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साहित्य
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पर्व-त्योहारों और सार्वजनिक अवकाशों में नहीं होने चाहिएं सरकारी कार्यक्रम

Deepak Acharya
Deepak Acharya
April 3, 2025

त्योहारों और पर्वां के राजकीय अवकाशों तथा सार्वजनिक अवकाशों में सरकारी कार्यक्रमों, समारोहों और बैठकों का आयोजन शासन-प्रशासन के नेताओं और अफसरों की आदत बनता जा रहा है। इस बुराई की वजह से समुदाय के परम्परागत धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर कुठाराघात हो रहा है।

लगातार बढ़ती जा रही इस शोषणकारी कुप्रथा के कारण अन्य अधिकारियों और कार्मिकों के धार्मिक संस्कारों का न परिपालन हो रहा है न इनकी भागीदारी का पुण्य मिल पा रहा है।

इससे इनके बच्चे और परिवारजन भी धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में चाहते हुए भी भाग नहीं लेने पाने को विवश हैं। इस वजह से परम्परागत नैतिक मूल्यों और संस्कारों का संरक्षण, संवर्धन एवं सहभागिता पर घातक प्रभाव पड़ रहा है।

कई बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन और मेले इन नेताओं की आवभगत और आतिथ्य सत्कार की ही भेंट चढ़ जाते हैं और मूल उद्देश्य तथा श्रृद्धा और आस्था के भाव गौण हो जाते हैं।

सभी जगह त्योहारों और छुट्टियों के दिनों में नेताओं के दौरों, सरकारी समारोहों, जिला प्रशासन की बैठकों और कार्यक्रमों का आयोजन परम्परा बन गया है।

विभिन्न विभागों द्वारा भी सरकारी अवकाशों और त्योहारी छुट्टियों के दिनों में उद्घाटन, शिलान्यास, बैठकों और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का निर्धारण कर लिया जाता है। इससे सरकारी मशीनरी और आयोजनों से जुड़े लोगों के साथ ही नागरिकों को भी अवकाशों का उपभोग नसीब नहीं हो पाता।

इसके साथ ही त्योहारों और पर्वों पर छुट्टियों के बावजूद होने वाले सरकारी आयोजनों की वजह से धर्म और संस्कृति की परम्पराओं के निर्वाह तथा संरक्षण संवर्धन पर भी घातक असर पड़ रहा है।

अवकाश के दिनों में इस प्रकार के सरकारी आयोजनों से मानवाधिकारों का भी खुला शोषण हो रहा है। कई जगह अपने कार्यस्थलों पर परिवार की बजाय अकेले रहने वाले अफसर बाहरी खान-पान और घूमने-फिरने का शौक फरमाने के कारण हर छुट्टी के दिन निरीक्षण और टाईमपास करने के मकसद से बैठकें बुला लेते हैं और निरीक्षण दौरा कर लिया करते हैं।

इससे मातहम अफसर और विभागीय कार्मिक दुःखी रहकर इन्हें कोसते रहते हैं। लेकिन मोटी खाल वाले इन अफसरों पर कोई फरक नहीं पड़ता। अपने कार्यकाल के हर क्षण का मुफतिया सरकारी आनन्द पाना ही इनके जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य रहता है।

इस वजह से पारिवारिक सुख और सामाजिक सम्पर्क पर भी घातक प्रभाव पड़ता जा रहा है और लोग तनाव झेलते हुए मानसिक एवं शारीरिक बीमारी की तरफ बढ़ते जा रहे हैं।

नेताओं और बड़े अफसरों की इस प्रकार की उन्मुक्त, स्वेच्छाचारी निरंकुश प्रवृत्ति पर रोक लगायी जानी चाहिए और उन्हें मानवीय संवेदनाओं, परम्पराओं के प्रति स्वाभाविक अनुराग तथा मानवाधिकारों का पाठ पढ़ाए जाने की जरूरत है। अन्यथा पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था का कबाड़ा हो रहा है और धर्म-संस्कृति के परिपालन पर घातक असर पड़ रहा है।

मंत्री और विभिन्न आयोगों में मंत्री के बराबर दर्जा प्राप्त जिला प्रशासन और विभागीय अधिकारियों को धर्म और संस्कृति और श्रृद्धालुओं की आस्था की बजाय अपने स्वार्थों से मतलब है और इसी वजह से धर्म-संस्कृति, सामाजिक उत्सव और परम्पराएं इन अफसरों की वजह से हाशिये पर आ रही हैं।

इसी प्रकार धार्मिक उत्सवों, पर्वों, मेलों और विभिन्न धार्मिक सामाजिक आयोजनों में सरकारी खर्च पर नेताओं और अफसरों के आने तथा कार्यक्रम करने पर भी रोक लगना जरूरी है क्योंकि इन नेताओं और अफसरों की वजह से इन मन्दिरों, आश्रमों और मठों में दर्शनार्थ तथा पूजा-अर्चना के लिए जाने वाले वास्तविक श्रृद्धालुओं और आम दर्शनार्थियों को अपने धार्मिक कर्म पूर्ण करने में काफी दिक्कतें आती हैं और कई घण्टों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

कई जगह देखा गया है कि विधर्मी मानसिकता और नास्तिक नेताओं और अफसरों द्वारा जानबूझकर धार्मिक पर्व-त्योहारों, दीवाली, होली, राखी, नवरात्र आदि पर ही अपने दौरे और कार्यक्रम निर्धारित किए जाते हैं। ताकि धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं पारिवारिक आयोजनों में लोग भाग नहीं ले सकें और अपने इर्द-गिर्द ही व्यस्त रहें।

इक्का-दुक्का नेताओं के लिए ट्रॉफिक जाम कर दिया जाता है। इससे श्रृद्धालु हैरान-परेशान हो जाते हैं। इन नेताओं और बड़े अफसरों को चाहिए कि धर्म स्थलों में दर्शन, पूजन और यात्रा के लिए जाएं तो आम नागरिक के रूप में बिना किसी ताम-जाम और सरकारी पदीय अहंकारों से मुक्त होकर जाएं।