इन्हें कोई कुछ न कहे, जो कर रहे हैं वो करने दो तो खुश, वरना बेहिसाब भौंकने-गुर्राने लगेंगे

पूरे देश में ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों की भरमार है जिनका समाज और देश की उन्नति, सेवा और परोपकार से कोई लेना-देना नहीं।
अपने स्वार्थों को पूरा करने, वैध-अवैध लाभों को पाने, बेहिसाब धन जमा करते हुए जमीन-जायदाद अपने नाम करने और अपनी ही अपनी ढपलियों और जंग लगे नाकारा पीपों को बजाते हुए लोगों को उल्लू बनाते हुए ताजिन्दगी सम्मान पाते रहना ही इनका जीवन लक्ष्य है।
इनका ज्ञान, बुद्धि और अनुभव केवल अपना घर भरने के ही काम आता है, न समाज के लिए ये किसी काम के होते हैं, न अपने क्षेत्र या देश के। यहां तक कि अपने परिवार, मित्रों और बंधु-बांधवों के लिए भी ये किसी काम के नहीं। इनके पापों और कुकर्मों का जहां कहीं जिक्र होता है, ये भड़क उठते हैं और नसीहत देने लगते हैं कि जैसा चल रहा है, चलने दो, तुम्हारा क्या जाता है।
इनके पूर्वज भी खुदगर्ज होने से सत्य बोल नहीं पाए, बर्दाश्त करते गए और इसी पैशाचिक धाराओं में बहते चले गए। उन्होंने बुरे को बुरा नहीं कहा, अच्छे को अच्छा कहकर कभी स्वीकारा नहीं।
इसी का परिणाम है कि आज हमारे आस-पास दुष्टों, धूर्त-मक्कारों और बेईमान चोर-लूटेरों और डकैतों की फौज बढ़ती ही जा रही है। अपने आनुवंशिक दोष को ये ही लोग आगे बढ़ा रहे हैं।
इन्हें पता नहीं कि इनके नालायक और स्वार्थी पुरखों की उदासीनता, तटस्थता, मक्कारी और धूर्त्तताओं की वजह से आज देश का माहौल बिगड़ता जा रहा है। ये अपने समय में गलत-सलक कामों के प्रति चेते होते तो आज की पीढ़ी सुधरी हुई होती।
