क्रूर मजाक से रूबरू है देश की नारी शक्ति

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
पेशाब आने से डर कर पानी नहीं पीती महिलाएँ,
सुविधालयों का अभाव देश की महिलाओं को धकेल रहा है गंभीर बीमारियों की ओर
सुविधालयों के अभाव में आमतौर पर महिलाएं घर से बाहर निकलने पर प्यास होने के बावजूद भी पानी नहीं पीती हैं और इस वजह से महिलाओं में विभिन्न रोगों का प्रसार होता रहा है। ख़ासकर कामकाजी महिलाओं में इन रोगों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है।
गांवों, शहरों और महानगरों में कहीं भी महिलाओं के लिए पर्याप्त एवं उपयुक्त शौचालय या मूत्रालय नहीं होने की वजह से इन महिलाओं को सफर करते समय, घर से बाहर निकल कर आवागमन, खरीदारी के लिए बाजार जाते वक्त या सैर-सपाटे के दौरान काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और इन परेशानियों से बचने के लिए वे घर से बाहर निकलते वक्त या सफर में प्यास के बावजूद पानी नहीं पीने को विवश हैं।
खासकर कामकाजी महिलाओं के लिए यह समस्या विकराल बनती जा रही है जिनके लिए कहीं भी ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं और ऐसे में घर से बाहर निकलने के बाद इन्हें न तो सैर-सपाटे और न ही काम-काज के लिए आते-जाते वक्त कोई सुकून मिल पाता है।
स्कूलों और दफ्तरों में जो सुविधालय बने हुए हैं वहां की गन्दगी के मारे इन कामकाजी महिलाओं को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता रहा है। कई जगह जिला कलक्ट्री से लेकर दूसरे विभागों, सार्वजनिक उपयोग के स्थलों और समारोह आयोजन स्थलों से लेकर शॉपिंग सेंटरों, बाजारों, उद्यानों, बस स्टैण्ड व स्टॉप्स पर, धार्मिक, दर्शनीय, प्राकृतिक व पर्यटन स्थलों तक पर मूत्रालय एवं शौचालय उपलब्ध नहीं हैं।
इससे बचने के लिए नब्बे फीसदी महिलाएं तीव्र प्यास होने के बावजूद चाहते हुए भी पानी नहीं पीना ज्यादा सुरक्षित मानती हैं। कहीं पर भी विभिन्न विभागों व सार्वजनिक स्थलों में पुरुष मूत्रालय तक अच्छे नहीं हैं, महिला मूत्रालयों की बात करना तो बिल्कुल बेमानी है।
गांवों और शहरों में महिला सुविधालयों के अभाव के चलते महिलाओं में मूत्र व शौच के वेग को जबरन रोकने तथा विवशता की वजह से पानी कम पीने के कारण बीमारियां बढ़ने लगी हैं।
शरीर के विजातीय द्रव्यों को शरीर से बाहर निकालने के लिए शरीर की स्थिति के अनुसार पसीना और मूत्र विसर्जन नितान्त जरूरी है और इसके लिए डॉक्टरों की राय में ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए। लेकिन हमारे देश की महिलाएं चाहते हुए भी ज्यादा पानी सिर्फ इस वजह से नहीं पीती कि सुविधालयों का अभाव है और ऐसे में उनकी दिक्कतें और बढ़ जाती हैं। कमोबेश यह स्थिति पूरे देश की महिलाओं की है।
ग्रामीण परिवेशीय महिलाएं पेड़ और झाड़ियों की आड़ भी ले लेती हैं मगर मध्यम, उच्च और अभिजात्य वर्ग की महिलाएं और कामकाजी महिलाएं शर्म के मारे ऐसा नहीं कर पातीं और स स्थिति में उनके पास सिर्फ एक ही विकल्प बचता है - पानी कम पीना।
इससे शरीरस्थ विजातीय द्रव्य अपेक्षित मात्रा में बाहर नहीं निकल पाते, वहीं दूसरी और अनावश्यक वेग धारण करने की वजह से मूत्राशय और गायनिक की समस्याएं पैदा हो जाती हैं जो बाद में गंभीर बीमारी के रूप में सामने आते हैं। इसके अलावा कम पानी पीने वाली महिलाओं का पसीना भी तीव्र दुर्गन्ध देता है।
जिन सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों, स्कूलों में सुविधालय हैं उनका समुचित रख-रखाव नहीं हो पा रहा है और फ्लश के लिए पानी की पर्याप्त व्यवस्था तक का अभाव है। इस कारण ये सुविधालय दुर्गन्ध केन्द्र बनते जा रहे हैं।
देश भर में शायद 1 प्रतिशत से भी कम सरकारी संस्थान ऐसे होंगे, जिनके सुविधालय ठीक होंगे, और वह भी महानगरीय। शेष सभी में दुर्गन्ध भरी पायी जाती है।
कई स्थानों पर सुलभ कॉम्प्लेक्स बने हुए हैं मगर ये संख्या में बहुत कम होने की वजह से मात्र 2 प्रतिशत महिलाओं के लिए ही उपयोगी साबित हो रहे हैं। इन सुविधालयों में कई ऐसे हैं जहां महिलाओं द्वारा पेशाब करना तक सुरक्षित नहीं है। नब्बे प्रतिशत बस स्टैण्ड इस सुविधा से वंचित ही हैं।
गांवों और शहरों में सरकारी भूमि को बेचकर ज्यादा से ज्यादा राजस्व अर्जित करने की मानसिकता के चलते ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और नगरपालिकाओं द्वारा बस्तियों के बीच कोई ऐसी खाली जगह नहीं छोड़ी गई है जहां इन सुविधालयों का निर्माण कराया जा सके।
इसके अलावा आजादी के बाद से अब तक न तो प्रशासन के हाकिमों और न ही जन प्रतिनिधियों ने इस दिशा में कोई पहल की है। शहरों और गांवों में दिन ब दिन गहराती जा रही इस ज्वलन्त समस्या की ओर किसी महिला संगठन ने भी कोई हरकत नहीं की।
आज सभी महिलाओं का मानना है कि गांवों और शहरों में महिलाओं के लिए बस्तियों व बाजारों के बीच-बीच में उपयुक्त सुविधालयों का निर्माण किया जाना चाहिए और छोटे-बड़े हर बस स्टैण्ड पर महिलाओं के लिए सुविधागृह होने चाहिएं।
महिलाओं का यह भी मानना है कि लम्बी दूरियों के राजकीय एवं निजी यात्री वाहनों का स्टॉपेज उन स्थलों पर निर्धारित किया जाना चाहिए जहाँ महिलाओं के लिए शौचालय और मूत्रालय की उपयुक्त सुविधा उपलब्ध हो।
सरकार में मंत्रियों और अफसरों की यात्राएं खुद के वाहनों से होती हैं और इनके लिए जगह-जगह रेस्ट हाउस और सर्किट हाउस बने हुए हैं जिनका उपयोग कर लिया जाता है जबकि आम महिलाएं निजी और सरकारी बसों में सफर करती हैं और इनके लिए रास्ते में कहीं भी सुविधालय उपलब्ध नहीं होते।
ये महिलाएं अजीब सी दुविधा और यंत्रणा में जीने को विवश हैं लेकिन महिलाओं की हिमायत करने वाले संगठनों, महिला एवं बाल विकास विभाग और महिलाओं के कल्याण की बात करने वाली सरकारें भी इस दिशा में कुछ सोच तक नहीं पायी हैं।
महिलाओं का मानना है कि तमाम सुविधालयों में पानी की उपलब्धता और स्वच्छता पर सर्वाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए, भले ही उसके लिए कुछ शुल्क निर्धारित कर लिया जाए।
हालात ये हैं महिला राज्यपाल, महिला मुख्यमंत्री और महिला मंत्रियों का संयोग रहता है। इनसे लेकर महिला कल्याण से जुड़ी पूरी की पूरी सरकारी मशीनरी इस मामले में मौन ही बनी रहती है। यह स्थिति दुर्भाग्यजनक तो है ही, उन लोगों के मुँह पर तमाचा भी है जो महिलाओं के भले की बातों पर भाषण झाड़ते हैं। इस गंभीर समस्या पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।
आज हम उस इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, जहां सुविधाओं की कमी के कारण महिलाओं के लिए सभी स्थानों पर इस मामले में दुविधाजनक स्थिति ही है। उनके लिए उपयुक्त सुविधालय तक नहीं हैं।
देश में शासन और उच्च पदों पर बैठे पुरुषों की बात छोड़ भी दी जाए तो शासन और राजनीति में महिलाओं का वर्चस्व रहा है, बावजूद इसके लिए देश की महिलाओं को इस प्रकार की विवशता अपनानी पड़े, यह हमारे लिए शर्मसार करने वाली बात है।
आमतौर पर देश भर में सभी स्थानों पर महिलाओं के लिए सुविधालयों का अभाव है। जहां सुविधालय हैं वहां इतनी भीषण बदबू, सडांध और गंदगी व्याप्त रहती है कि कोई भी महिला इनके पास तक फटकना नहीं चाहती।
बड़े पदों पर बैठे लोगों के लिए सरकारी कार्यालय, सर्किट हाउस, रेस्ट हाउस, होटल्स, मोटल्स आदि सब कुछ हैं लेकिन आम महिलाओं के लिए देश में पेशाब तक करने की समस्या है। इतने बड़े और देशव्यापी मुद्दे को हवा में उड़ाना ठीक नहीं है।
महिलाओं के कल्याण और विकास के लिए इतनी बड़ी संख्या में सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं, संगठन काम कर रहे हैं, बड़ी संख्या में महिलाएं सरकारी-गैर सरकारी सेवाओं में उच्च पदों पर, मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक रहे हैं।
इस दिशा में गंभीरता से सोचने का वक्त आ गया है। हमारी मातृशक्ति की यह देशव्यापी और महा गंभीर समस्या है जिसका निवारण युद्ध स्तर पर योजना या अभियान चलाकर किया जाना जरूरी हो गया है। महिलाओं की इस तरह की ज्वलन्त समस्याओं का निर्णायक समाधान किए बिना महिला दिवस मनाना और महिला उत्थान के भाषण झाड़ना बेमानी ही है।
