बांसवाड़ा का अनूठा साहित्य उत्सव - आधी सदी में ही अवसान


श्री मणि बावरा की परम्परा समा गई इतिहास के पन्नों में
विद्वानों के प्रदेश कहे जाने वाग्वर यानि की वागड़ अंचल में संस्कृति, साहित्य और लोक कलाओं का समृद्ध परम्परा होने के साथ ही इन विधाओं से संबंधित विषय विशेषज्ञों और प्रबुद्धजनों की श्रृंखला निरन्तर विद्यमान रही है। कुछ-कुछ समय के अन्तराल में कोई एक-दो विधाएं चरम पर होती हैं, दूसरी विधाएं न्यूनाधिक रूप में प्रचलित रहती हैं।
कुछ वर्षों के अन्तराल में इनसे संबंधित विशेषज्ञ एवं अनुरागी व्यक्तित्वों की सक्रियता और मौजूदगी में आंचलिक धड़कन के सारे पैमाने बदलते रहते हैं। और यह बदलाव ही है जो हर किसी क्षेत्र में उतार-चढ़ाव के साथ नई सीख, सबक और रचनात्मक ऊर्जा देता रहता है।
बाँसवाड़ा शहर में 23 जनवरी का दिन साहित्य जगत के लिए किसी उत्सव से कम नहीं हुआ करता था। साहित्य जगत और प्रबुद्धजनों को साल भर से इस दिन की प्रतीक्षा रहती।
कारण यह था कि हर साल 23 जनवरी की शाम उनके पृथ्वीगंज में होली चौक स्थित आवास पर साहित्यिक साँझ के रूप में खूब जमती। यही इस उत्सव का ठिकाना था। इसमें शिक्षा, संस्कृति और साहित्य से जुड़े प्रबुद्धजनों का जमावड़ा रहता ही रहता।
शिक्षाविद् एवं साहित्यकार श्री मणि बावरा जी का जन्म दिन 23 जनवरी को हुआ करता। सौभाग्य व संयोग से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की जयन्ती का दिन भी वही। अपने जन्मदिन पर सभी साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों को एकत्रित कर उत्सवी साँझ का आनन्द देने वाला यह साहित्य उत्सव साथ ही साथ सुभाषचन्द्र बोस जयन्ती समारोह के रूप में भी हुआ करता था।
सभी को यह पता रहता कि 23 जनवरी का मतलब शाम को बावराजी के यहाँ सालाना आयोजन। साल भर से सभी को उत्सुकता के साथ रहा करती थी 23 जनवरी की प्रतीक्षा। उनके द्वारा डाली गई परंपरा ने बांसवाड़ा ने साहित्य संसार को समृद्ध करने में कोई कमी नहीं रखी। पुराने और नवीन रचनाकारों के मध्य सम्पर्क और स्नेह सेतु स्थापित हुआ तथा प्रोत्साहन के भरपूर अवसरों ने खूब सारी प्रतिभाओं को आगे बढ़ाया। आज के कई रचनाकार श्री मणि भाई के योगदान की देन हैं।
हर बार 23 जनवरी को देर रात तक काव्यगोष्ठी और मुशायरा रंग जमाते। बांसवाड़ा के साहित्यिक इतिहास में 23 जनवरी का दिन मणि बावरा जी की वजह से ऐतिहासिक यादगार दिवस के रूप में समाहित है।
अमिट स्मृति में वाग्वरी सम्मान
साहित्यकाश के कर्मयोगी स्व. मणि बावरा की स्मृति को चिरस्थायी बनाने रखने के लिए उनके परिवार तथा बांसवाड़ा के संजीदा रचनाकारों द्वारा स्थापित ‘दीप शिखा साहित्य संगम’ द्वारा वाग्वरी सम्मान की परम्परा कई वर्षों तक जारी रही। इसके अन्तर्गत हर साल स्व. बावराजी एवं सुभाषचन्द्र बोस की जयन्ती 23 जनवरी के दिन साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए किसी एक हस्ताक्षर को ‘वाग्वरी सम्मान’ प्रदान किए जाने की परंपरा रही।
अब तक वाग्वरी सम्मान से जिन साहित्यकारों को नवाज़ा जा चुका है उनमें छगनलाल नागर, भरतचन्द्र शर्मा, भूपेन्द्र उपाध्याय तनिक, श्याम अश्याम, धनपतराय झा, डॉ. वीरबाला भावसार, प्रकाश पण्ड्या, कमलेश कमल आदि हस्तियां शामिल हैं।
लेकिन कालान्तर में श्री मणि बावरा के निवास पर होने वाला यह साहित्य उत्सव भी बंद हो गया और वाग्वरी सम्मान की परम्परा भी इतिहास में खो गई। इसके ज्ञात-अज्ञात कारणों पर जाना समय नष्ट करना ही है। लेकिन 23 जनवरी की यह साँझ आज भी चीख-चीख कर यह प्रश्न उन लोगों से पूछती है जो श्री बावरा जी के आत्मीय, स्नेही, सम्पर्कित और उनके साथ रहकर आयोजनों में भागीदारी निभाते रहे, 23 जनवरी के आयोजन में दशकों तक जुड़े रहकर काव्यपाठ करते रहे, वाग्वरी सम्मान पाते रहे।
इनमें हम सब भी शामिल हैं जिन्हें लगता है कि हमारा काम मेहमान कलाकारों की तरह है, सारी व्यवस्थाएं दूसरे करें, जाजम से लेकर मंच तक सजाते रहें, और हम अपनी बात कहकर, काव्यपाठ या शायरी गायन कर चले आएं, सम्मान पाकर अभिभूत हुए बिना न रह सकें।
हमने उनके साथ कई वर्ष गुजारे, कुछ सीखा, कुछ पाया, और बहुत कुछ... जिसे दुनिया को जताया नहीं जा सकता। हमारी जिम्मेदारी भी है कि इस परम्परा को आगे बढ़ाएं। लेकिन हमारी संवेदनाएं केवल अपने भाषणों, कविताओं और शायरियों में ही फंसी पड़ी हैं, वहां से बाहर निकलने का नाम ही नहीं ले पा रही।
कूप मण्डूकों सी जिन्दगी और कछुआ ब्राण्ड स्वभाव के चलते हम अपनी रुचि के आयोजनों में अपनी ओर से कोई पहल कभी नहीं करते। न धेला भर खर्च कर पाने की हममें उदारता बची है। फिर हमारी आपसी खींचतान, प्रदूषित प्रतिस्पर्धा और गुटबाजी से उत्पन्न अपने-पराए वाले नखरे और हरकतें भी ऐसी कि हम स्वस्थ कर्मयोग, सुगंधित आयोजन और उत्कृष्ट परिणामों से बढ़कर अपनी निजी प्रतिष्ठा और एकोन्मुखी पब्लिसिटी को ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य और कर्मयोग का आदर्श मान बैठे हैं।
हम सभी को आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति और मकड़िया सोच से बाहर निकल कर अपने सामाजिक सरोकारों को परिभाषित करते हुए अपनी सम्पूर्ण उपयोगिता सिद्ध करने की पहल करनी होगी, तभी हमारी रुचि के विषयों में नई पीढ़ी को अनुकूल माहौल मिल पाएगा और लोक संस्कृति तथा साहित्य की परम्पराएं अक्षुण्ण रह पाएंगी। अन्यथा यही सब चलता रहा तो श्रोताओं तक का अभाव हमें देखने को मिलेगा। आज के ई-युग में किस फुर्सत है हमें सुनने की। आत्मचिन्तन करने की आवश्यकता हम सभी को है।

वो थे तब याद करते, याद रखते हर साल दर साल,
छोड़ कर चले गए तो सब भूल गए भुला दिए गए,
मुगालते में ही जीते रहे वे अपनों के बीच कई साल,
जिक्र आता हर साल पर चूक गए या चूका दिए गए।
