वाणी से पहचानें, कौन कैसा है ?

व्यक्ति के जीवन में सफलता-असफलता का सर्वोपरि संकेतक है वाणी। इसी से पहचाना जा सकता है कि कौन कैसा है, किस तरह का है और उसका भविष्य क्या होगा।
जब दो या तीन लोग आपस में चर्चा कर रहे हों और उनकी आवाज पन्द्रह-बीस फीट और इससे दूर तक भी सुनाई दे, इसी प्रकार जो लोग बिना जरूरत के जोर-जोर से बोलते हैं, चिल्ला-चिल्ला कर बातें करते हैं, वे नीच किस्म के होते हैं और उनका व्यक्तित्व पीपे की तरह खोखला किन्तु बजते हुए शोर मचाने वाला होता है।
जबकि जो लोग उतना ही तेज बोलते हैं कि पास खड़े या बैठे व्यक्ति तक अच्छी तरह सुनाई पड़े, वे भारी और समृद्ध व्यक्तित्व के धनी होते हैं।
इसी प्रकार जो लोग जरूरत से भी कम वोल्यूम में बोलते हैं वे भ्रष्ट और पाखण्डी होते हैं या फिर अपराधबोध से ग्रस्त अथवा अज्ञात भय से ग्रस्त। इनमें अपवाद संभव है। जिन लोगों की वाणी स्पष्ट नहीं होती, उनमें भी अधिकांश भ्रष्ट और बेपटरी होते हैंं। खूब सारे लोग होते हैं जिनके कण्ठ से वाणी निकलती ही नहीं, बोलते भी हैं तो लगता है कि जैसे मर-मर कर बोल रहे हैं।
वाणी की स्पष्टता न होना किसी न किसी रूप में चित्त या शरीर की अशुद्धि, बुरी आदतों और चतुर स्वभाव का संकेत है। आपस में वार्तालाप धीरे-धीरे करने वाले किन्तु दूसरे लोगों को देखते ही अपने आपको कर्मरत दिखाने की गरज से जोर-जोर से चिल्ला कर काम करने वालों की संख्या आजकल अधिक होती जा रही है। ऎसे लोग कम समय और न्यून परिश्रम में अधिक से अधिक पाने और बिना मेहनत के श्रेय पाने के लिए सदैव आतुर रहा करते हैं।
बातचीत और वाणी का प्रभाव तभी पड़ता है जब व्यक्ति मितभाषी हो, अर्थात् बिना वजह बोलने से परहेज रखने वाला हो। ऎसे व्यक्ति जो कुछ बोलते हैं उनके शब्दों में ऊर्जा समाहित होती है इसलिए कम शब्दों में अभिव्यक्ति होने पर भी इनके शब्दों का असर प्रभावी होता है।
इसके ठीक विपरीत जो लोग अधिक बोलते रहने की आदत पाले होते हैं वे सैकड़ों-हजारों शब्दों का वमन करने के बावजूद न तो अपनी बात को साफ ढंग से समझा सकते हैं, न उनके भाषणों, सीख या किसी भी बात का कोई प्रभाव पड़ता है। इसका कारण यह है कि उनके शब्द ऊर्जा हीन एवं खोखले होते हैं।
वाणी परमाणु ऊर्जा से अधिक समर्थ एवं अपरिमित शक्ति सम्पन्न होती है। ऎसे में इसका जितना कम से कम उपयोग होता है, उतनी दिव्य, माधुर्य और प्रभावकारी होती है। फिर जो लोग मन, कर्म और वचन से सच्चे नहीं होते, उनके भाषणों, उपदेशों, शब्दों या बातों का कोई प्रभाव नहीं होता।
जो लोग सत्याश्रयी हैं उनकी वाणी में ब्रह्मास्त्र की शक्ति होती है। इसलिए ऎसे लोग चन्द शब्द ही कहते हैं और इसका अतुलनीय प्रभाव सामने आता है। इनकी वाणी में न केवल दम होता है बल्कि इनके द्वारा कहे गए शब्द दिमाग और दिल में कई दिनों तक गूंजते रहकर जबर्दस्त प्रभाव छोड़ते हैं।
आज हमारे जीवन में पग-पग पर असफलताएं दिखती हैं, हमारे ईच्छित काम नहीं होते, हमारी कही हुई बातें झूठ साबित होती हैं, हमारे आशीर्वाद और शुभकामनाएं कहीं कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते, हमारे द्वारा दी जाने वाली संवेदनाएं और श्रद्धान्जलियों का कोई प्रभाव दिवंगत आत्मा की मुक्ति में कहीं कोई सहयोग नहीं कर पाते। सब कुछ केवल औपचारिकताओं का झूठा और दिखाऊ नग्न नृत्य होकर रह गया है।
हम आजकल जो कुछ कर रहे हैं वह केवल दिखावे के लिए ही, और वह भी इसलिए कि हमारी छवि लोकप्रिय और सकारात्मक बनी रहे, लोग हमसे खुश रहें और वक्त जरूरत हमारे काम आते रहें। हमारी पूरी जिन्दगी की बुनियाद ही वाणी की सच्चाई पर टिकी है और यह नींव तभी तक मजबूत रहती है जब तक जीवन में सत्य का आश्रय रहे अन्यथा केवल टाईमपास जिन्दगी के सिवा ये दुनिया-जहाँ हमारे लिए कुछ नहीं। जैसे आए थे वैसे ही जाना है, यही सत्य है।
जीवन भर भले ही सत्य से दूर रहे हों, पर अन्ततः राम नाम सत्य होना ही है और इसे भी हम स्वयं सुन नहीं पाते। वे ही बोलते-सुनते हैं जो हमें मरघट तक ले जाते हैं। यह सोचकर कि अंतिम मौका है, निभा लें। फिर तो भूल जाना है, हमेशा-हमेशा के लिए भुला देना है।
जो व्यक्ति जितना अधिक निर्मल चित्त और स्पष्ट वक्ता होता है, उसकी वाणी उतनी ही अधिक मुखर और मधुर होगी। व्यक्तित्व का सबसे पहले प्रभाव मुख और वाणी से ही पहचाना जा सकता है। किसी भी व्यक्ति की बोली से पहचान हो सकती है कि कौन कितना निम्न और हल्का है अथवा कौन कितना शालीन और भारी व्यक्तित्व का है। अनावश्यक जोर-जोर से बोलने वाले लोगों की बुद्धि व स्मरण शक्ति कमजोर रहती है और उनकी मृत्यु दूसरों की अपेक्षा जल्दी होती है।
अपने आपको जानें, आस-पास वालों को जानें तथा मूल्यांकन करें कि हम और हमारे लोगों को सुधरना है या फिर यों ही मृत्यु आने तक टाईमपास विफल जिन्दगी का ही वरण करते हुए बिना किसी भूमिका या उपलब्धि के इस कहावत को सार्थक करना - लौट के बुद्धू घर को आए।
