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एक्सपर्ट व्यू - यों बनाएं आला - अपनी पाठशाला

Deepak Acharya
Deepak Acharya
January 20, 2022

संस्थागत या वैयक्तिक प्रतिष्ठा मानव मात्र की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन विस्तृत फलकों में पसरा हुआ है। एक ज़माना था जब इसके लिए परम्परागत प्रचार माध्यमों का इस्तेमाल होता था। पर 21 वीं सदी की ही यह देन है कि अब प्रिन्ट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल व साइबर मीडिया आम आदमी के काफी करीब है। आम जन के दिल की धड़कन, मन की कल्पनाओं और दिमाग में उमड़ रहे विचारों को वह अच्छी तरह सुनने व सार्वजनिक करने लगा है। यह अलग बात है कि हम बुद्धिजीवी इसका उतना अधिक सदुपयोग नहीं कर पाए हैं, या नहीं कर पाते हैं, जितना अब तक हो जाना चाहिए था। समाज का प्रबुद्ध वर्ग चाहे तो मीडिया का उपयोग कर सामाजिक परिवर्तन की भाव भूमि निर्मित कर सकता है। इस बौद्धिक वर्ग में शिक्षा जगत का प्रतिशत सर्वाधिक होने के साथ ही समाज पर सीधा असर डालने वाला और अत्यंत प्रभावी है। ऎसे में यह चर्चा सामयिक हो चली है कि ज्ञान राशि और अनुभवों का समृद्ध व अकूत भण्डार समेटे बैठा शिक्षा संसार कैसे समाज को दिशा दृष्टि देते हुए अपने शिक्षालय व शाला परिवार की प्रतिष्ठा को शिखरों का स्पर्श कराएं।

बढ़ाएं समुदाय की सहभागिता
यहां हम सिर्फ शिक्षालय व इनसे सम्बद्धजनों की पब्लिसिटी को ही केन्द्र में रख कर चर्चा कर रहे हैं। इसमें संस्था प्रधान की भूमिका सबसे अहम् है। विद्यालय में विभिन्न उत्सव, पर्व, त्योहार, जयंतियाँ, पुण्य तिथियां, दिवस, सप्ताह, पखवाडे़, अभियान आदि मनते हैं। विभिन्न सामाजिक एवं राष्ट्रीय सरोकारों से जुड़ी योजनाओं, परियोजनाओं, अभियानों, प्रतिस्पर्धाओं आदि पर कार्यक्रम होते रहते हैं।

हर अवसर का लाभ लें
इसके अलावा शाला में अक्सर विशिष्ट जनों के कार्यक्रम होते हैं। ये तमाम मौके वे सुलभ अवसर हैं जब संस्था संचालक या संस्थाप्रधान मीडिया का प्रयोग कर अपनी शाला का प्रचार-प्रसार कर इसकी सामाजिक व परिवेशीय प्रतिष्ठा में चार चाँद लगा सकते हैं। विद्यालय में कई सारे कार्यक्रम किसी संस्था या संगठन के संयुक्त तत्वावधान में होते हैं, ये भी पाठशाला के लिए प्रचार का आधार होते हैं। इन तमाम कार्यक्रमों या आयोजनों में जितना महत्त्व इनके सफलतापूर्वक सम्पादन का है उससे कहीं ज्यादा महत्त्व इनके प्रचार-प्रसार का है। यह जमाना विज्ञापन, प्रचार और वैश्वीकरण का है ऎसे में संस्थान/स्कूल के बारे में जानकारी का प्रसार ज्यादा से ज्यादा होना संस्था के चलाने वालों, प्रबन्धन व शाला सभी के हित में है। फिर अच्छी प्रवृत्तियों को दूसरी संस्थाएं अपनाती भी हैं जिससे समाज का ही भला होता है।

संचार माध्यमों का सहयोग लें
आज गाँव-गाँव मीडिया का प्रसार हुआ है। ऎसे में क्षेत्र के मीडियाकर्मियों की सूची बनाएं व उन्हें अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित करें। वर्ष में दो-चार बार इन्हें चाय पर बुलाकर स्कूल में शिक्षण को बेहतर बनाने के प्रयासों, परीक्षा परिणामों आदि की स्थितियों से अवगत कराएँ। यह स्मरण रखें कि ये मीडियाकर्मी प्रभावशाली होते हैं व स्कूल के व्यापक प्रचार के साथ ही विकास की दृष्टि से कई नए भामाशाहों को प्रेरित कर सकते हैं। यह जरूर ध्यान रखें कि सभी मीडियाकर्मियों को बराबर सम्मान दें। हमारे लिए न कोई अधिक है, न कोई कम। सभी मीडियाकर्मी अपने कर्तव्य के माध्यम से शिक्षा जगत की समर्पित सेवा कर सकते हैं।

जरूरी है विद्यालय स्तर पर पहल
यह कार्य किसी भी तरह कठिन नहीं है। संस्था प्रधान को चाहिए कि अपने स्कूल के ऊर्जावान व लेखन कौशल में दक्ष किसी शिक्षक को प्रचार कार्य का जिम्मा सौंप दें। जब भी कार्यक्रम हो या शाला की उपलब्धियों के प्रचार का अवसर आए, इस प्रभारी के माध्यम से सारगर्भित प्रेस नोट बनवा कर इसे मीडिया तक पहुँचाने की व्यवस्था करें। किसी भी आयोजन की समाप्ति के एक दो घण्टे के भीतर संस्था का प्रेस नोट जिला सूचना एवं जन सम्पर्क कार्यालय तक पहुँच जाना चाहिए। यह कार्यालय शासन के समाचारों को यथोचित मीडिया तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व निभाता है । जरूरत समझें तो इसकी प्रति अपने क्षेत्र के मीडियाकर्मियों को भी भिजवाएँ।

विशिष्टजनों की भागीदारी अहम्
जब भी विद्यालय में निरीक्षण, अवलोकन या किसी कार्यक्रम के लिए विशिष्ट व्यक्ति या भामाशाह स्कूल में आए, इनके समाचार भी बनाकर मीडिया तक पहुँचाएं। इससे ये श्रेष्ठीजन या भामाशाह प्रचार पाएँगे व इसका लाभ स्कूल के विकास या अगले आयोजनों में सम्बल देने, किसी न किसी रूप में विद्यालय को प्राप्त होगा ही। प्रचार-प्रसार से स्कूल से संबंधित क्षेत्रें के अभिभावकों, ग्रामीणों, नागरिकों को भी अच्छा महसूस होगा व वे संस्था प्रधान के साथ ही पूरे स्टाफ के काम-काज व छवि का सकारात्मक मूल्यांकन करेंगे।

उपलब्धियों को प्रचारित करने में पीछे न रहें
शिक्षा विभाग की विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं, समारोहों आदि में शाला के शिक्षकगण, विद्यार्थीगण जब भी कोई उपलब्धि पाते हैं, इन्हें प्रचार माध्यमों तक पहुँचाए। एक बात हर हमेशा ध्यान में रखी जाने योग्य है कि प्रचार-प्रसार के कार्य में किसी दूसरी आयोजक संस्था पर भरोसा न रखें, खुद पहल करते हुए, समय की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए इस कार्य को जितना त्वरित गति से अंजाम देंगे, उतना ज्यादा लाभ संस्थाप्रधान, स्टाफ व संस्था को प्राप्त होगा। निजी एवं मान्यता प्राप्त शिक्षालयों को प्रचार-प्रसार का दोहरा-तिहरा लाभ है। आमतौर पर ये संस्थाएं अपने प्रचार के लिए काफी धनराशि खर्च कर विज्ञापन देती हैं। यह विज्ञापन सभी माध्यमों तक नहीं पहुँच पाता, ऎसे में संस्थान की गतिविधियों का प्रचार-प्रसार बदले हुए रूप में संस्थान के लिए विज्ञापन का ही काम करता है। इससे संस्थान की साख बढ़ती ही है।

सहशैक्षिक प्रवृत्तियां देती हैं सम्बल
सभी प्रकार के विद्यालयों में खेलकूद व सांस्कृतिक-साहित्यिक आयोजन होते रहते हैं। इनके अलावा शिक्षक-शिक्षिकाओं में बहुत सारी ऎसी प्रतिभाएँ हैं जो खेल, संस्कृति, साहित्य, लेखन, पर्यटन, लोक गीत, संगीत, नृत्य आदि विधाओं में निष्णात हैं। इस प्रकार के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं व शिक्षकगण से संबंधित जानकारी लिपिबद्ध करा कर इन्हें फोटो सहित मीडिया तक पहुँचाएं।अपने क्षेत्र के आकाशवाणी केन्द्र / दूरदर्शन केन्द्र को भी यह जानकारी भिजवाते हुए आग्रह करें कि इन प्रतिभाओं को आकाशवाणी /दूरदर्शन/कैबल/स्थानीय चैनल्स आदि के कार्यक्रमों में शामिल किया जाए। इससे इन प्रतिभाओं को मंच मिलेगा और अपनी संस्था को लोकप्रियता। इससे जो आत्मीय आनंद मिलेगा, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता।

सामूहिक प्रयास अधिक प्रभावी
संस्थाप्रधान यह भी कर सकते हैं कि अपने क्षेत्र की स्कूलों के संस्था प्रधानों से वार्ता कर इस प्रकार की शिक्षक व विद्यार्थी प्रतिभाओं को अलग-अलग सूचीबद्ध कर इनके समूह बनाएँ व अपने क्षेत्र में सार्वजनिक मंचों पर इनके कार्यक्रम रखवाएँ अथवा सामाजिक एवं राष्ट्रीय सरोकारों से जुडे़ प्रचार अभियानों में इन समूहों की सेवाएं लें। इससे इन सभी प्रतिभाओं को आगे बढ़ने के अवसर, मंच व प्रचार की प्राप्ति होगी।

नवाचारों के प्रति जगाएं आकर्षण
संस्थाप्रधान अपने विद्यालय में किसी भी प्रकार का नवाचार करने जा रहे हैं अथवा इसका प्रयोग जारी रखे हुए हैं, इससे संबंधित जानकारी का प्रचार-प्रसार करें, इससे स्कूल का नाम होगा, साथ ही अन्य विद्यालयों को प्रेरणा मिलेगी। विद्यालय में नवाचार करने वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं को समय-समय पर सम्बल दें, प्रोत्साहन प्रदान करें और उनका उत्साह बढ़ाते रहें। यह समूचे विद्यालय की साख में अभिवृद्धि करने वाला सिद्ध होता है। कई बार कुछ न करने वाले, केवल नौकरी से पैसा कमाने को ही जीवन का महानतम और अन्तिम लक्ष्य मानने वालों की ओर से श्रेष्ठ एवं स्वैच्छिक कार्य, नवाचार करने वालों को निरुत्साहित किया जाता है, इससे विद्यालय के हितों पर खराब प्रभाव पड़ता है और उत्साही कार्मिकों का मनोबल टूटता है। विद्यालय में अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशिष्ट जन की यात्रा हो, बड़ा कार्यक्रम हो या कोई खास उपलब्धियां, तो इसका प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार करवाया जा सकता है। इसके लिए संदर्भित जानकारी के साथ अपने जिले के सूचना एवं जन सम्पर्क अधिकारी से सम्पर्क किया जा सकता है। वे इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करने में मददगार बनकर प्रिन्ट तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया तक आपकी बात पहुँचा कर यह काम काफी आसान कर सकते हैं। प्रचार-प्रसार के किसी भी कार्य के लिए पीआरओ का सहयोग लिया जाना चाहिए। यह विभाग शासकीय गतिविधियों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए ही बना हुआ है।

मीडिया से रखें समन्वय
महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हो तब इसकी सूचना मीडिया प्रतिनिधियों को एक दिन पहले दें व इनसे विनम्र आग्रह करें कि वे अपने प्रेस फोटोग्राफर को भी भिजवाएं। इसके अलावा विद्यालय स्तर पर भी प्रकाशित होने लायक दो-चार फोटो खिंचवा कर इन्हें पीआरओ/ मीडिया तक भिजवाने की व्यवस्था करें। यह कार्य सर्वोच्च प्राथमिकता से होना चाहिए तभी इसका उपयोग हो सकता है। विभिन्न समाचार पत्रों के जिला स्तर पर संस्करणों के प्रकाशन के बाद अब विद्यालयी समाचारों को अपेक्षाकृत ज्यादा स्थान मिलने लगा है।कई बार मंत्रीगण, जिला कलक्टर या जिलाधिकारीगण, जन प्रतिनिधिगण या विशिष्टजनों के कार्यक्रमों के दौरान आयोजक संस्था को यह विश्वास रहता है कि इसका कवरेज मीडिया कर ही लेगा लेकिन यह धारणा ठीक नहीं है। इस तरह कवरेज हो भी जाएगा तो संस्था को पूरा लाभ नहीं मिल पाएंगा क्योंकि बाहर से आए मीडिया प्रतिनिधियों को न स्कूल के बारे में पर्याप्त जानकारी होती है, न उनके पास संस्थाप्रधान या स्टाफ का नाम। ऎसे में किसी शिक्षक को यह जिम्मेदारी सौंप दें कि जब भी कोई बड़ा कार्यक्रम हो, वह बाहर से आने वाले मीडिया प्रतिनिधियों को स्कूल व आयोजन के बारे में जानकारी उपलब्ध कराए। इन सबके बावजूद बेहतर यही है कि इन आयोजनों की समाप्ति होते ही जल्द से जल्द विद्यालय स्तर पर इसका प्रेस नोट बनाकर भिजवा दें ।

दस्तावेजीकरण भी है महत्वपूर्ण
सत्र के अंत या सत्रारंभ में विद्यालय की वार्षिक योजनाओं/उपलब्धियों पर एक सचित्र दस्तावेज तैयार किया जा सकता है। इसकी जानकारी भी मीडिया तक पहुँचना लाभकारी हो सकता है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं में विद्यालय से संबंधित गतिविधियों के बारे में जो कुछ प्रकाशित होता है उसका दस्तावेजीकरण अवश्य करें। इसके लिए किसी को प्रभारी बनाकर दायित्व सौंपे कि वह फाईल तैयार करे। इसमें अच्छे कागज पर सुन्दर ढंग से कतरनें चिपकायी जाएं।स्कूल में जो भी वीआईपी आए, उसके सन्मुख इसे प्रस्तुत करें। यह एक ही नज़र में शाला की पूरी तस्वीर प्रस्तुत कर सकारात्मक छवि का निर्माण कर सकते हैं। विद्यालय स्तर पर विभिन्न वृहत आयोजनों में जो स्मारिकाएँ प्रकाशित होती हैं, इनमें पृथक से प्रचार-प्रसार प्रकोष्ठ को समाहित करते हुए स्थानीय एवं जिला स्तर के मीडिया प्रतिनिधियों को भी शामिल करें।

सोशल मीडिया पर सक्रियता रखें
इस समय तकरीबन सभी विद्यालय कम्प्यूटर सेवाओं से जुड़ चुके हैं। ऎसे में सोशल मीडिया नेटवर्क से संबंधित तमाम माध्यमों का सहारा लेकर अपने विद्यालय के बारे में वैब साईट बनवाकर दुनिया भर के लोगों तक जानकारी पहुँचा सकते हैं। विश्व की कई वैब कंपनियां और इन्टरनेटप्रदाता एजेन्सियां मुफ्त में वैब स्पेस देती हैं। इसका उपयोग कर अपने स्कूल की जानकारी, फोटोग्राफ्स और शैक्षिक नवाचारों के बारे में अपने विचारों का इसमें समावेश किया जा सकता है। इसमें किसी प्रकार का कोई खर्च नहीं आता। बिना खर्च देश-दुनिया के कोने-कोने तक स्कूल की जानकारी पहुँचाने का यह बेहतर जरिया हो सकता है। संस्थाप्रधानों की वाक्पीठ संगोष्ठियों में मीडिया विशेषज्ञों खासकर शिक्षा से संबंधित गतिविधियों के अनुभवी एवं विशेषज्ञ मीडिया एक्सपर्ट की भी एक वार्ता रखी जानी चाहिए। इससे शैक्षिक पत्रकारिता को नवीन आयाम मिलेंगे।आवश्यकता बस इतनी है कि संस्थाप्रधान, शाला परिवार और विभागीय अधिकारी इस दिशा में सकारात्मक एवं प्रगतिवादी चिंतन के साथ आगे बढ़ें और स्कूली शिक्षा को आदर्श व प्रेरणास्पद बनाएं ताकि गुणात्मक शिक्षा की दृष्टि से शिक्षा जगत अपने निर्धारित लक्ष्यों को सहजता से प्राप्त कर सके।