प्रारब्ध को प्रेम से भोगें, भगवद् भजन से आत्म कल्याण और मुक्ति की राह पाएं

प्रत्येक मनुष्य का सर्वोपरि परम कर्त्तव्य और जीवन लक्ष्य यही है कि वह ‘‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनं’’ यानि जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का प्रयास करता रहे। संभव है कि यह एक जन्म में न हो पाए, लेकिन आत्मा अमर है और एक बार सच्चे मन और दृढ़ संकल्प से इस दिशा में आगे बढ़ जाने पर उत्तरोत्तर सफलता प्राप्त होने लगती है।
भगवान ने दुर्लभ मनुष्य देह इसीलिए प्रदान की है लेकिन हम आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म एवं ऊर्ध्वरेता होने के भावों को भुला कर वर्तमान शरीर को ही सर्वस्व समझ बैठे हैं, मन और इच्छा के अनुरूप चलते हैं, भोग-विलास से शारीरिक आनन्द पाने और धन-वैभव के संग्रह को ही सम्पूर्ण जीवन का लक्ष्य मान बैठे हैं।
और इसी चक्कर में दिखावों, फैशनी चकाचौंध और वैभव की प्रतिस्पर्धा में अपने आपको सर्वश्रेष्ठ बनाने और समृद्धि, सम्पन्नता को हस्तगत करने के लिए कोल्हू के बैल और चक्कर घिन्नी बने हुए हैं।
इन ऐषणाओं को पूरा करने के लिए दुनिया के सारे वैध-अवैध धन्धों, वर्ज्य कुकर्मों, टोनों-टोटकों, तंत्र-मंत्र, मैली विद्याओं, भूत-प्रेत, जिन्नों, मजारों, भौंपों-भल्लों और भगवान से सीधे संबंध रखने वाले पण्डे-पुजारियों में रस लेते हुए जिन्दगी गुजार रहे हैं।
अपने प्रारब्ध को प्रेमपूर्वक भोगने, ईश्वरीय अनुकंपा पाने और भगवत्प्राप्ति के लिए न सतर्क हैं, न कुछ करना चाहते हैं। हमारे लिए सनातन का मतलब अपनी इच्छाओं, विलासी जीवन की जरूरतों को पूरा करना और अपने आपको परम वैभवशाली बनाने तक सीमित होकर रह गया है। और बाबा लोग, तथाकथित तांत्रिक, भूत-प्रेतों के नाम पर कमा खाने वाले धूर्त्त-मक्कार, टोने-टोटकेबाज हमारी इसी मूर्खता का फायदा उठाकर अपने उल्लू सीधे कर रहे हैं।
दुर्भाग्य से इस प्रकार की स्थितियां हर कहीं पसरती ही जा रही हैं और एक बहुत बड़ा तंत्र-मंत्र व टोना-टोटका बाजार उत्कर्ष पर है जो हवाला कारोबार से कहीं अधिक धन उगाही और मुद्रा के आयात-निर्यात का माध्यम बना हुआ है।
इन विषम और भयावह हालातों में यह जरूरी है कि सनातनधर्मियों को तुच्छ ऐषणाओं के लिए टोने-टोटकों में समय गंवाने, जिन्दगी भर अधकचरे ज्योतिषियों, लोभी-लालची कर्मकाण्डियों, टोटकेबाज पण्डितों, भौंपों, दलालों और भ्रमित करने वाले लोगों से दूर रहने की सीख देते हुए उन्हें भगवान की साधना और भक्ति का मार्ग प्रदान करें।
इसी से जीवन भर की समस्त समस्याओं और अभावों पर विजय प्राप्ति के साथ प्रारब्ध का आसानी से भोग होगा, भक्ति का प्रभाव दिखेगा, भगवान की कृपा प्राप्ति होगी और इहलोक तथा परलोक सुधरेंगे।
इस तथ्य को समझने की आवश्यकता है कि असली धर्म और भक्ति वह है जिसमें न कोई पैसा लगता है, न महंगे द्रव्य। जो आसानी से उपलब्ध है उसका प्रयोग करें। और कुछ न हो तो मानसिक उपचारों के साथ भक्ति का आश्रय ग्रहण करें।
