मंगलमूर्ति भगवान गणेश सर्वप्रथम पूजित दैव हैं जिनके स्मरण के बिना किसी की गाड़ी आगे नहीं बढ़ती। ऋद्धि और सिद्धि देने वाले गणेशजी की आराधना देश भर में भिन्न-भिन्न रूपों में की जाती है।
हिन्दू परम्परा में कोई स्थान ऎसा नहीं है जहां भगवान गणेश विराजमान न हों। प्राचीन मन्दिरों से लेकर आधुनिक राजप्रासादों और सामान्य घरों तक में गणेश विभिन्न स्वरूपों में विद्यमान हैं।
राजस्थान का बांसवाड़ा क्षेत्र भी विभिन्न सम्प्रदायों और मतों के साथ ही गाणपत्य मत से जुड़ा रहा है। पंचदेवोपासना में गणेश का महत्त्व सर्वविदित है।
बांसवाड़ा शहर के नागरवाड़ा में साहित्य चिंतक स्व. श्री छगनलाल नागर के घर भी ऎसे गणेशजी विराजमान हैं जो मारवाड़ से यहाँ आए हैं और इसलिए छगनलाल नागरजी इन्हें मारवाड़ी सेठ कहकर पूजते रहे हैं। श्री नागर का कुछ माह पूर्व ही निधन हुआ है। इससे कुछ दिन पूर्व हुई बातचीत में उन्होंने मारवाड़ी सेठ के मारवाड़ से वागड़ विहार की सारी कहानी सुनायी। इसके अनुसार वे सन् 1953-54 में बतौर पटवारी वे डीडवाना में सेवारत थे।
नागर ने इसी के आस-पास नागौर में भी कनिष्ठ लिपिक के पद पर सेवाएं दीं। मारवाड़ क्षेत्र में सेवाकाल के दौरान वहां पूर्व उप मुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा के घर किराये से रहते थे।
वहां पास की कुण्ड की सफाई के दौरान उन्हें गणेशजी की आधा फीट की प्राचीनतम मूत्रि्त मिली। इसे वे अपने कमरे में ले आए। इसके बाद उन्हें शंका हुई कि मूत्रि्त को पूजन में रखें या नहीं। ऎसे में उन्होंने नहा-धोकर गणेश प्रतिमा के सम्मुख कुंकुम, चावल आदि पूजन सामग्री की अलग-अलग 10-15 कागज की पुड़ियाएं बनाई और मन में धारण कर लिया कि कुंकुम वाली आएगी तो घर में रखूंगा अन्यथा कहीं मन्दिर में रख आऊंगा।
आँखें बंद करके जैसे ही पुड़िया उठायी, कुंकुम वाली ही निकली। इस पर यह निश्चय कर लिया कि भगवान गणेशजी की घर में रहने की इच्छा है। लेकिन इसके बाद उनकी सरकारी नौकरी छूट गई और वे बैंककर्मी बन गए। तभी से वे गणेशजी को ‘मारवाड़ी सेठ’ कहकर पूजने लगे।
इसके बाद उदयपुर तबादला हो जाने पर उन्होंने पुड़ियाओं वाले सुकून को दोहराया। इसमें भी निर्णय यह आया कि गणेशजी की इच्छा हमेशा उनके साथ रहने की ही है। इसके बाद से जब वे बांसवाड़ा आ गए, तब इस मूर्ति को साथ लाए और नागरवाड़ा स्थित अपने घर में विराजमान कर दी।
बांसवाड़ा में ही उनके घर आए अतिथियों में से किसी सिद्ध संत ने बताया कि दक्षिण सूण्ड वाले यह गणेशजी काफी चमत्कारिक हैं और कामना सिद्धि के लिए इन्हें पूजा विधि के बाद शुद्ध घी में रख देने पर मनोकामना जल्दी सिद्ध होती है। इसके बाद तो कई परीक्षार्थियों ने यह प्रयोग किया और परीक्षाओं में पास होते गए।
छगनजी के मारवाड़ी सेठ की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। कई गृहस्थियों ने भी गणेशजी की कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव किया। इसके बाद छगनभाई ने गणपति को छोटी सी मंदरी बनवाकर गणेशजी को आलिये में विराजमान कर दिया है। छोटे कद के छगनभाई के घर बड़े-बड़े काम करने वाले गणेश जी अपने आप में अलग ही हैं।
आम तौर पर वाम सूण्ड के गणपति ही होते हैं लेकिन दक्षिण सूण्ड वाले गणेशजी की विशेष मान्यता है। इनके लिए नियमित पूजा-विधान और गुड़ आदि के भोग की जरूरत हुआ करती है। यह माना जाता है कि दक्षिण सूण्ड वाले गणपति से संबंधित विशेष आराधना कठिन जरूर होती है मगर शीघ्र फलदायी है। मारवाड़ी सेठ बांसवाड़ा आकर लोगों के कष्ट निवारण करने के साथ ही मनोकामना पूर्ति करने वाले दैव के रूप में पूजे जाते रहे हैं।

