साहित्यिक यात्रा में वापस
साहित्य
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साहित्यकार कौन ?

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 9, 2022

साहित्यकार का धर्म अपार और अनन्त संभावनाओं से युक्त अपनी सृजन क्षमता से लोक जागरण और समाज को दिशा दर्शन कराकर राष्ट्र को जागृत एवं समर्थ बनाने के लिए नवीन दृष्टिबोध कराना है। सच्चा साहित्यकार वही है जो समाज के हित में निष्काम चिन्तन करता है। ऎसे में साहित्य जगत से जुड़े तमाम लोगों का अहम कर्तव्य है कि वे समाजोन्मुखी प्रवृत्तियों का विस्तार करें और दिग्भ्रमित समाज को लोकमंगल की रोशनी दिखाएं।

सच्चा साहित्यकार वही है जो धन और यश की ऎषणाओं से परे रहकर समाज के लिए चिन्तनशील रहे। निःस्पृह भाव से समाज की सेवा और मार्गदर्शन करने वाले साहित्यकार को समाज से स्वतः ही आत्मीय प्रेम, स्नेह और श्रद्धा प्राप्त होती रहती है।

जो व्यक्ति धन के लिए या पद, प्रतिष्ठा और धन आदि के मोह अथवा किसी अपात्र की प्रशस्ति और मिथ्या कीर्ति के उद्देश्य से साहित्य का सृजन करते हैं, वे और उनका तथाकथित साहित्य कभी कालजयी या आदरणीय नहीं रह सकता। मात्र पैसा पाने के स्वार्थ में रचित साहित्य क्षणिक विकृत मनोरंजन के सिवा कुछ नहीं होता। इस तरह की तथाकथित रचनाएं समाज पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाती।

जो बुद्धिजीवी लक्ष्मी का चिन्तन करता है, सरस्वती उसका साथ छोड़कर चली जाती है। धन के लिए भटकने वाला सृजनकर्मी साहित्यकार नहीं होता बल्कि उसे ‘शब्दों का सौदागर’ कहा जाना चाहिए।

निराला, भारतेन्दु आदि के नाम गिनाते हुए कहा जा सकता है कि असली साहित्यकार जिन्दगी भर निर्धनता के दौर से गुजरते हैं लेकिन इनका कालजयी साहित्य उन्हें युगों तक यश की समृद्धि दिलाता रहता है।

जिन लोगों के पास धन होता है उनके पास समाज के पथ प्रदर्शन का सामथ्र्य नहीं होता क्योंकि धनिकों के पास सरस्वती नहीं हुआ करती। इसलिए वे तमाम ऎश्वर्यों और समृद्धि के बावजूद निर्धन होते हैं।

जब भी प्रताप पैदा होते हैं उनके बाद ही भामाशाहों का जन्म होता है। इसलिए समाज में प्रताप पैदा करने की जरूरत सबसे पहले है। बगैर प्रताप के भामाशाहों का कोई वजूद नहीं होता। धन समृद्ध लोगों को चाहिए कि वे उलूक वाहना लक्ष्मी की बजाय गजलक्ष्मी की आराधना करें ताकि उनका धन समाज हित में काम आ सके।