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साहित्य
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प्रकृति कर चुकी प्रलय का आह्वान

Deepak Acharya
Deepak Acharya
June 5, 2021

दुनिया भर में आज सर्वत्र ऑक्सीजन पाने के लिए कृत्रिम उपायों को अपनाना पड़ रहा है जबकि हमारे पास पेड़-पौधों के रूप में बड़े-बड़े और अखूट-अक्षय ऑक्सीजन भण्डार उपलब्ध हैं, जिनकी हम अवेहलना कर रहे हैं। विश्व पर्यावरण दिवस हम इंसानों के लिए धिक्कार दिवस है। और वह इसलिए कि हमने अपनी विलासिता और उपयोग के लिए पेड़-पौधों और प्रकृति को बरबाद करने में कहीं कोई कसर बाकी नहीं रखी है और इसी कारण आज हमें जिन्दा रहने के लिए ऑक्सीजन के प्रबन्ध करने पड़ रहे हैं।

इस विवशता और संहार के हालातों के लिए और कोई नहीं, बल्कि हम खुद ही हैं जिम्मेदार। न केवल दोषी, बल्कि महापापों के बोझ से घिरे हुए हैं क्योंकि भ्रूण, इंसान या किसी जानवर की हत्या केवल एक जीव की हत्या है जबकि एक पेड़ की हत्या हजारों जीवात्माओं की हत्याओं से अधिक पाप का भागी बनाती है क्योंकि पेड़ की वजह से आने वाली कई पीढ़ियों के सैकड़ों-हजारों इंसानों, जीव-जन्तुओं और तत्वों का पोषण होता है, प्राण वायु ही नहीं बल्कि बहुत कुछ मिलने का सिलसिला सदियों तक जारी रहता है।

अबकि बार पर्यावरण दिवस पर संकल्प लें कि आने वाली वर्षा ऋतु में कम से कम एक पौधा जरूर लगाएंगे। पौधरोपण करने के बाद पौधा मर जाता है तो भी हमें कई जीवों की हत्याओं का पाप लगता है, इसलिए पौधा लगाने से लेकर उसे सुरक्षित पल्लवन करते हुए बड़ा करने तक की जिम्मेदारी उठाएं, तब ही आने वाली पीढ़ियां हमारे योगदान का गर्व के साथ स्मरण करेंगी अन्यथा अश्लीलतम गालियां देती हुई जी भर कर कोसती रहेंगी। और वे जब तक ऎसा करती रहेंगी, हमारी गति-मुक्ति नहीं होने वाली।

विश्व पर्यावरण दिवस का दिन पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन के लिए काम करने का संकल्प लेने का दिवस है। अच्छा हो इस दिन हम संकल्प लें और पौधारोपण तब करें जब बरसात हो जाए और प्रकृति तथा परिवेश में पौधरोपण के लायक अनुकूलताएं हों, अन्यथा बेमौसम केवल दिखाने और तस्वीरें खिंचवा कर पब्लिसिटी कर खुश होने तथा हमें उपकृत करने में सक्षम महान लोगों को खुश कर देने के चोंचलों से कुछ नहीं होने वाला।

बरसात के मौसम के सिवा अन्य मौसम में पौधारोपण का कोई औचित्य नज़र नहीं आता। प्रकृति जिस समय सभी प्रकार के नैसर्गिक रंगों और रसों से भरपूर हो, उसी समय पौधरोपण से पौधों की वृद्धि दर बढ़ती है। इसी प्रकार पौधे आम तौर पर शुक्ल पक्ष में लगाए जाने चाहिएं क्योंकि उस पक्ष में रस और अमृत का देवता चन्द्रमा बलवान रहता है।

यह जीवन रस प्राप्त होता रहेगा तो पौधा शीघ्र अभिवृद्धि करेगा और उसे बड़ा होने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। इसी प्रकार पौधरोपण सूर्यास्त के समय नहीं करना चाहिए, इससे पौधे का भविष्य अच्छा नहीं होता।

पौधे भी इंसानी स्पर्श की भाषा समझते हैं। जो लोग शाकाहारी, शुचितापूर्ण, सज्जन, प्रकृति पूजक और श्रेष्ठ होते हैं उनके हाथों लगाए जाने वाले पौधे निश्चित रूप से पेड़ बनते ही बनते हैं जबकि दुष्ट, मांसाहारी, शराबी और भ्रष्ट लोगों के हाथों से लगाए-लगवाए जाने वाले पौधों की अकाल मृत्यु होने की संभावना बनी रहती है। यह अलग बात है कि बड़े-बड़े लोगों के हाथों जोर-शोर से वृक्षारोपण हो जाने के बाद उनके द्वारा लगाए पौधों के सूख जाने पर चुपचाप नए पौधे लगा दिए जाते हैं ताकि बड़े लोगों की तख्तियों का मान रह जाए।

केवल दिखावे भर के लिए बेमौसम पौधारोपण से पौधा पल्लवित नहीं हो पाता है, असमय ही मुरझा कर काल कवलित हो जाता है और इसका सारा दोष एवं पाप उन लोगों पर आता है जो कि पौधारोपण करते और करवाते हैं। इस सत्य को हमेशा अपने दिमाग में रखकर पौधारोपण करें और पौधे को बड़ा होने तक अच्छी तरह बच्चे की तरह परवरिश करें।

आज हम पौधे की बच्चों की तरह परवरिश का जिम्मा उठाएंगे तो आने वाले कल ये ही पौधे युवाओं के रूप में हमें निरन्तर ऊर्जा, स्फूर्ति और ताजगी देंगे तथा बुजुर्गों की तरह हर अच्छे-बुरे वक्त में संरक्षक एवं डॉक्टर की तरह हमें पालते रहेंगे।

विश्व पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण और पर्यावरण की बातें करने और सम्मान पाने का अधिकार उन्हीं को होना चाहिए जिन्होंने अधिक से अधिक पेड़ लगाए हों, बड़े किए हों। कितना अच्छा हो कि वृक्षारोपण के आयोजनों में भाषण-चाटन और प्रशस्तिगान की परंपरा को समाप्त कर पूरा का पूरा समय केवल और केवल अधिक से अधिक पेड़ लगाने में किया जाए। इससे समाज, क्षेत्र और देश का भला होगा।

यों भी पर्यावरण संरक्षण के लिए भाषणबाजी से कुछ नहीं होने वाला। विचार और उपदेश केवल वे ही प्रभावी और अनुकरणीय होते हैं जो कहने वाले के स्वभाव, आचरण व व्यवहार में हों, अन्यथा कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने कान केवल उन्हीं बातों को दिमाग और दिल में पहुंचाते हैं जिनमें आचरण का पुट हो, अन्यथा समानान्तर बाहर फेंक दिया करते हैं।

पंचतत्वों और प्रकृति की पूजा करने वाले भारत जैसे देश में यह दुर्भाग्य ही है कि हमें पर्यावरण दिवस मनाना पड़ रहा है। जबकि पर्यावरण संरक्षण हमारी आदि परम्परा में रहा है। इस दिन पर्यावरण संरक्षण की शपथ लेने वालों के नाम दर्ज होने चाहिएं और अगले पर्यावरण दिवस पर उनसे हिसाब लिया जाना चाहिए कि उन्होंने शपथ की पालना में क्या-क्या उपलब्धियां पायीं।

शपथ या प्रतिज्ञा का उल्लंघन महान पाप की श्रेणी में आता है। ऎसा करने पर इस लोक में चाहे हम बच भी जाएं, परलोक में प्रतिज्ञा उल्लंघन के पापों के परिणामों से नहीं बच सकेंगे, वहाँ तो नरक भोगना ही पड़ेगा। विधि का यह विधान भी संभव है कि पेड़ काटने वालों को अगले जनम में पेड़ ही बनना पड़े और बार-बार कटते हुए उन्हें यह अहसास हो जाए कि पेड़ों में भी जीव है और अपनी विलासिता और धन कमाने के लिए वृक्ष सम्पदा का दुरुपयोग कितना पीड़ादायक होता है।

वृक्ष हत्या का पाप करने वाले इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे क्योंकि इन बुद्धिहीनों और उन्मुक्त भोग-विलासियों को न जीवन का ज्ञान है, न जगत का। इन्हें यह भी पता नहीं है कि क्या पुण्य है और क्या पाप। पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन में जो जितना अधिक काम करेगा, उतना अधिक पुण्य का संचय होगा और परलोक सुधरेगा। इच्छा अपनी-अपनी। यहाँ नहीं पर वहां तो न्याय होगा ही।

इंसान की करतूतों और कारनामों से त्रस्त प्रकृति अब तक खूब बर्दाश्त कर चुकी है, अब आगे नहीं करने वाली। थक-हार कर प्रकृति ने कर ही दिया है प्रलय का आह्वान। फिर भी न समझ पाएं तो भुगतने को तैयार रहो। अब दिन दूर नहीं।