संस्मरणात्मक आत्म कथ्य - अफसरी दंभ भुला देता है मानवीय संस्कार

बात उन दिनों की है जब साक्षरता अभियान अपने परवान पर था। उन दिनों मैं जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी (पीआरओ) के पद पर बांसवाड़ा में ही पदस्थापित था।
एक बार गढ़ी में साक्षरता की कोई बड़ी बैठक थी। इसमें वागड़ के मनीषी शिक्षाविद् और साहित्य चिन्तक डॉ. शंकरलाल त्रिवेदी के साथ साक्षरता से जुड़े दो-चार अफसरों को भी जाना था।
साक्षरता वालों की गाड़ी उस दिन उपलब्ध नहीं थी और इस कारण इन सभी को हमारी विभागीय जीप में ले जाने की स्थिति सामने आयी।
वयोवृद्ध और हम सभी के लिए श्रृद्धेय डॉ. शंकरलाल त्रिवेदी जी को जीप में आगे बिठाया ताकि उन्हें बैठने में सहूलियत रहे। लेकिन उनके साथ ही दो और अफसर भी आगे की सीट पर जम गए। मैं और एक साथी पीछे की सीट पर बैठ गए।
अब आगे वाली सीट पर बैठना कितना मुश्किल भरा होता है, इसकी कल्पना हर कोई सहज ही कर सकता है। डॉ. शंकरलाल त्रिवेदी जी जरूरत से कहीं ज्यादा संवेदनशील, सहज और सरल थे इस कारण जैसे-तैसे उन्होंने सैण्डविच सफर तय किया। हालांकि उनका मन ही जानता होगा कि क्या अनुभव रहा।
लेकिन इस असहजता का भांपने में आगे की सीट पर साथ बैठे अफसरों का क्या लेना-देना। उन्हें तो अफसरी का दंभ था और हमेशा आगे वाली सीट पर बैठने के आदी रहे थे, आगे वाली सीट पर नहीं बैठेंगे तो उन्हें अफसर कौन मानेगा?
खैर, जैसे-तैसे वह यात्रा पूरी हुई। कुछ दिनों बाद डॉ. शंकरलाल त्रिवेदी जी से मिलना हुआ।
मैंने इस घटना का जिक्र किया तो उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया कि कुछ लोगों को हर दिन दिखाना पड़ता है कि वे अफसर हैं। दूसरों से अलग हैं।
साथ ही डॉक्टर साहब ने मुझे एक बात कही - ‘‘अफसरों से संवेदनशीलता की कल्पना बेमानी है, ये काले अंग्रेज हैं, इनसे किसी प्रकार की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। ये जात ही ऐसी है जो औरों को अपना नौकर-चाकर और गुलाम समझती है। अफसरी पा जाने के बाद मानवीय मूल्यों, संस्कारों और नैतिकता को ताज़िन्दगी गिरवी रख देना पड़ता है। अपना खुद का व्यक्तित्व रखने वाले संस्कारी अफसर अब कहाँ रहे। कुछ होंगे जरूर, पर वे अपने काम से मतलब रखते हैं, अपने आप में मस्त हैं।’’
तब से लेकर आज तक मुझे दार्शनिक डॉ. शंकरलाल त्रिवेदी जी यह बात याद है और मौके-बेमौके शाश्वत एवं कालजयी सच के रूप में सिद्ध होती रही है। अनगिनत छोटे-बड़े अफसरों को देखने के बाद इस पर ऐसी मोहर लग गई है कि इनकी छवि अमिट हो चुकी है।
