अर्थहीन है ऎसा लेखन और संभाषण


अभिव्यक्ति वास्तव में वही है जो हृदय से निकली हो, बिना किसी मिलावट के परिशु; हो, पूरी तरह मौलिक हो और इसके पीछे लाभ-हानि या अन्य किसी भावी प्रभाव का पूर्वानुमान न हो। सत्य और यथार्थ से भरी अभिव्यक्ति तभी संभव हो पाती है जबकि मन, कर्म और वचन में एकरसता व साम्यता हो, कोई दबाव या प्रलोभन न हो तथा दिल से निकलने वाले ये उद्गार ताजा ही हों। इनमें दिमाग या दिमागदारों का कोई दखल नहीं होना चाहिए, तभी अभिव्यक्ति अपना प्रभाव छोड़ पाती है। चाहे वह लेखन के माध्यम से हो अथवा वाणी के।
अक्षर, शब्द और वाक्य तभी तक परमाण्वीय ऊर्जा से भरपूर रहते हैं जब तक कि उन्हें अक्षर ब्रह्म के रूप में स्वीकारा जाकर पूरी-पूरी शुचिता हो तथा इसके प्रस्फुटन का उद्देश्य एवं नीयत स्पष्ट, पारदर्शी एवं मंगलकारी हो, अन्यथा केवल वाग् विलास, बकवास या लिखने मात्र की गरज से होने वाली हर तरह की अभिव्यक्ति में परमाण्वीय ऊर्जा का अंश तक नहीं होता बल्कि केवल भूसे की तरह ही हो जाता है।
यह स्थिति ठीक उस तरह से होती है जैसे किसी क्रैशर से डण्ठलों को घास में बदला जाता है। आवाज भी खूब करते हैं और दूर-दूर तक तिनकों की धुंध इस कदर छा जाती है कि नंगी आँखों के निकलना तक मुश्किल हो जाता है। जब से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिकार मान बैठे हैं तभी से हर कोई शब्दों और वाक्यों के उत्सर्जन-विरेचन में भिड़ा हुआ है। न कोई मर्यादा रही, न शर्म। जिसके मन में जो आ जाए, बोलने और लिखने लगता है। बात यहीं तक ठहरी नहीं है बल्कि अनचाहे किसी न किसी फॉर्मेट में औरों तक परोसने तक का दायित्व भी पूरा करता रहता है।
अब लिखना-पढ़ना और बोलना-सुनाना रस न होकर वैचारिक प्रदूषण और मनौवैज्ञानिक युद्ध की तरह हो गया है जहाँ सब के सब अखाड़ची बनकर फ्री स्टाईल में उतरे हुए हैं। अब पढ़ाई-लिखाई, अनुभव और विद्वत्ता का भी कोई मायना नहीं रहा। जबसे मीडिया की बहुरूपिया कल्चर सामने आयी है तब से हर तरफ हर आदमी लिखाडू और भौंकू बना हुआ अपनी अहम् जिन्दगी के बहुमूल्य क्षणों को पूरी दुनिया के लिए समर्पित कर चुका है।
अपने जीवन के उद्देश्य, लक्ष्य और कर्म को ताक में रखकर वैश्विक चिन्ता में इस कदर डूबता जा रहा है कि उसे न अपनी फिकर है, न घर-परिवार की, न समाज या क्षेत्र की। पूरी दुनिया की ताजातरीन जानकारी रखना और अपनी कीचड़िया समीक्षा के साथ उसे औरों तक परिवहन करते हुए पहुँचाने का उसके पास काम ही इतना अधिक है कि उसे ईश्वर की उपासना, सेवा और परोपकार तथा प्रत्यक्ष कर्म में कोई विश्वास नहीं रहा।
इस स्थिति ने हर किसी को जासूस से लेकर उपदेशक और आलोचक, निन्दक एवं समीक्षक बना डाला है, जहाँ वह दुनिया के किसी भी विषय पर अपनी बकवास कर सकता है, लिख सकता है, भड़ास निकाल सकता है और अपने विचार एवं निष्कर्ष को औरों पर सौंपने के लिए दुराग्रही और हठी बना हुआ ऎसा व्यवहार करता है जैसे कि भगवान ने उसे ही दुनिया को चलाने तथा अपने हिसाब से सभी को ढालने का ठेका दे रखा हो।
बाहर चाहे कितना अधिक स्वच्छ भारत अभियान चलाए रखें लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग करते हुए स्वच्छन्द होकर वैचारिक महा प्रदूषण का जितना अधिक प्रसार हाल के वर्षों में हुआ है उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ। बहुत से हैं जो अपने वजूद को बनाए एवं बचाए रखने के लिए लिख रहे हैं, हमारे जैसे खूब सारे इसलिए रोजाना लिख रहे हैं ताकि भीतर की भड़ास या दिमागी खुराफात का विरेचन करने के लिए कुछ न कुछ वमन-उत्सर्जन प्रसन्नता के साथ करते रहें ताकि सेहत भी ठीक रहे और मनोरंजन का मनोरंजन।
घर बैठे इस तरह का सुलभ और इच्छाधारी मनोरंजन आज के दौर में कुछ नहीं हो सकता, जहाँ कोरोना और दूसरे खतरों के कारण नज़रबन्द होकर जीना या चन्द फीट के कमरों में दुबके रहकर काम करना निरापद ही है, जहाँ न किसी से फालतू की मेल मुलाकात, और न कोई और झंझट। कुर्सी में धंसे रहकर चाहे जो लिख डालो।
खूब सारे किसी न किसी को खुश करने या कि किसी न किसी को ठिकाने लगाने की मंशा से लिख रहे हैं, बोल रहे हैं और जी भर कर उन्हें सुना रहे हैं जो हमारे आस-पास बने रहते हैं। बहुत सारे बुद्धिजीवी अपने आपको याचक, पालतु और दास मानकर मुद्रा या किसी न किसी और लोभ-लालच और आनन्द के लिए अपनी बुद्धि को जीविका का आधार बनाए हुए हैं।
इन्हें समाज या देश की कोई परवाह नहीं है। इन्हें केवल अपने स्वार्थ से मतलब है। इन्हीं में ऎसे भी खूब सारे हैं जिनसे चाहो जो लिखवा लो, जिस तरह से लिखवा लो, लिख देंगे। इन्हें अपनी विश्वसनीयता से कोई मतलब नहीं है। इनका पूरा और पक्का विश्वास गांधी छाप पर ही रहा है और रहेगा। इसलिए इनकी सिद्धान्तहीनता को दोष न दें। इनकी अपनी कोई विचारधारा नहीं होती। जमाने की धार के अनुसार चलते और मुड़ते रहते हैं। इस दृष्टि से इनका लेखन और संभाषण सब कुछ व्यभिचारी परम्परा को परिपुष्ट करता चलता है।
लेखन और भाषणों में आजकल सत्य, नीति एवं न्याय का कोई कतरा नहीं रहा, इसीलिए इनका कोई प्रभाव जनमानस पर नहीं पड़ रहा। चाहे कितना ही लिख डालो, भाषणों और उपदेशों की बरसात करते-कराते रहो, लेकिन सब बेकार। कारण कि इनमें ऊर्जा रही ही नहीं। बोलने और लिखने वालों से लेकर सुनने और पढ़ने वालों तक को पता है कि जो कुछ बोला या लिखा जा रहा है वह औरों को उल्लू बनाने के लिए सस्ते मनोरंजनात्मक अभिनय और नौटंकी से कम नहीं है। अन्दरखाने सब एक हैं। केवल कहने-सुनाने और लिखने-लिखवाने के लिए कुछ टोटकों का सहारा लेना पड़ता है। यह इन सभी पक्षों की मजबूरी है।
लेखन का स्व चरित्र से अन्तर्सम्बन्ध समाप्त होता जा रहा है और उसका परिणाम यह हो रहा है कि कहीं तो आत्ममुग्ध बने रहने का सुकून पाने के लिए अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों का सहारा लिया जा रहा है और कहीं औरों को खुश करने या कि सबक सिखाने या सीख लेने का संदेश देने के लिए लिखा जा रहा है।
असल में जो सत्य है, अनुभवगम्य है, जो लिखा या बोला जाना चाहिए, उस पर सारे उपेक्षित रवैया ही अपनाए हुए हैं। इस विवशता के पीछे स्वार्थ, भय, दबाव, प्रलोभन और कायरता भी हो सकती है और अपने आपको सकारात्मक मानने-मनवाने और दिखाने के चोंचले भी। यह जरूरी नहीं है कि खुद की छवि को सकारात्मक एवं मंगलकारी बनाए और बताए रखने के लिए धर्म, सत्य, नीति और न्याय आधारित लेखन या संभाषण से बचा जाए, और केवल लिखने या बोलने भर के लिए एक बिकाऊ, पालतु और कायर बुद्धिजीवी की तरह ढुलमुल रहते हुए ऎसा लिखा जाता रहे कि कोई नाराज न हो।
सत्याश्रय के साथ धारदार अभिव्यक्ति करने वाले अब नगण्य होते जा रहे हैं। यह स्थिति समाज और देश के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। इसमें बदलाव लाए बिना हमारा लेखन और संभाषण दोनों ही बेमानी हैं।
