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स्मृति शेष - बहुआयामी कर्मयोगी श्री महेश पुरोहित

Deepak Acharya
Deepak Acharya
May 15, 2021

श्री महेश पुरोहित, वह हस्ताक्षर जिन्होंने समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से लेकर लोक जीवन, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और कला आदि तमाम क्षेत्रों में अपनी गहरी पैठ बनाई और इनमें गहरे तक डूबकर चुन-चुन कर मोती लाकर दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किए।

आज भी सहसा यह विश्वास नहीं हो पा रहा, यह सुनकर कि श्री महेश पुरोहित अब हमारे बीच नहीं रहे। लोक कला, संस्कृति और इतिहास की गाथाओं को शोध और अन्वेषण की पैनी निगाह से सरल और सहज भाषा शैली में आम जन के समक्ष परोसकर मातृभूमि की सेवा में समर्पित युगीन व्यक्तित्व का हमें छोड़कर परमधाम सिधार जाना हम सभी के लिए अपूरणीय क्षति है जिसकी भरपाई शायद ही संभव है।

अद्भुत व्यक्तित्व का चमत्कार

डूंगरपुर की सरजमीं के रत्न श्री महेश पुरोहित दिन-रात इतिहास और बहुआयामी ज्ञान समन्दर में गोते लगा-लगाकर बहुमूल्य मोती खोज लाकर देश और दुनिया के समक्ष रखकर चमत्कृत कर देने वाले अद्भुत इतिहासविद् के रूप में दूर-दूर तक विख्यात थे।

उनके समर्पित कर्मयोग की सुगंध से हर कोई वाकिफ था। मातृभूमि की सच्ची सेवा करते हुए उन्होंने वागड़ धरा को जो गौरव प्रदान किया है वह चिरस्मरणीय रहेगा।

मुग्धकारी माधुर्यपूर्ण व्यवहार

धीर-गंभीर और शालीन, सर्वस्पर्शी एवं मधुर भाषी महेश पुरोहित जी के साथ फोन पर या प्रत्यक्ष दो मिनट का वार्तालाप भी बेहद अभिभूत कर देने वाला होता था। जो एक बार उनसे मिल लेता, वह उनका इतना कायल हो उठता कि बार-बार मिलने और बात करने का लोभ संवरण नहीं कर पाता।

अकाट्य तर्कों व प्रमाणों का दिग्दर्शन

लोक जीवन और इतिहास की कई रहस्यम परतों को खोल कर उन्होंने कई ऎतिहासिक थातियों व परंपराओं पर प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ जो निष्कर्ष प्रस्तुत कर आम जन से समक्ष रखे हैं वे ऎतिहासिक प्रमाण हैं।

हर विषय पर सहजता से समझाईश

किसी भी विषय को सुस्पष्ट एवं सरल-सहज रूप में प्रस्तुत कर समझाईश और सिलसिलेवार प्रामाणिकता से अपने कथ्य और शोध को जिज्ञासुओं और इतिहास विषय के जानकारों से समक्ष रखना उनके व्यक्तित्व की खास विशेषता थी।

कई ऎतिहासिक गुत्थियां सुलझायी

हर विषय को शोध दृष्टि से सूक्ष्म अध्ययन और प्रमाणों के साथ पुष्ट करते हुए नवीन कलेवर में उन्होंने प्रस्तुत किया और कई ऎतिहासिक गुत्थियों को उन्होंने सुलझाया। कर्म में हर दृष्टि से परफेक्शन उनकी अपनी वह विशेषता थी जिसे उन सभी ने अंगीकार किया जो उनके सम्पर्क में आया।

अंतिम साँस तक मातृभूमि की समर्पित सेवा

बहुधा प्रतिभाएं अन्यत्र जाकर बस जाती हैं और फिर मातृभूमि को भुला देती हैं। लेकिन पुरोहित ने ऎसा नहीं किया। उन्होंने जीवन के अंतिम क्षण कर मातृभूमि की सेवा को ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना और इसमें आशातीत रूप से सफल रहे। यही आत्मतोष उनके चेहरे पर हमेशा असीम शान्ति के साथ दैदीप्यमान रहा।

अहंकार मुक्त सर्वस्पर्शी जीवन

आम तौर पर थोड़ी सी जानकारी और सम्मान-अभिनंदन पा जाने के बाद विद्वान छलकते और बजने लगते हैं और विद्वत्ता का अहंकार पालते हुए माधुर्य और सर्वप्रियता के भाव खो देते हैं और अधजल गगरियों या खाली पीपों की तरह बजने को आमादा रहते हैं मगर महेश पुरोहित जी के साथ ऎसा कभी नहीं रहा।

अपार श्रद्धा भाव

किसी विराट और माधुर्यपूर्ण फलदार वृक्ष की तरह वे दुनियावी समस्त अहंकारों और बड़प्पन के मिथ्या भावों से मुक्त रहे और यही वजह थी कि लोग उन्हें दिल से पसन्द करते थे, उनके प्रति अगाध आस्था और अपार श्रद्धा का भाव हर कहीं लहराता हुआ देखा जाता था।

देश-दुनिया में विशिष्ट आदर-सम्मान

शिक्षा, साहित्य, इतिहास, शिल्प-स्थापत्य और पर्यटन आदि क्षेत्रों से संबंधित ज्ञान-विज्ञान और गतिविधियों पर शोध-अध्ययन, लेखन, नवीन रहस्योद्घाटन आदि की बदौलत अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के हस्ताक्षर के रूप में देश-विदेश के विद्वानों में उनका विशिष्ट सम्मान था। अभिलेखों का वैज्ञानिक रीति से संयोजन, संधारण और अभिलेखागार स्थापना का उनका कौशल चकित कर देने वाला था।

डूंगरपुर और महेश पुरोहित पर्याय हो चले थे। जो भी इतिहासकार, जिज्ञासु या लेखक इस सरजमीं के बारे में जानकारी पाने आता, महेश पुरोहित से मिले बिना उनका काम पूरा नहीं होता।

एक-एक विषय की बारीकी से जानकारी और इतिहास के बारे में सन्-संवत से लेकर कालक्रम और इससे जुड़े राजा-महाराजाओं और ऎतिहासिक घटनाक्रमों की जानकारी उनके मुँह पर हुआ करती थी। इसके लिए उन्हें किसी ग्रंथ या पोथी-पानड़े खोलने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

जन्मभूमि डूंगरपुर को दिया गौरव

श्री महेश पुरोहित जी का जन्म 30 जून 1932 को डूंगरपुर में राजकीय देवेन्द्र बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय के पास, हनुमत पोल स्थित राजगौर श्री भोगीलाल पुरोहित के घर हुआ। आरंभिक शिक्षा-दीक्षा डूंगरपुर में होने के उपरान्त उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से 1955 में हिन्दी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।

आजीविका की दृष्टि से उन्होंने राजस्थान सरकार में नौकरी को चुना। उन्होंने अपने केरियर की शुरूआत 11 अगस्त 1953 में श्रम विभाग में लिपिक कार्य से की। यहां 6 दिसम्बर 1955 तक सेवाएं देने के उपरान्त 7 दिसम्बर 1955 से 27 दिसम्बर 1960 तक समाज कल्याण विभाग में छात्रावाास अधीक्षक पर सेवाएं दीं।

केन्द्र सरकार में दी सेवाएं

इसके उपरान्त उन्होंने भारत सरकार के गृह मंत्रालय अन्तर्गत राजभाषा विभाग की हिन्दी शिक्षण योजना में 28 दिसम्बर 1960 से 30 जून 1990 तक सेवाएं दीं। इसी दौरान 28 दिसम्बर 1960 से 12 अगस्त 1985 तक की अवधि में हिन्दी शिक्षक/हिन्दी प्राध्यापक के रूप में श्रेष्ठ निष्पादन (मेरिटोरियस परफोरमेंस) के लिए वर्ष 1970 का प्रथम पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया।

हिन्दी शिक्षण में अहम् योगदान

हिन्दी शिक्षण योजना के नए पाठ्यक्रम की पुस्तकें तैयार करने में राजभाषा विभाग की ओर से पश्चिम क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा को वर्तनी-शिक्षण के पाठों, अभ्यासों और परीक्षणों के साथ पुस्तकें तैयार कर सहयोग दिया।

इसी प्रकार देवनागरी वर्णमाला सिखाने के लिये वैज्ञानिक दृष्टि से हिन्दी प्राइमर तैयार की। इसमें भाषा और लिपि के विकास में सामंजस्य स्थापित करते हुए मात्राओं के साथ वर्णों का सही अनुपात सिखाने के लिये सात लाइनों में लिखने का आदर्श लेखन बतलाया है। अक्षर को कहां से शुरू कर कहां समाप्त किया जाए जिससे लेखन की गति में बाधा न आएयह भी दिखाया गया है।

बखूबी किया राजधर्म का निर्वाह

राजभाषा विभाग (कार्यान्वयन) में अनुसंधान अधिकारी तथा सहायक निदेशक के पद पर सेवाएं देने के उपरान्त 13 अगस्त 1988 को उन्हें प्रभारी उप निदेशक(कार्यान्वयन) पद पर पदोन्नत कर भोपाल भेजा गयाजहाँ उन्होंने मध्यप्रदेश व राजस्थान प्रदेशों के लिए नया कार्यालय स्थापित किया और दोनों राज्यों के प्रभारी रहे। हिन्दी शिक्षण योजना जबलपुर में जून 1989 से सेवानिवृत्ति 30 जून 1990 तक उन्होंने उप निदेशक(मध्य) के पद पर सेवाएं दी और तीन राज्यों मध्यप्रदेशउत्तरप्रदेश एवं बिहार राज्यों का प्रभार संभाला।

यादगार कर्तृत्व का सुनहरा सफर

श्री महेश पुरोहित का सृजन संसार अत्यधिक विस्तृत होने के साथ ही संग्रहणीय ऎतिहासिक धरोहर है। बहुत से शोध लेखों को सृजन करने के साथ ही उन्होंने महाविद्यालयी एवं अन्य पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

संपादन -

एस.डी.पी. इन्टर कॉलेज, ब्यावर, (हिन्दी अनुभाग) की महाविद्यालय पत्रिका का 1949 से 51 तक तथा महाराजा कॉलेज, जयपुर (हिन्दी अनुभाग) की महाविद्यालय पत्रिका का 1951-52 तक संपादन किया। इसके बाद 1952-53 में सम्पादक मण्डल के सचिव तथा 1954-55 में मुख्य संपादक(छात्र) का दायित्व वहन किया। ‘‘समवेत स्वर’’ (वागड़ के कवियों की रचनाओं का संग्रह, सन् 2002) में सम्पादक मण्डल का गौरव बढ़ाया।

महारावल विजयसिंह शोध अभिलेखागार की स्थापना -

भूतपूर्व डूंगरपुर राज्य का राजस्थान में विलय होने के समय राज्य का रेकॉर्ड भी राजस्थान राज्य को सौंप दिया था। किन्तु स्व. महारावल लक्ष्मण सिंह ने डूंगरपुर राज्य के इतिहास और पुरातत्व, पारिवारिक और व्यक्तिगत सम्बांों से सम्बंधित रिकार्ड राजस्थान का नही सौेपा था। यह जूना महल के कमरों में बन्द पड़ा था।

इस बारे में महारावल महिपालसिंह चाहते थे कि यह रेकॉर्ड सार्वजनीन उपयोग के लिए उपलब्ध होना चाहिये। तब स्वीडन की सीडा नाम एजेंसी के आर्थिक सहयोग से महारावल श्री विजय सिंह शोा अभिलेखागार स्थापित कर इसमें यह रेकॉर्ड व्यवस्थित कर रखा गया है।

डूंगरपुर के स्थानीय उदय विलास पैलेस में स्थित ‘महारावल विजयसिंह शोध अभिलेखागार’ की स्थापना श्री पुरोहित की लगन व कठिन परिश्रम से ही संभव हो सकी है। स्वीडिश इंटरनेशनल डवलपमेंट एजेन्सी (सीडा) के सहयोग से श्री पुरोहित ने स्थानीय जूना महल के बंद पड़े कक्षों में रखी 5 हजार 200 से अधिक बहियों व रजिस्टरों को विभागवार, विषयवार व तिथिवार व्यवस्थित कर उनकी सूचियां बनार्इं।

जिले भर के शिलालेखों की छापों, ताम्रपत्रों, पट्टे-परवानों को भी संकलित कर सभी का क्रम से सूचीकरण श्री पुरोहित का ही परिश्रम है। चूंकि स्वीडिश प्रतिनिधि वागड़ी, देवनागरी लिपि सहित अभिलेखों में प्रयुक्त भाषा तथा लिपि से अनभिज्ञ थीं अतः श्री पुरोहित के सहयोग एवं मार्गदर्शन के बिना अभिलेखागार की स्थापना असंभव ही थी। इस बारे में सीडा की रिपोर्ट में भी श्री महेश पुरोहित का जिक्र करते हुए लिखा गया है - Without his participation and competence this work could not have been undertaken.

इस अभिलेखागार के बारे में केलीफोर्निया विश्वविद्यालय की शोध-छात्रा देबोरह स्टैन ने महारावल श्री महिपालसिंह, डूँगरपुर को दिन 18 फरवरी, 2003 ई. के पत्र में लिखा है- "The Dungarpur Archives are the only archives in Rajasthan that are really an open centre of learning for the public. Shri Purohit has done an excellent job of making a clear inventory for easy availability."

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पुस्तक का प्रकाशन -

श्री महेश पुरोहित ने जर्मनी के मि. क्लाउज इमिग के साथ मिलकर ‘जूना महल डूंगरपुर-राजस्थान एक राजपूत राजमहल’ नाम से एक पुस्तक लिखी है। इसे म्यूजियम रीटबर्ग, ज्यूरिच (स्विट्जरलैण्ड) ने प्रकाशित किया है।

इस समय यह पुस्तक केवल जर्मन भाषा में है। इस पुस्तक का विमोचन 4 से 8 अक्टूबर, 2006 ईस्वी में फ्रेंकफर्ट में आयोजित विश्व के सबसे बडे़ पुस्तक मेले में किया गया। इस पुस्तक के माध्यम से डूंगरपुर का जूना महल अन्तर्राष्ट्रीय इतिहास पटल पर आ गया है, जिससे डूंगरपुर के पर्यटन विकास को सम्बल प्राप्त हुआ है।

पुस्तक प्रकाशन यात्रा

1. श्री महेश पुरोहित को एक वैष्णव परिवार ने बताया कि डूंगरपुर के जूना महल में जसवन्त रावल के समय श्री गोपेन्द्रलालजी ने यहां गोपाललालजी की चित्र सेवा स्थापित की थी। जसवन्त रावल ने जूना महल के पास मणि महल बनवाया था। इस पर शोध पुस्तक ‘‘जय गोपाल, पुष्टिमार्ग और डूंगरपुर’’ 2007 को प्रकाशित।

2. वागड़ के बेणेश्वर धाम के पौराणिक, भौगोलिक तथा ऎतिहासिक सन्दर्भो का गहन शोध पर वर्ष 2012 में ‘‘बेणेश्वर सोम-महीसागर तीर्थ’’ पुस्तक प्रकाशन किया।

3. ‘‘डूंगरपुर ः परिचय व संक्षिप्त इतिहास’’ पर वर्ष 2015 में पुस्तक प्रकाशन किया।

4. ‘‘डूंगरपुर ः उन्नीसवी से बीसवीं सदी की ओर’’ पर वर्ष 2017 में पुस्तक प्रकाशन किया।

5. डूंगरपुर के जूना महल पर वर्ष 2019 में अंग्रेजी भाषा में ‘‘हिस्ट्री ऑफ जूना महल, डूंगरपुर’’ पुस्तक का प्रकाशन किया।

प्रकाशित आलेख -

. 1. डूँगरपुर नगर की स्थापना (शोध पत्रिका, उदयपुर)

2. डूँगरपुर नगर की स्थापना संबंधी जनश्रुति (मरु मंदाकिनी, बीकानेर)

3. डूँगरपुर का विभाजन (शोध पत्रिका, उदयपुर)

4. सुन्दनपुर के शिलालेख की विश्वसनीयता (वैचारिकी, बीकानेर)

5. वागड़ में गुहिलोत अहाड़ा वंश का संस्थापकः सामन्त सिंह (शोध पत्रिका, उदयपुर)

6. डूँगरपुर और बादशाह अकबर (मरु भारती, पिलानी)

7. ऊपरगांव के जैन मन्दिर की प्रशस्ति (शोध पत्रिका, उदयपुर)

8. ‘राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम की पहली चिनगारी डूँगरपुर से’ वनस्थली विद्यापीठ में शोध-पत्र का वाचन, Some Aspects of

Rajasthan History and Culture, Deptt. of History, Banasthali Vidyapith, Banasthali.

9. डूँगरपुर में नगरपालिका की विकास यात्रा (नगरपालिका स्मारिका, 2000 ई.)

10. विश्वेश्वर महादेव मंदिर प्रशस्ति, शोध पत्रिका, उदयपुर, वर्ष-54, जनवरी-जून, 2003 ई.

11. डूँगरपुर में श्रीनाथ जी (राजस्थान पत्रिका)

12. डूँगरपुर का प्राचीन राजमहल (राजस्थान पत्रिका)

13. डूँगरपुर का एक थम्बा महल (राजस्थान पत्रिका)

14. वागड़ में अग्निहोत्र (राजस्थान पत्रिका)

15. वागड़ में जगह-जगह लगे हैं चीरे (राजस्थान पत्रिका)

16. बादल महल (राजस्थान पत्रिका)

17. डूँगरपुर के भित्ति चित्र (इतवारी पत्रिका)

18. ‘आरस जाए लसमी आवै’ (राजस्थान पत्रिका)

19. डूँगरपुर का संक्षिप्त इतिहास (डूँगरपुर जिला दर्शन,वर्ष-2000 ई.)

20. पिछड़े क्षेत्र के अग्रणी चित्रकार ः श्री मथुरानाथ शर्मा (डाईट, डूँगरपुर 1995-96)

21.डूँगरपुर की स्थापना (रोटरी क्लब ऑफ डूँगरपुर, स्मारिका, 1993 ई.)

22. डूँगरपुर के दर्शनीय स्थल (गल्ला किराणा व्यापारी एसोसिएशन, स्मारिका,2000-2001ई.)

23. सात शताब्दियों की गाथा दामन में समेटे है डूँगरपुर।(राजस्थान पत्रिका, उदयपुर, 4 नवम्बर, 2003)

24. (क) अंहकार चूर करने को ‘कृष्ण भये राम’

(ख) कालखंडों में विकसित हुआ श्री रघुनाथजी मंदिर

(ग) भारत में फैल रहा है वागड़-शिल्प

(राजस्थान पत्रिका, डूँगरपुर, 18 अप्रेल, 2005 ई.)

25. पाण्डवों का वागड़ में गुप्तवास (वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2011, भाग 27 अंक 2)

विशिष्ट सम्मान -

1.. मुख्य व्यवस्थापक, डूँगरपुर ‘हैजे के प्रकोप’ के समय निःशुल्क सेवाओं पर (जुलाई 1948)

2. डूँगरपुर के इतिहास को तथ्यात्मक रूप देने की महत्वपूर्ण सेवा पर गणतंत्र दिवस समारोह 1997 पर जिला कलैक्टर डूँगरपुर द्वारा सम्मानित

3. शैक्षिक-क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान पर रोटरी क्लब डूँगरपुर द्वारा सम्मानित (16.09.98)

4. शिक्षा व इतिहास के क्षेत्र में योगदान के लिए महावीर इंटरनेशनल की डूँगरपुर शाखा द्वारा

5. चौबीसा ब्राह्मण समाज, डूँगरपुर द्वारा इतिहास के क्षेत्र में योगदान के लिए

6. रचना साहित्य संस्थान, डूँगरपुर द्वारा साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए

7. महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन, उदयपुर द्वारा महाराणा कुम्भा सम्मान, 2002 ई.

8. जिला कलक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट, डूँगरपुर द्वारा डूँगरपुर के इतिहास पर गहन शोध, लेखों का प्रकाशन एवं साहित्यिक उपलब्धि पर जिलास्तरीय सम्मान, 26 जनवरी, 2004 ई.

9. राजस्थान पत्रिका द्वारा स्वर्णिम महोत्सव के तहत ‘कर्णधार’ सम्मान, 2006 ई.

10. राजस्थान सरकार द्वारा ऎतिहासिक-साहित्यिक लेखन के लिए प्रशस्ति पत्र, दिनांक 15.08.2008

खेलकूद में अभिरुचि -

महारावल हाई स्कूल, डूँगरपुर में वॉलीबाल, क्रिकेट और हॉकी और एस.डी.पी. इंटर कॉलेज, ब्यावर में वॉलीबाल और क्रिकेट की टीमों में खिलाड़ी के रूप में उन्होंने खेल प्रतिभा का परिचय दिया।

समाज और क्षेत्र को चिरस्मरणीय योगदान

धार्मिक पर्यटन को नवीन दिशा-दृष्टि (जय गोपाल, पुष्टिमार्ग और डूँगरपुर)

पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के वंशज श्री गोपेन्द्रलालजी डूँगरपुर में वि.सं. 1721 से वि.सं. 1732 तक रहे थे। उन्होंने सन् 1664 ई. में डूँगरपुर में अपनी बैठक स्थापित कर ‘चित्रसेवा’ स्थापित की थी। यहीं इनका लीला-विस्तार हुआ था। इनके बाद इनकी द्वितीय पुत्री यमुना बाई जमुनेश महाप्रभु के नाम से डूँगरपुर में तिलकायत हुई और वि.सं. 1787 ( ईसवी सन् 1732 तक यहाँ रहीं। इनके श्रीनाथद्वारा चले जाने से डूँगरपुर में ‘बैठक’ नहीं रही।

डूँगरपुर के लोग भूल चुके थे कि डूँगरपुर का पुष्टिमार्ग से प्रत्यक्ष संबंध रहा था। ‘चित्रसेवा’ के बारें में लोग कुछ भी नहीं जानते थे। परंतु सौराष्ट्र से श्री गोपेन्द्रलालजी और श्री जमुनेश जी महाप्रभु के अनुयायी कभी-कभी डूँगरपुर आ जाते थे व जूने महल में घूमकर चले जाते थे।

श्री पुरोहित ने उक्त चित्रसेवा के साथ पूज्य गोस्वामियाें के निवास-स्थान ‘मणिमहल’ को खोज निकाला और इसकी सूचना सौराष्ट्र स्थित उनके अनुयायिओं को दी। परिणामस्वरूप लगभग 250 श्रद्धालुओं का एक दल अगस्त, 2005 में तथा लगभग 2000 श्रद्धालुओं का दल जनवरी, 2006 में उत्सव मनाने डूँगरपुर आया। 23 पदयात्रिओं का दल सूरत से सितंबर, 2006 ई. में आया। इस प्रकार श्री महेश पुरोहित ने पुष्टिमार्ग के रिश्ते को पुनः जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। अब इन श्रद्धालुओं का डूँगरपुर आने का क्रम शुरू हो गया है।

व्यावसायिक पर्यटन -

श्री महेश पुरोहित ने जर्मनी के श्री क्लाउज इमिग के साथ मिलकर ‘जूना महल डूँगरपुरः राजस्थान में एक राजपूत राजमहल’ शीर्षक से जर्मन भाषा में पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक से प्रेरित हो कर विदेशी पर्यटक अािक संख्या में न केवल डूँगरपुर आ रहे हैं, बल्कि यहाँ फिल्में भी बनाने लगे हैं। इससे व्यावसायिक पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा है।

शैक्षिक पर्यटन -

श्री महेश पुरोहित के अथक प्रयासों से और परिश्रम से ‘महारावल श्री विजयसिंह शोध अभिलेखागार, उदय विलास पैलेस, डूँगरपुर’ स्थापित हुआ।इससे देशी-विदेशी शोधार्थी और इतिहास के जिज्ञासु लाभान्वित हो रहे हैं। इस प्रकार डूँगरपुर शैक्षणिक पर्यटन से भी जुड़ गया है।

डूँगरपुर नगर स्थापना दिवस और वागड़ महोत्सव ः सांस्कृतिक पर्यटन

श्री महेश पुरोहित ने डूँगरपुर नगर की स्थापना की तिथि खोज कर उक्त तिथि पर स्थापना दिवस आयोजित करवाने की पहल की। उनके प्रयत्नों से इसी दिवस के साथ वागड़-महोत्सव आयोजित हो रहा है। इस अवसर पर बाँसवाड़ा तक के लोगों के साथ-साथ विदेशी पर्यटक भी डूँगरपुर आने लगे हैं। इस प्रकार सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ाने में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है।

श्री महेश पुरोहित के गहन शोध कार्यों ने उन्हें इतिहासकार के रूप में लोकप्रिय और प्रसिद्ध किया। इस क्षेत्र में रुचि रखने वाला हर शख्स उनसे मिले बिना नहीं रह पाता और मिलने के बाद उसे लगता कि डूँगरपुर में देखने-समझने के लिए बहुत कुछ है, अतः डूँगरपुर में दुबारा आने पर वह डूँगरपुर के लिए अधिक समय का प्रावधान कर आता है।

पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए श्री महेश पुरोहित ने अनेक लेख भी लिखे हैं जो समय-समय पर समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।

जिस वर्ष महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन ने स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर और मिसाइल मैन एवं पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को सम्मानित किया था, उसी समय श्री महेश पुरोहित को भी इतिहास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘महाराणा कुंभा सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

नगर स्थापना तिथि की खोज

श्री महेश पुरोहित ने शोध कर डूंगरपुर नगर स्थापना की तिथि कार्तिक शुक्ल एकादशी, विक्रम संवत 1339 खोजी। इनके प्रयत्नों से सन् 1997 ई. से नगर स्थापना दिवस निरन्तर आयोजित हो रहा है। उन्हीं के प्रयत्नों से वर्ष 2003 ई. से इसी के साथ वागड़-महोत्सव भी आयोजित हो रहा है जो पहले अलग आयोजित होता था।

इससे स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों की प्रस्तुतियों से जनजाति क्षेत्र के लोग लाभान्वित हो रहे हैं, प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।

श्री पुरोहित के प्रयत्नों से नगर पालिका, डूँगरपुर ने वर्ष 2004 ई. से स्थापना दिवस के आयोजन की जिम्मेदारी सँभाली है। श्री पुरोहित की प्रेरणा व मार्गदर्शन से बना ‘वागड़ का स्वागत गीत’ वर्ष 2004 ई. से अतिथियों का स्वागत कर रहा है। इन आयोजनों में बाँसवाड़ा तक के लोगों के साथ-साथ विदेशी पर्यटकों की भी भागीदारी रहती है।

निखिल-रूपेश कहिन ...

श्री महेश पुरोहित का सान्निध्य पाने वाले डूंगरपुर के बुद्धिजीवियों निखिल चौबीसा एवं रूपेश भावसार ने उनके समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से जानकारी का संकलन किया है, जिससे स्पष्ट पता चलता है कि श्री महेश पुरोहित ने समाज, क्षेत्र और देश को जो कुछ दिया है, वह मातृभूमि की सेवा के किसी महान अनुष्ठान से कम नहीं। उनके इस अमूल्य अवदान से हम कभी उऋण नहीं हो सकेंगे।

निखिल और रूपेश के शब्दों में ‘‘वागड़ के लिये श्री महेशजी पुरोहित का योगदान भूला नही सकते। 90 वर्ष की उम्र में भी नये शोध करने की इच्छा रखते थे। उनके पास घण्टो बैठने पर भी समय का पता नही चलता था। नये शोधार्थियों के साथ तो वह घण्टों तक बैठे रहते थे। छोटी से छोटी बात पर भी उनका पूरा ध्यान जाता था। अपने किये शोधकार्य में भी हर वक्त कमियां निकाल कर नया जोड़ते हुए सम्पूर्ण परफेक्शन के हामी थे। जब तक वे संतुष्ट नही होते तब तक अपना शोधकार्य किसी के भी सामने नहीं लाते। उनकी एक बात बहुत अच्छी लगती थी - वे कहते थे कि कोई आपका वर्क कॉपी करता है तो उसे करने दो, वह हमेशा आपका फोलोवर ही रहेगा। वह नया कुछ नही कर सकेगा। आप अपना नया क्रियेशन करते रहो।’’ वागड़ के लिये उनका नहीं रहना अपूरणीय क्षति है।