... इनके त्याग का कोई मुकाबला नहीं

भक्ति में रमे हुए भक्त भजनों और आरतियों में इन वाक्यों का गान बड़ी ही श्रृद्धा और भक्तिभाव से करते हैं - अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे चरणों में..., तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा......सब कुछ है तेरा.... आदि-आदि।
इनसे भी कई गुना अधिक खूब सारे भक्त हैं जो द्विज(जनेऊधारी) हैं, और ये लोग वाकई बहुत बड़े वाले त्यागी और तपस्वी कहे जा सकते हैं जो अपने घर, प्रतिष्ठान और तिजोरियों, सेफ आदि की चाभियों को मरते दम तक अपने जनेऊ में बांध कर रखते हैं और सारे धन-वैभव के मालिक इन यज्ञोपवीत में प्रतिष्ठित देवताओं को मानकर सर्वस्व समर्पण का भाव ताज़िन्दगी बनाए रखते हैं।
ख़ासकर रसोई बनाने वाले हलवाई और महाराज कहे जाने वाले विप्रवर इस समर्पण परम्परा में सबसे आगे हैं। इनके लिए जनेऊ देवताओं की किसी खूंटी से कम नहीं, जहां चाभियों का गुच्छा लटका देने से चाभियां सुरक्षित रहती हैं। न जेब चाहिए, न कोई पर्स। न निकालने का झंझट, न रखने की समस्या। हमेशा अपने खजाने की चाभी अपने साथ।
एक बार जनेऊ में चाभियां बांधकर यज्ञोपवीत में समाहित देवताओं को समर्पित कर देने के बाद न चाभियों के भूलने का भय, न खोने का। चोरों के लिए भी जनेऊ से चाभियां निकालना मुश्किल होता है।
असल में जनेऊ का महत्त्व समझने में ये ही लोग सबसे आगे हैं।
संत-महात्माओं की तरह वैराग्य भाव से ऐसा करने वाले ये त्यागी, तपस्वी जनेऊधारी धन्य हैं जिन्होंने जनेऊ देवता को सारी चाभियां सौंप कर अपने आपको समर्पित कर रखा है।
इन महान द्विजों पर गर्व और गौरव का भान हर किसी समझदार मनुष्य को होना ही चाहिए अन्यथा ऐसे त्यागी-तपस्वियों की तपस्या व्यर्थ चली जाएगी और यह अनूठी दिव्य परम्परा लुप्त हो जाने का खतरा बना हुआ है।
अपने आस-पास ऐसे तपस्वियों और सर्वस्व समर्पण भाव से जी रहे द्विज मिलें तो श्रृद्धा और भक्ति से उनके पावन दर्शन करें और आशीर्वाद पाकर अपने जीवन को धन्य करें।
