मौज उड़ा रहे मुफ्तखोर, डकैत कहें या चोर

बहुत सारे लोग हैं जो अपनी गाँठ का धेला भर कभी खर्च नहीं करते। इनका ध्यान हमेशा इसी पर टिका होता है कि जो कुछ उनके लिए हो, वह सब कुछ सरकार करे या दूसरे लोग।
यहाँ तक कि असंख्य लोग ऐसे होंगे जो खाने-पीने का सामान, चाय-पानी, पान-गुटखा, नाश्ता, रोजाना की दाल-रोटी से लेकर अपने अन्तः वस्त्र तक के लिए भी औरों पर आश्रित रहते हैं कि वे दें तब इस्तेमाल करें।
और आश्चर्य ये कि ये लोग कोई भिखमंगे नहीं बल्कि अच्छे-अच्छे ओहदे, वजूद और पैसे वाले हुआ करते हैं। सरकारी सेवाओं में रहते हुए इन्हें भरपूर टीए-डीए और सारी सुविधाएं मिलती हैं फिर भी टीए-डीए उठाने के बावजूद मुफ्त का खान-पान और आवास एवं आतिथ्य तलाशते और भोगते रहने के लिए आतुर रहा करते हैं और चाहते हैं कि उनकी एक-एक पाई बची रहे, और जो कुछ मिले वह मुफ्त में।
किसी की दया, कृपा और अनुकंपा या किसी और माध्यम से सरकारी सेवाओं में घुसे या घुसा दिए गए लोगों में खूब सारे हैं जो पूरी जिन्दगी का निर्वाह सरकारी पैसों और सेवाओं, संसाधनों से करने के आदी हो जाते हैं।
और इनमें भी अनगिनत ऐसे होते हैं जो कभी रिटायर्ड होना ही नहीं चाहते। रिटायर्ड होने के बाद भी वापस सरकारी बाड़ों में घुस जाते हैं। इनकी एकमेव इच्छा यही रहती है कि जब तक जिएं तब तक सरकार की सेवा करते रहें।
असल में इसी प्रजाति के लोग ही हैं युवाओं की अप्रत्यक्ष हत्या के जिम्मेदार। रोजगार के प्रवाह में सबसे बड़े स्पीड़ ब्रेकर बने इन लोगों के कारण पद खाली नहीं रहने से बेरोजगारों को रोजगार मिलने में दिक्कते आती हैं। और ये हैं कि अपार धन-वैभव होने के बावजूद और अधिक जमा करने के फेर में कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहते हैं।
इसके पीछे एक विचित्र मनोविज्ञान भी है। ये लोग यदि रिटायरमेंट के बाद वापस सरकारी सेवाओं में फ्रन्ट या बैक डोर से न घुसें तो इनका जीना ही मुश्किल हो जाए क्योंकि नौकरी में रहते हुए लूट-खसोट और भ्रष्टाचार में रमे या निकम्मे बने रहे लोगों की न समाज पूछ करता है, न क्षेत्र के लोग।
सरकारी सेवाओं में रहते हुए इनका अहंकार सातवें आसमान पर रहता है जो कि रिटायरमेंट के बाद कई वर्षों तक भी नीचे उतरने का नाम नहीं लेता।
ऐसे में ये किसी न किसी बाड़े में न घुसे रहें तो मनोरोगी होकर समय से पहले ही भगवान से मौत मांगते नज़र आएं। इसीलिए ये मृत्यु होने तक किसी न किसी बाड़े में घुसे रहकर पैसा कमाते रहकर समाज एवं क्षेत्र में मिथ्या प्रतिष्ठा के भ्रम में जीते रहते हैं।
क्यों न ऐसे लोगों के लिए मृतचैल(शव आवरण वस्त्र) की व्यवस्था भी सरकारी मद में इनकी मौत से पहले ही करके इन्हें यह वस्त्र एडवान्स में ही दे दिया जाए, साथ ही इनकी देहत्याग के उपरान्त शवयात्रा, अन्त्येष्टि, मुण्डन, मृत्यु भोज, त्रयोदशा आदि के साथ ही कम से कम 10 वर्ष तक मासिक/वार्षिक श्राद्ध, बरसी आदि की व्यवस्था भी सरकार की ओर से ही किए जाने की गारंटी दे दी जाए, ताकि ये आराम से मर तो सकें।
अन्यथा भूत-प्रेत बन गए तो हम बाद वालों की ही आफत। क्योंकि पराए पैसों पर मौज उड़ाने और सरकारी धन व संसाधनों पर जिन्दगी के मौज-शौक पूरे करने वाले इन मुफ्तखोर भोगी-विलासियों की न तो मुक्ति हो सकती है, न कोई और जन्म मिल सकेगा।
फिर ये भूत-पिशाच उन बाड़ों में भी खुराफात करते हुए जमे रहेंगे जहां ये नौकरी कर चुके होते हैं। यों भी खूब सारे पेंशनधारी ऐसे भी देखे गए हैं जो कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अपने पुराने बाड़ों में बेवजह चक्कर काटते और बैठते रहते हैं। उनका यही मोह अगले जन्म में इन्हें सरिसृपों की श्रेणी में लाकर इन बाड़ों से बांधे रखता है।
अपने-अपने इलाकों में ऐसे विपन्न मुद्रा-कबाड़ियों का अध्ययन करें और इस सच्चाई से रूबरू हों। जीते जी अपने लिए सारी व्यवस्थाएं और विलासिता पाने के उपक्रम करने में ये माहिर होते हैं, इसलिए हमारी जिम्मेदारी यह है कि इनके मरने के बाद के प्रबन्धों का खर्च हम उन लोगों की तरफ से होना चाहिए जिनके देखते-देखते ये संसार छोड़ देते हैं।
इसके लिए क्यों न हम सभी लोग मिलकर इनके लिए चन्दा इकट्ठा कर उत्तर क्रिया कोष बनाएं ताकि अपने ये गरीब लोग सुकून से देह त्याग कर सकें।
इसके लिए हम सभी को मिलकर अभियान के तौर पर पहल करनी चाहिए। ऐसा आज नहीं किया गया तो ये भावी भूत-प्रेत और मुफ्तखोर पिशाच हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए कष्टदायी बने रहेंगे।
साथ ही सरकार को भी इस विषय में गंभीरता से सोचकर इन प्रबन्धों के लिए पृथक से मंत्रालय और विभाग बनाकर ठोस योजनाओं का क्रियान्वयन करना चाहिए।
भविष्य में भूत-प्रेत और पिशाच बनने वालों के बारे में सोचना वर्तमान का सबसे बड़ा धर्म और फर्ज है।
