स्मृति शेष- पं. मुरलीधर भट्ट, अपार ऊर्जा, उमंग और उत्साह के पर्याय


निष्काम सेवाव्रत भरे एक युग का अवसान,
अपूरणीय है लोकमंगलकारी युगीन व्यक्तित्व की क्षति
माही, मैया और प्रकृति के इस आँगन में समाज-जीवन के हर क्षेत्र में एक से बढ़कर एक विभूतियों ने अपने कर्मयोग की छाप छोड़ी है। बांसवाड़ा की इस अखूट और अजस्र परम्परा में कई हस्ताक्षर ऎसे रहे हैं जो समाज को रोशनी देने के साथ ही अपने निष्काम कर्मयोग की गहरी छाप छोड़कर बहुत बड़ा शून्य पैदा कर गए हैं। रत्नगर्भा वागड़ वसुन्धरा के इन्हीं रत्नों में एक नाम है- पं. मुरलीधर भट्ट।
अनुकरणीय निष्काम समर्पण
बांसवाड़ा का सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक क्षेत्र हो या समाज सेवा का कोई सा अनुष्ठान। पं. मुरलीधर भट्ट ऎसी शखि़्सयत थे जो सेवा कार्यों में हर कहीं आसानी से नज़र आ ही जाते।
निष्काम कर्मयोगी की तरह समाज के लिए जीने वाले लोगों की लगातार होती जा रही भारी कमी के मौजूदा दौर में भट्ट का समग्र जीवन स्वार्थ और आत्मकेन्दि्रत वर्तमान पीढ़ी को नई दिशा देने लायक प्रेरणा जगाते रहने में समर्थ है। न कुछ पाने की तमन्ना, न पब्लिसिटी की भूख या तस्वीरों की प्यास। जो कुछ करना है उसे भगवान का काम समझ कर किया और भगवान को ही समर्पित कर दिया।
निष्काम कर्मयोगी मुरलीधर भट्ट का जन्म 24 अप्रेल, 1927 तद्नुसार आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को बांसवाड़ा के संस्कारित सहस्र औदीच्य ब्राह्मण परिवार में दुर्गाशंकर भट्ट के घर श्रीमती नर्बदाबाई की कोख से हुआ।
अदम्य साहस के आगे बौनी हो गई चुनौतियां
पं. मुरलीधर भट्ट के सम्पूर्ण जीवन को देखा जाए तो यही सामने आता है कि जीवन और जगत की ढेरों चुनौतियों ने हर क्षण उनकी कठोर परीक्षा ली लेकिन भगवान भोलेनाथ के प्रति अनन्य आस्था और सकारात्मक सोच के साथ उन्होंने हर संघर्ष पर सहजतापूर्वक तथा धैर्य एवं गांभीर्य के साथ विजय पायी और आगे बढ़ते रहे। यह उनका अद्भुत जीवट ही था। अन्यथा एक सामान्य व्यक्ति समस्याओं का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, वह समय से पहले ही टूट जाता है।
पाँच भाई एवं एक बड़ी बहन के साथ पले-बढ़े भट्ट की बड़ी बहन का स्वर्गवास हो चुका है। उन्हें ज्येष्ठ पुत्र के वियोग जैसा महान वज्रपात भी झेलना पड़ा है। इतने संघर्षों के बावजूद उनका समग्र जीवन चट्टानी व्यक्तित्व और समाज के लिए जीने की भावना का ही परिचय देता है।
बचपन से ही कुशाग्र बौद्धिक क्षमता
मुरलीधर भट्ट की प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा बांसवाड़ा रियासत के जमाने मेें किंग जार्ज पंचम हाई स्कूल में हुई। जहाँ से उन्होंने सन् 1942 में आठवीं कक्षा उत्तीर्ण की। स्कूल के हेडमास्टर ने श्रेष्ठ चरित्रवान और आदर्श छात्र के रूप में उन्हें सम्मानित किया और प्रशंसा पत्र में लिखा कि भट्ट ने अत्यन्त स्वाध्यायी और प्रतिभावान छात्र के रूप में ख़ासी पहचान कायम की और आउटडोर गेम्स व स्पोर्ट्स तथा सहशैक्षिक प्रवृत्तियों में अपना हुनर दिखाया।
संघर्षों के साथ पढ़ाई कर पाया मुकाम
आगे पढ़ने की दिलचस्पी के बावजूद परिवार की आर्थिक हालात कमजोर होने की वजह से उन्होंने नियमित की बजाय प्राईवेट छात्र के रूप में पढ़ाई जारी रखी, साथ ही घर-परिवार को सहयोग देने कहीं न कहीं नौकरी धंधे में लगे रहे। स्वयंपाठी परीक्षार्थी के रूप में उन्होंने सन 1951 में हाई स्कूल व वर्ष 1954 में बोर्ड ऑफ सैकेण्डरी एजुकेशन अजमेर से इन्टरमीडियेट परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1965 में गुजरात विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि प्राप्त की।
राजतंत्र और लोकतंत्र दोनों का अनुभव
स्वयंपाठी छात्र के रूप में अध्ययन को जारी रखते हुए नौकरी के जरिये उन्होंने घर-परिवार को आर्थिक सम्बल दिया। 1942-43 में गांवों में सेटलमेन्ट अमीन के साथ रह कर बन्दोबस्त का काम सीखा और वर्ष 1944 में तत्कालीन बांसवाड़ा रियासत में आठ रुपए मासिक पगार पर महकमा बन्दोबस्त में ही मोहर्रिर पद पर नौकरी कर ली।
सन् 1946 में बांसवाड़ा रियासत के टेक्सटाइल डिपार्टमेन्ट में इंग्लिश क्लर्क के पद पर 10 रुपए माहवार पर नियुक्ति पाई। तत्कालीन सिविल जज राजेन्द्र प्रसाद ने उनकी सेवाओं से खुश होकर 11 मार्च 1946 को उन्हें प्रशंसा पत्र प्रदान किया। रियासतों का विलीनीकरण होने पर जब टेक्सटाइल विभाग सिविल सप्लाई विभाग में समाहित हो गया तब भट्ट इस विभाग में कनिष्ठ लिपिक के पद पर 1947-48 से 1953 तक काम करते रहे।
27 साल तक एक ही जगह, लगातार सेवा
सन् 1954 में आप राजस्व विभाग में आ गए और अपनी सेवानिवृत्ति अप्रेल, 1982 तक बांसवाड़ा कलक्ट्री कार्यालय में रहे। इस दौरान वरिष्ठ लिपिक व कार्यालय सहायक से लेकर कार्यालय अधीक्षक के पद पर उल्लेखनीय सेवाएं दी। एक ही स्थान पर एक ही विभाग में 27 वर्ष तक लगातार बिना किसी व्यवधान के उत्कृष्ट सेवाएं देने का रिकार्ड उनके नाम कायम है।
कर्मयोग की खूब तारीफ
बांसवाड़ा कलेक्ट्री में दीर्घकालीन सेवाएं देते हुए उन्होंने अपने माधुर्यपूर्ण व्यवहार और कत्र्तव्यपरायणता का जो परिचय दिया है वह सरकारी क्षेत्र में सेवाएं देने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकता है। गणतंत्र दिवस 1982 को तत्कालीन राज्यमंत्री कमला भील के हाथों जिला प्रशासन द्वारा प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।
बेहतर कार्यशैली के धनी अजातशत्रु
बांसवाड़ा जिला कलक्ट्री में कार्यालय अधीक्षक के रूप में आपने बारह वर्ष तक अपनी सेवाएं दीं और श्रेष्ठ अधीक्षक के रूप में ख़ासी पहचान कायम की। इस दौरान् जो भी कलक्टर आए उन्होंने भट्ट के काम-काज और व्यवहार को तहे दिल से स्वीकारते हुए तारीफ की और पीठ थपथपाई।
सर्वश्री एमएमके वली, इन्द्रजीत खन्ना, वी.आई. राजगोपाल, एल.सी. गुप्ता सहित कई कलक्टरों ने खुश होकर अपनी ओर से उन्हें प्रशंसा पत्र प्रदान किए। गणतंत्र दिवस-1982 को तत्कालीन जिला कलक्टर दयाशंकर शर्मा ने उत्कृष्ट राजकीय सेवाओं और कत्र्तव्यपरायणता के लिए विशिष्ठ सेवा सम्मान प्रदान किया।
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की 5 व 6 फरवरी 1975 की बांसवाड़ा यात्रा के दौरान् कठोर परिश्रम और लगन से कार्य करने के उपलक्ष में भट्ट को 14 अपे्रेल 1975 को तत्कालीन जिला कलक्टर बी.एस. मिन्हास ने प्रशंसा पत्र जारी किया। इसके साथ ही राज्य सरकार के विभिन्न अभियानों में उल्लेखनीय कार्य संपादन के लिए उन्हें बीसियों बार जिला कलक्टरों और ऊपर के अधिकारियों ने सम्मानित किया।
युवाओं जैसा जोश
भट्ट के लिए बढ़ती उम्र कभी कोई चुनौती नहीं रही बल्कि 94 वसंत देख चुके मुरलीधर में भीतर हिलोरें लेता रहा उत्साह और उमंग अंतिम समय तक बरकरार रहा। हर पल तरुणों जैसी ऊर्जा और सेवा कार्यों के प्रति निष्ठा का उत्साह इतना कि युवा भी उनके आगे अपने आपको बौना महसूस करते रहे। समाज और अंचल की सेवा तथा परोपकार का पुण्य इतना अधिक प्रगाढ़ रहा कि निरन्तर लोक मंगल के कार्यों में किसी न किसी रूप में निष्काम भागीदारी निभाते रहे।
खिलाड़ी के रूप में पाए पुरस्कार
बचपन से ही तैराकी और बालीबॉल खेलने का शौक रखने वाले भट्ट विद्यार्थी जीवन से लेकर सरकारी क्षेत्र तक विभिन्न अवसरों पर अपने खेल हुनर की धाक जमाते रहे हैं। राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद के तत्वावधान में सत्र 1987-88 में जिला खेलकूद प्रशिक्षण केन्द्र बांसवाड़ा द्वारा जिला खेल सप्ताह के अन्तर्गत 56 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए आयोजित गोलाफेंक प्रतियोगिता में उन्होंने द्वितीय स्थान प्राप्त किया।
इसी दौरान उन्होंने 56 वर्ष से अधिक आयु वालों की 50 मीटर दौड़ में भी द्वितीय स्थान प्राप्त किया। भारतीय खेल प्राधिकरण द्वारा जिला खेलकूद प्रशिक्षण केन्द्र के सहयोग से 27 सितम्बर,1986 को बांसवाड़ा में आयोजित खिलाड़ी कल्याण कोष हित दौड़ में उन्होंने हिस्सा लिया। इस पर महानिदेशक मेजर जनरल नरिन्दरसिंह द्वारा उन्हें प्रमाण पत्र दिया गया।
सेवानिवृत्ति के बाद 14 अगस्त,1988 को भारत की स्वतंत्रता की 40वीं वर्षगाँठ और जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी स्मणांजलि वर्ष पर बांसवाड़ा में आयोजित स्वतंत्रता दौड़ में भट्ट ने हिस्सा लिया। इस पर उन्हें राष्ट्रीय आयोजक श्रीमती शीला दीक्षित के हस्ताक्षर से जारी प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। गणतंत्र दिवस-2004 को बुजुर्गो की दो किलोमीटर दौड़ में भट्ट ने द्वितीय स्थान प्राप्त किया।
अदम्य आत्मविश्वास के धनी
अपने जीवन की उपलब्धियों और बुजुर्गियत में भी ऊर्जा, उमंग और उत्साह के लिए वे दृढ़ आत्मविश्वास, कठोर परिश्रम, कत्र्तव्यपरायणता, सद्व्यवहार आदि के साथ ही वे माता-पिता और गुरुजनों के आशीर्वाद को जीवन लक्ष्य प्राप्ति में बहुत बड़ा सम्बल मानते हैं।
कभी नहीं माना रिटायर्ड
राज्य सेवाओं में रहते हुए और उसके बाद भी मुरलीधर भट्ट की स्पोर्ट्स मेन स्पीड लगातार बरकरार रही है। आम सरकारी नुमाइन्दों की तरह उन्होंने अपने को कभी रिटायर्ड नहीं माना बल्कि समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी अदा करना शुरू किया। शेष रहे पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति के लिए उन्होंने आरएसईबी, सिन्टेक्स मिल, जनजाति निगम और बीमा विभाग को भी अपनी सेवाएं दी।
पेंशनरों की सेवा में समर्पित
सरकारी सेवाओं से मुक्ति के बाद पेंशनर समाज के तत्कालीन अध्यक्ष एवं सामाजिक चिंतक स्व. अक्षयलाल भट्ट के साथ जुड़ कर पेंशनर समाज का कार्य करना आरंभ किया।
बांसवाड़ा जिला पेंशनर समाज में मंत्री के रूप में उन्होंने बरसों तक लगातार सेवाएं दी। पेंशनरों के कल्याण और उनकी सेवाओं के प्रति समर्पण को जीवन का लक्ष्य बनाने वाले भट्ट ने पेंशनर समाज में श्री रामचन्द्र दोसी के अध्यक्षीय कार्यकाल में जुलाई 1993 में मंत्री पद सम्भाला और पेंशनरों के घर द्वार पहुंचकर सदस्यता अभियान चलाने के साथ ही शाखा के भवन निर्माण व अन्य अवसरों पर धन सहयोग जुटाने में अग्रणी रहे।
यह भट्ट की सर्वस्पर्शी कार्यशैली और साथियों के सहयोग का ही कमाल था कि बिना किसी बाहरी सहायता के 3-4 लाख रुपए की धनराशि एकत्रित करा कर बांसवाड़ा में जिला कलक्ट्री के पास भव्य पेंशनर भवन का निर्माण हो पाया। पेंशनरों की समस्याओं के निराकरण, फिक्सेसन कराने, मेडीकल राशि स्वीकृत कराने, कम्प्यूटेशन रेस्टोरेशन, पारिवारिक पेंशन स्वीकृत कराने आदि में उनकी भूमिका श्रेष्ठ समाजसेवी के रूप में खास पहचान रखती है। बरसों तक पेंशनर समाज कार्यालय में सेवाएं देते हुए वे पेंशनरों के हितों में जुटे हुए रहे।
सन् 2004 में पेंशनर समाज बांसवाड़ा जिला शाखा को जयपुर में आयोजित राज्य स्तरीय समारोह में उत्कृष्ट कार्यो के लिए राज्य स्तर पर प्रमाण पत्र एवं शील्ड प्रदान कर पुरुस्कृत किया गया। यह सम्मान पेंशनर समाज के जिला महामंत्री मुरलीधर भट्ट ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन.एल. टिबेरवाल और राजस्व मण्डल के पूर्व अध्यक्ष आई.सी. श्रीवास्तव से प्राप्त किया।
अहर्निश सेवामहे ही प्रमुख ध्येय
बांसवाड़ा शहर में भोर की पुण्यवेला में लोगों को जगाने और भगवन्नाम संकीर्तन से श्रवण माधुर्य से रूबरू कराने के नियमित अनुष्ठान में जुटी श्री हरिबोल प्रभात फेरी मण्डल का अध्यक्षीय दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया। मण्डल परिवार द्वारा रोजाना प्रातः पांच से छह बजे तक नगर के विभिन्न मोहल्लों व मार्गो में सत्संग व हरि भजन के दिव्य वातावरण का सृजन किया जाता रहा । कई वर्षों से यह क्रम बना हुआ है।
पाण्डित्य में अग्रणी, मुग्धकारी भजन गायकी
रोजाना संध्या-पूजा और अपने घर के समीप सिंगवाव स्थित केदारेश्वर महादेव और कपिल गणेश मन्दिर पहुंच कर दर्शन और विधि-विधान से पूजा का उनका क्रम बचपन से लेकर अंत तक जारी रहा। कर्मकाण्ड और पाण्डित्य में अग्रणी पं. मुरलीधर भट्ट ने अपने जीवन में कई अनुष्ठानों और सामूहिक धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लिया। पूजा-पाठ और अनुष्ठानों के दौरान मधुर स्वर में तरन्नुम के साथ उनकी भजन गायकी का हर कोई लोहा मानता था।
अग्रिम पंक्ति के सच्चे समाजसेवी
सामाजिक कार्यो में सदैव अग्रणी रहने वाले भट्ट ने बांसवाड़ा सहस्र औदीच्य समाज में तीन वर्ष तक मंत्री पद पर रह कर सामाजिक सेवाओं को नई दिशा दी। इसके अलावा गायत्री मण्डल, बांसवाड़ा जिला गौ सेवा संघ और वागड़ प्रान्तीय शिक्षा प्रचार-प्रसार समिति के आजीवन सदस्य के रूप में वैदिक संस्कृति, कर्म काण्ड, प्राच्य विद्याओं, गौ सेवा और बहुआयामी सामाजिक सरोकारों की गतिविधियों में समर्पित शख्सियत के रूप में मुरलीधर भट्ट का नाम दशकों तक जाना पहचाना रहा।
गणेश मण्डल, भागवत समिति, प्रदोष मण्डल सहित धर्म, संस्कृति और समाज सेवा के कई आयामों में उनकी सक्रियता हर कहीं महसूस की जाती रही। औदीच्य समाज के संरक्षक के रूप में उन्होंने दशकों तक मार्गदर्शन प्रदान किया। जीवन के अंतिम समय में 94 वें वर्ष की आयु में भी उनकी सक्रियता, उत्साह और समाज के लिए कुछ करने का ज़ज़्बा अनुकरणीय बना रहा।
ऋषि की तरह जीवन निर्वाह
ऋषि की तरह जीवन भर तपस्या में लीन रहे पं. मुरलीधर भट्ट की रचनात्मक गतिविधियों से भरी सम्पूर्ण जीवनयात्रा 13 मई 2021, गुरुवार को थम गई, जब उन्होंने अहमदाबाद में अंतिम साँस ली और शिवलोेक की ओर प्रस्थान कर लिया।
पं. मुरलीधर भट्ट किसी पहचान के मोहताज नहीं रहे, उनका सेवाव्रत, लगातार जनसेवा और परोपकार तथा हर किसी को सहयोग-सम्बल प्रदान करने का उनका ज़ज़्बा ही ऎसा था कि हर कोई उनका कायल था। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों तक निष्काम सेवा का संदेश गुंजाता रहेगा। जीवन में सेवाव्रत को अपनाते हुए जरूरतमन्दों के चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए जीवन होम देने का संकल्प ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।
