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साहित्य
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राज-काज का रायता, सुशासन का सूप

Deepak Acharya
Deepak Acharya
October 12, 2025
राज-काज का रायता, सुशासन का सूप

तरकीब का तानपुरा

बात पक्की और सौ फीसदी सच है। सरकारी जँवाइयों और फूफे-फूफियों के नखरे भी खूब होते हैं और बहाने भी, और तरकीबें भी ऐसी-ऐसी कि सुनने वाला हतप्रभ हुए बिना नहीं रह सकता। बहुधा देखा यह जाता है कि राज्य मुख्यालय यानि की राजधानियों में नौकरी कर चुके तनख्वाहभोगियों का रुतबा जिलों में पदस्थापित वेतनभोगियों से कुछ ज्यादा बड़ा और असरदार माना और समझा जाता है अथवा भ्रम रहता है।

राज्यों की राजधानी में कार्यरत अफसरों और कर्मचारियों का तबादला किसी जिले में हो जाने की स्थिति में वे अत्यन्त दुःखी और अवसादग्रस्त हो जाते हैं और बेमन से काम करने की आदत पाल लेते हैं। इनका एकसूत्री एजेण्डा यही रहता है कि किसी न किसी तरह वापस तबादला करवा लें अथवा बहानों पर बहाने बनाते हुए घर का रुख करते रहें।

इनके बहाने और तर्क भी अजीबोगरीब होते हैं। माँ-बाप की बेकद्री करने वाले माँ-बाप की सेवा के नाम पर और कई सारे बीमारू होने के कारण परेशान रहने के बहाने बनाते हुए इसी जुगाड़ में लगे रहते हैं कि चाहे जैसे भी हो, वापस राजधानी पहुंच जाएं। और जब तक तबादला न हो, ये लोग कभी बीमारी के बहाने, और कभी किसी न किसी रिश्तेदार की मौत के बहाने गोतावकाश का भरपूर आनन्द लूटते रहते हैं।

साथी और सम्पर्कित भी जरूरत से कहीं अधिक इतने संवेदनशील होते हैं कि इन लोगों को बर्दाश्त करते रहते हैं। ये सभी को इसी भ्रम में रखते हैं कि जल्द ही तबादला हो जाएगा। इसी चक्कर में दूसरे लोग झेलते रहते हैं। और इसी का फायदा उठाकर ये राजधर्मी मौज उड़ाते हुए मुफ्त की तनख्वाह लेते रहते हैं।

एक बार की बात है। राजधानी से एक अफसर का ट्रांसफर किसी एक जिले में हो गया। वो अफसर काफी दिन तक जोईन करने ही नहीं आया। तबादला केंसल कराने की कोशिश में जुटा रहा। लेकिन कुछ नहीं हो पाया तो जोईन करने आखिर आ ही गया। आया तो उसकी दांयी टांग में पीओपी का पट्टा बंधा था और धीरे-धीरे इस तरह चलता हुआ आफिस पहुंचा, जैसे कि भयंकर एक्सीडेंट हो चुका हो।

नए साहब के आगमन व जोइनिंग की फोटोग्राफी हुई। साहब ने जोईन करते ही कह दिया कि पांव की तकलीफ के कारण वे वापस जा रहे हैं, कुछ दिन संभाल लेना। ठीक होते ही लौट आउंगा।

महीना भर स्टाफ ने निभा लिया लेकिन कोई बड़ा फंक्शन होने से उन्हें आने को कहा गया। इस बार साहब आए तो पांव में पट्टा बंधा हुआ था। सबको लगा कि साहब का पांव अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है इस कारण से प्लास्टर ऑफ पेरिस का पट्टा अभी तक बंधा हुआ है।

साहब दो-तीन दिन फंक्शन अटेण्ड करने रुके, वहां भी वीआईपी के साथ फोटोग्राफी हुई। फंक्शन अच्छी तरह से निपट गया और साहब फिर एक्सीडेंट में पांव की परेशानी की बात कहकर लौट गए।

दो-तीन दिन बाद सरकारी फोटोग्राफर फोटो की एलबम और बिल लेकर ऑफिस आया। सभी ने एलबम देखी। इसी बीच मोटे काँच का चश्मा लगाए बुजुर्ग चपरासी ने रहस्यमय दृष्टि से एलबम के फोटो दिखाकर सभी को बताया कि साहब जब जोईन करने आए थे तब दांयी टांग पर पट्टा बंधा था लेकिन इस बार जब आए तो बांयी टांग पर पट्टा बंधा था। स्टाफ के साथ ही वहां मौजूद सभी लोगों ने इसे देखा और दाँतों तले अंगुली दबा दी।