संस्मरणात्मक आत्मकथ्य - तस्कराणाम्पतये नमः

धार्मिक सामाजिक और आंचलिक संस्थाओं और कार्यक्रमों में किसम-किसम के सहभागियों का समावेश होता है। और यह स्वाभाविक ही है कि इन सभी की वृत्तियां, विचार और कार्यशैली भी एक जैसी न होकर अलग-अलग होती है।
इनमें कुछेक लोग ऐसे भी होते हैं जिनके बारे में दूसरे लोगों ख़ासकर उनके संगी-साथी और साथ काम करने वाले पदाधिकारियों की धारणा भिन्न होती है। कुछ इन्हें पसन्द करते हैं, कुछ नहीं, और कुछ की मजबूरी होती है साथ रहने और काम करने की।
कई बार समान उद्देश्य के साथ रचनात्मक काम करने का हौसला प्रधान होता है। ऐसे में व्यक्ति और उसका व्यक्तित्व, विचारधारा और काम करने के तौर-तरीके गौण हो जाते हैं। इन तरह-तरह के लोगों के बीच काम करते हुए जीवन यात्रा के कई सारे पड़ावों से होकर गुजरते हुए कई रोचक अनुभव भी सामने आते हैं।
ऐसा ही एक किस्सा है जिसे शेयर करते हुए आनन्द का भी अनुभव होता है और पुराने लोगों की अभिव्यक्ति के अनूठा अंदाज का भी, जिसमें जो कहा जाए वह एकाध शब्द ही उनके सारे व्यक्तित्व का परिचय देने के लिए काफी होता है।
एक धार्मिक संस्था की जब भी बैठक होती, कोई आयोजन होता, उसमें सबसे बड़े और सर्वाधिक बुजुर्ग एवं सम्मानित पदाधिकारी के बाद वाले दो पदाधिकारियों के आने पर माहौल में अचानक आनन्द और हास्य भाव तैर जाता।
सभी लोगों का इन दोनों के बारे में मानना था कि इनकी वृत्तियां औरों से भिन्न और कुछ स्वार्थी प्रवृत्ति की हैं। और इन दोनों की आपसी ईर्ष्या भी जगजाहिर थी। मजा तब आता जब कोई बैठक चल रही होती, कोई सी चर्चा हो रही होती और तब इन दोनों पदाधिकारियों में से एक बैठक में उपस्थित रहता और दूसरा बैठक में आता दिखाई देता, तब सभी संभागी मजाकिया लहजे में ‘तस्कराणाम्पतये नमः’ का उद्घोष कर देते।
इस पर बैठक में पहले से मौजूद पदाधिकारी यह सोचकर खुश हो जाता कि सामने आ रहे पदाधिकारी को देख कर यह शब्द कहा जा रहा है। और आने वाला यह सोचकर प्रसन्न हो उठता था कि बैठक में पहले से मौजूद पदाधिकारी के बारे में ऐसा कहा जा रहा है।
दोनों में से जब भी एक बाद में आता, ‘तस्कराणाम्पतये नमः’ का उद्घोष होना अब बैठक के ख़ास एजेण्डे की तरह ही हो गया था। और जब दोनों एक साथ आते दिखते तब भी। दोनों ही यह नाम सुनकर प्रसन्न हो उठते।
संस्था चलाने वाले संस्थापक बुजुर्ग, दूसरे संभागी और सदस्यगण ही इस परम रहस्य को जानते थे और इस कारण दोनों के जमकर मजे लिया करते थे। पर इन दोनों प्रतिद्वन्द्वियों को मरते दम तक यह पता नहीं चल पाया कि शेष सभी लोग इन दोनों को ही इस श्रेणी में मानकर ऐसी अभिव्यक्ति करते रहे हैं।
इस संस्था के ये सारे चर्चित पदाधिकारी कई वर्ष पूर्व ही परमधाम सिधार चुके हैं। मुझे इन सभी बुजुर्गों के सान्निध्य में कई संस्थाओं में साथ-साथ काम करने का लम्बे समय तक अवसर मिला है।
यह बता दें कि ‘तस्कराणाम्पतये नमः’ भगवान रूद्र की उपासना में प्रमुख नाम है जिसके अनुसार भगवान शिव तस्करों के भी अधिपति कहे गए हैं।
आज भी किसी भ्रष्ट व्यक्ति या ठेकेदार किस्म के दक्षिणालोभी कर्मकाण्डी के मूल चरित्र का प्रकटीकरण करना होता है तब समझदार पण्डित इस शब्द का गाहे-बगाहे उच्चारण कर अपने मन के उद्गार प्रकट करते दिखाई देते हैं। वह समझ भी जाए और प्रतिकार में कुछ कह भी न सके।
