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साहित्य
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कुत्ते भी शरमाते हैं इन बदतमीजों को देखकर

Deepak Acharya
Deepak Acharya
September 3, 2021

दुनिया की लगभग आधी से अधिक आबादी आजकल बीमारी के हालातों में जीने को विवश है और उसका मुख्य कारण है बदतमीज लोगों का आसुरी व्यवहार। संवेदनहीन, क्रूर और मानवीय मूल्यों से हीन चेहरे जब किसी ओहदे, मुखौटे या प्रतिष्ठा को पा जाते हैं, पूर्वजों के पुण्य या पूर्व जन्मों के किसी एकाध पुण्य या भाग्य से आम से खास कहलाने लगते हैं तब उनका व्यवहार इंसान जैसा नहीं रहता बल्कि इन लोगों में हमें तमाम प्रकार के जंगली और हिंसक जानवरों तथा सारे युगों के असुरों का निचोड़ लबालब भरा हुआ मिलता है।

बहुत कम लोग होते हैं जो प्रभुता पाकर भी विनम्र बने रहते हैं और समाज तथा देश के काम आते हैं। आजकल बहुत सी जगहों पर ऎसे-ऎसे लोग विराजमान हैं जिनमें विनम्रता, शालीनता और गांभीर्य भाव गायब हैं और इनका स्वभाव, व्यवहार और रोजमर्रा की आदतें देखकर श्वान भी लज्जित हो जाएं और राक्षस भी।

क्योंकि ये दुनिया की तमाम प्रकार की आसुरी शक्तियों और खूंखार जानवरों का कॉकटेल या मिक्चर हो जाते हैं जिन्हें देख कर कहीं से नहीं लगता कि ये इन्सान हैं। अहंकार और संवेदनहीनता के संक्रमण से ग्रस्त ये लोग एड्स और छुआछूत की तमाम बीमारियों को भी मात कर जाते हैं।

इनमें बहुत से अपने आपको अधीश्वर मानते हैं, बहुत से अधीश्वरों के अनुचर, खूब सारे चाकरों के नौकर और बाकी बचे हुए सारे के सारे नौकरों के चाकर, गुलाम और झूठन चाटने-चटवाने वाले हैं।

इन लोगों की सबसे बड़ी बीमारी यही है कि ये इन्सान को इन्सान नहीं समझते। और इंसानों से इतना अधिक रूखा और प्रताड़नापूर्ण व्यवहार करते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। लगता है कि कबीलाई जंगली लोगों का पुनर्जन्म ही हुआ हो और पहले के जन्मों के कुलक्षण ये अब तक भुला नहीं पाए हैं।

इन हालातों को देखकर लगता है कि दुनिया के मुल्क स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और प्रजा सापेक्ष केवल कहे जाते हैं, वास्तव में हैं नहीं। विश्व भर में बीमारियों का स्वतंत्र और निरपेक्ष अध्ययन किया जाए तो साफ-साफ सामने आ सकता है कि अधिकांश बीमारियों का मूल कारण वे बड़े लोग हैं जिनकी अहंकारी मनोवृत्ति, शोषण भरा आसुरी व्यवहार और अधीश्वरवादी मनोविज्ञान उछाले मारने लगे हैं और इसी कारण वे सामने वालों को इंसान की बजाय अपना जरखरीद गुलाम समझते हैं।

संस्कृति और संस्कारों से दूर-दूर का रिश्ता नहीं रखने वाले कई लोग जब किसी मुख्य धारा में टकसाली ओहदा पा जाते हैं, प्रतिभाशून्यता के बावजूद कुछ बन जाया करते हैं, वर्णसंकरता के कारण कुल और वंश परंपरा के सिद्धान्तों और संस्कारों से नाता तोड़ लेते हैं तब इनमें मौलिक मानवता का इतना अधिक क्षरण हो जाता है कि ये जमाने भर में अपने आपको ही अंग्रेज लाटसाहबों की तरह अधिनायक समझ बैठते हैं और इसका खामियाजा पूरा समाज व देश भुगतता है।

आजकल ऎसे जाहिल अधीश्वरों की प्रजाति के जीव अक्सर सभी स्थानों पर देखने को मिल जाते हैं जिनकी वजह से समाज और देश दुःखी है। इस किस्म के आसुरी ऑक्टोपसों की दूषित और घातक वाणी, अभद्र व्यवहार और सज्जनों के साथ इनका दुव्र्यवहार आम बात हो गया है। लेकिन कलियुगी माया के कारण इन पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।

कहा जाता है कि अभयारण्य के सारे हाथी, घोड़े और गधे आदि जानवर जब आंशिक, आधे या सम्पूर्ण उन्मादी हो जाते हैं तब वह अभयारण्य न होकर महा भयारण्य हो जाता है। दुनिया में आजकल यही स्थिति है जहाँ जिसके पास लाठी आ गई, जिसकी जेब भारी हो गई और जिसे कोई ताज या पॉवर मिल गया, वह अपने आपको शक्तिशाली, अजर-अमर और संप्रभु मानकर वह सब कुछ करने-कराने लग जाता है जो मानवता के लिए खतरा माना जाता है।

आजकल संसार भर में सबसे ज्यादा कोई खतरे में है तो वह है मानवता। इस मानवता का इतना अधिक ह्रास होता चला जा रहा है कि अब आदमी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जिसकी छवि पाक-साफ और श्रेष्ठ दर्शायी जाती है वह खाल में छिपा लोमड़ भेड़िया और नरभक्षी साबित होता है।

आदमी बाहर से जितना अच्छा लगता है उतना होता नहीं बल्कि कई-कई बार तो हमारी कल्पनाओं से भी अधिक भयावह, क्रूर, अन्यायी और शोषक सिद्ध होता है। इस तरह के लोग जब जगत में व्यवहार करते हैं तब पूरा का पूरा जगत इनसे त्रस्त हो उठता है।

ऎसे राक्षसों की हर बात में आसुरी भाव झलकता है, हर कर्म में राक्षसी स्वभाव नज़र आता है और इनके आस-पास केवल वे ही लोग टिक पाते हैं जो कि इनकी ही तरह राक्षसी स्वभाव वाले, इनकी हर बात मेंं हाँजी-हाँजी करने वाले और इनकी झूठन का स्वाद ले लेकर इनका जयगान करने वाले हों, बैण्डवादकों की तरह इनके आगे-आगे हरकारों की तरह चलने वाले हों या फिर निष्ठुर, निर्लज्ज और निहायत संवेदनहीन हो चुके हों।

अधिकांश परिश्रमी, सज्जनों और अच्छे लोगों को यही शिकायत रहती है कि वे जिनके साथ काम करते हैं या जिस किस्म के लोगों से उनका किसी न किसी प्रकार से पाला पड़ता है वे राक्षसों से भी गए-बीते हैं और उनके साथ काम करना बड़ा ही मुश्किलों से भरा हुआ है।

संवेदनशील और पूर्ण निष्ठा एवं ईमानदारी से काम करने वाले सज्जनों का यह भी मानना है कि इन्हीं असुरों की वजह से अच्छे लोगों को हर दिन बेवजह तनाव झेलना पड़ता है और इन फालतू के तनावों की वजह से कई प्रकार की बीमारियां घेर लेती हैं और इन्हीं पैशाचिक स्वभाव वाले बड़े और प्रभावशाली कहे जाने वाले लोगों की अमानवीय हरकतों के कारण जीवनीशक्ति का क्षरण होकर लोग पूर्ण आयु प्राप्त कर पाने से पहले ही काल कवलित हो जाते हैं।

दुनिया का कोई सा हिस्सा हो, इस तरह से तनावों का जाल, और इससे बीमारियों का नेटवर्क बनना तथा नागरिकों का असामयिक अवसान चिन्ता का बड़ा भारी विषय है। इसे केवल एक दिन योग करने मात्र से सुधारा नहीं जा सकता।

हर क्षेत्र में बीमारियों के मूल कारणों को जानने की आवश्यकता है और इसका निदान किया जाना जरूरी है। इन हालातों को देखकर लगता है कि बीमारियों की जड़ में वे लोग हैं जो अपनी प्रतिष्ठा का ग्राफ बढ़ाने औरों के साथ अभद्र भाषा और व्यवहार का इस्तेमाल करते हैं, इंसान के स्वाभिमानी जीवन को ठेस पहुंचाते हैं, जी भर कर शोषण करते हैं, अन्याय ढाते हैं और अधिनायकवादी व्यवहार से जंगलराज या कबीलाई असभ्यता के प्रतिनिधि बने हुए हैं।

कितना अच्छा हो कि हम सभी लोग इंसान को इंसान मानें, उसके स्वाभिमान की रक्षा करें और उसे आदर दें। इससे जगत की आधी से अधिक आबादी मानसिक एवं शारीरिक बीमारियों से मुक्त हो सकेगी।