परवान पर है श्रीयंत्र माफियाओं का धन्धा

खिलौनों की तरह बिक रहे हैं, दिए जा रहे हैं श्रीयन्त्र
सनातन के मूल मर्म, पुरातन साधना पद्धतियों से अनजान और धर्म की धंधेबाजी से पैसा कमाने और बनाने की मायामोह भरी मृग मरीचिका के भंवर ने श्रीयंत्र और श्रीविद्या जैसी उच्चतम साधना को भी बाजारू बना दिया है।
आज श्रीयंत्रों के नाम पर जबर्दस्त बाजार पसरा हुआ है। श्रीयंत्र बिक भी रहे हैं और सिद्ध करके दिए भी जा रहे हैं, इनसे पैसा पाने के तौर-तरीकों के बारे में धनपिपासु और वैभव पाने के आतुरों को लुभाते हुए जो कुछ हो रहा है उसे देख समझ में नहीं आता कि रोएं या हँसें।
आजकल एक-दो फीसदी को छोड़ कर तकरीबन सारे ही धन पाने, जमीन-जायदाद और अनाप-शनाप सम्पत्ति अपने नाम करने के भूत पाले हुए श्रीयंत्रों की तरफ भाग रहे हैं या भगाए जा रहे हैं।
श्रीयंत्रों से बाजार भरे पड़े हैं। जो उपासना पद्धति और यंत्र गोपनीय हुआ करते थे, वे सारे धंधेबाजी की भेंट चढ़ गए हैं।
इस बारे में वे लोग ज्यादा बता सकते हैं जिन्होंने कहीं न कहीं से श्रीयंत्र लिए हैं, और उनके जीवन में कितना बदलाव आया, कितना पैसा, ऐश्वर्य पाया और श्रीयंत्र का क्या प्रभाव रहा।
आदि शंकराचार्य परम्परा, प्राच्य ग्रंथों तथा श्रीविद्या के विशेषज्ञें के अनुसार श्रीविद्या की दीक्षा लिए बगैर श्रीयन्त्र का स्पर्श महापाप बताया गया है। केवल दीक्षित साधक ही श्रीयंत्र की साधना के अधिकारी हैं।
इस बारे में जानकार सर्वज्ञ शंकरेन्द्र महाराज के फेसबुक पेज पर एक पोस्ट ‘‘सर्वज्ञ शंकरेन्द्र उपदेश (शंकराचार्यजी की वाणी)’’ में उन्होंने स्पष्ट लिखा था - ‘‘पूर्व जन्मों में जब सारी दीक्षाएं पूर्ण हो जाती है तो वर्तमान जन्म में श्रीविद्या की दीक्षा पूर्ण होती है। इस श्रीविद्या ( ब्रह्मविद्या ) की दीक्षा अन्तिम दीक्षा होती है, इस विद्या को प्राप्त करने के पश्चात् कुछ जानना आवश्यक नहीं, पूर्ण है। आज श्रीविद्या की दीक्षा देनेवाले भी दुकान लगा बैठे हैं। इस विद्या के प्राप्त साधक बड़े गुप्त होते हैं। बिना महादेव के परम अनुग्रह बिना इस “श्रीविद्या“ के साधक का दर्शन भी नहीं हो पाते हैं। हमें तो इसकी पूंछ भी ज्ञान नहीं है। श्रीयन्त्र का स्पर्श बिना अधिकार मत करना, तुम्हारा मंगल होगा। महापाप से बचना। ध्यान रखना - “श्री“ का अर्थ “ऐश्वर्य“ और “विष“ भी होता है। गलत किया तो यह “श्रीयन्त्र“ ही घर में कलह पैदा करेगा।’’
