहीं होती। भीड़ केवल तमाशे की ही रिश्तेदार होती है और जब तक तमाशा दिखता रहता है तब तक जमा रहती है। तमाशा खत्म हो जाने के बाद भेड़ों की रेवड़ की तरह किसी और तमाशे के लिए सोत्साह प्रयाण कर जाती है। कीर्ति वही प्राप्त कर पाता है जो भीड़ से अलग अपना अस्तित्व सिद्ध करता है। जो भीड़ में खो गया, उसके लिए हर कोई कहता है - भाड़ में जाए। पता करो तो भीड़ यही कहती है - भाड़ में गया। स्वार्थों और तमाशों की इस विराट नदी का एक तट भीड़ है और दूसरा तट भाड़। जब तक रस, रूप, गंध, स्पर्श, वाणी और तमाशिया मजा बना रहता है तब तक भीड़भाड़ बनी रहती है, तमाशा खत्म हो जाने पर सब कुछ बिखर जाता है इधर-उधर।