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साहित्य
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जिन्दा भूत जिन्दाबाद

Deepak Acharya
Deepak Acharya
April 25, 2021

अब इंसानों और भूत-प्रेतों में कोई अंतर नहीं रहा। जो भूत-प्रेत करते रहे हैं वही आज का इंसान भी खुलकर पूरी मस्ती के साथ कर रहा है। जिन इंसानों को अपने आप पर भरोसा नहीं है वे भूत-प्रेेतों के जरिये अपने विचारों और कामों को मूर्त रूप देने के जुगाड़ में लगे रहते हैं।
धरती पर अवतरण पा लेने के बाद इंसान के लिए पूरी दुनिया उसकी अपनी होती है। दुनिया भर को देखने, काम सीखने और करने के लिए उसके पास कई दशक होते हैं लेकिन इंसान की फितरत ही ऎसी ही है कि चन्द लोगों और सीमित दायरों वाले स्थान का मोह पाले बैठ जाता है और फिर सारी दुनिया को जानने का भ्रम पालने की दिशा में छलांग लगाता रहता है।


हालात कूए के मेढ़कों जैसी भले ही हो, पर जिज्ञासा और भ्रम के मामले में नदियों के मगरमच्छों से लेकर समन्दर की व्हेल, शॉर्क और दरियाई घोड़ों से कम नहीं हैं। चन्द फीट के घेरों और 5-7 फुट के चन्द लोगों के इर्द-गिर्द रहकर अपने आपको सम्राट या भाग्यविधाता मानने-मनवाने लोगों की स्थिति ऎसी ही है।
इंसान को सदैव नवीन चिन्तन और नवीन संकल्पनाओं व संकल्पों के साथ हमेशा कुछ न कुछ नया करने की दिशा में उद्यत रहना चाहिए किन्तु वह ऎसा कुछ कर पाने की बजाय हमेशा भूतकाल में खोया रहता है और सदैव भूतकाल की ही बातें करता रहता है।


अधिकांश लोग ऎसे ही हैं जो कि वर्तमान में कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं होते, न इनमें उत्साह होता है, न कुछ नया करने की ललक। ऎसे लोग अपने पुराने दिनों की बातों को ही मरते दम तक बार-बार, कई-कई बार सुना-सुनाकर अपने आपको सदा-कर्मयोगी, ज्ञानी-विज्ञानी, अनुभवी और ताजातरीन मनवाने के जतन करते रहते हैं।


ज्ञान और अनुभवों को दोहराने तथा प्रयोग करने से अन्यों तथा आने वाली पीढ़ियों को सीखने-समझने और करने का मौका मिलता है किन्तु हमेशा ऎसा नहीं होता। खूब सारे लोग हैं जिनकी आदत ही हो गई है कि जहाँ मौका मिलता है वहाँ अपने बीते दिनों के उस ज्ञान और अनुभवों को सुनाना शुरू कर दिया करते हैं जिनका अब कोई औचित्य नहीं रह गया है।


कुछ लोग तो ऎसे ही हैं जो कि हर पल भूतकाल का रोना रोते रहते हैं। ऎसे लोगों को समझदार लोग पुरानी घिसी-पिटी रिकार्ड या कैसेट की संज्ञा देते हुए चुपचाप मनोरंजन के मूड में इन्हें झेलते रहते हैं। समझदारों की कमजोरी कहें या असीम धैर्य, कोई भी ऎसे लोगों को इनकी हकीकत बताने की पहल नहीं करता कि वे जो कुछ कह रहे हैं, सुना रहे हैं, वह इससे पहले बीसियों बार सुना चुके हैं और यही सब सुन-सुनकर लोगों के कान पक गए हैं, और अब इन बातों का न कोई औचित्य है, न प्रभाव।


भूतकाल की खूब सारी बातें अब अवधिपार हो गई हैं क्योंकि जमाना जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है उसके आगे अब कई पुरानी बातें, ज्ञान, अनुभव और तकनीक सब कुछ बेमानी हो गए हैं। आम तौर पर जानकारों की धारणा यही होती है कि जीवन से थके-हारे और अवधिपार लोगों के पास भूतकालीन बातों के सिवा कुछ है ही नहीं कि जो जमाने के सामने परोस सकें। इसलिए यह उनकी ऎसी आदत हो गई है कि जो भूतकालीन बातों को छोड़ दें तो समय से पहले ही आकस्मिक अवसान को प्राप्त हो जाएं या कि खटिया पकड़ लें।


जब से कार्य संस्कृति, कर्मयोग और समाजोन्मुखी सेवा भावों का खात्मा होने लगा है तब से भोग-विलास, आमोद-प्रमोद, आलस्य-प्रमाद इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग बैठे-बैठे खाना और मौज उड़ाना चाहते हैं।


जब से हालात ये हो चले हैं कि समाज, क्षेत्र और देश के लिए निष्काम भाव से समर्पित कर्म करने में कोई रुचि ही नहीं देखी जा रही। तभी से सारे के सारे पुराने भूतों और भूतकालीन बातों, अनुभवों के सहारे ही जीवन और जगत की वैतरणी पार करने में भिड़े हुए हैं।


ऎसे माहौल में आशंका होती है कि धरती कहीं बीज तो नहीं खा गई जो कि सब कुछ भूतकाल और भूतों के भरोसे करने को विवश होते जा रहे हैं। हैरत की बात ये भी है कि खूब सारे अवधिपार भूत बार-बार किसी न किसी की दया, कृपा और अनुकम्पा पाकर वर्तमान हो जाया करते हैं और वर्तमान की छाती पर मूंग दलने के अधिकार पा जाते हैं।


खूब सारे लोग हैं जो हमेशा बीते दिनों की ही बातें करेंगे, अपने पुराने स्थानों और पदों पर रहकर किए गए कामों को गिनाएंगे और भूतकाल ही भूतकाल की बातें करते रहेंगे। वर्तमान में जीने और वर्तमान में कुछ करने की बात सुनना न इन्हें सुहाता है, न करने की ललक है।


इन लोगाें से कोई पूछे कि वर्तमान काल में आपका क्या योगदान है, तो बगले झांकने लगेंगे। भूतकालीन चर्चाओं में रमे रहकर टाईमपास करने वालों में रिटायर्ड भी हैं और वे भी हैं जो पाँच साला या साठ साला बाड़े के अधीश्वर बने हुए भाग्यनिर्माता बने हुए हैं, औरों का भाग्य बाँचने या बनाने की प्रक्रिया में अपने आपको झोंके हुए हैं।


इनमें दो तरह के लोग हैं। भूतों के पदचिह्नों पर चलने वाले हैं और भूतकालीन लकीरों पर दौड़ लगाने वाले। इन दोनों ही किस्मों के लोगों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये लोगों को भ्रमित करने के तमाम हथकण्डों में माहिर होते हैं।


असल में वे लोग भूत ही हैं जो हमेशा भूतकाल की ही बातें करते हैं, अपनी भूतकालीन उपलब्धियां गिनाते हुए आत्मप्रशंसा में रमे रहते हैं और यह एकाधिकार जमाने की कोशिश करते रहते हैं कि आज के वर्तमान पर वे और उनकी भूतकालीन बातें ही इक्कीस ठहरती हैं।


इन लोगों के पास भूतकाल की यादों और बातों के सहारे जीने के सिवा खुद के अस्तित्व को बचाए रखने का और कोई सहारा नहीं होता। वर्तमान को गौण मानकर भूतकाल की बातों और लोगों की चर्चा करते हुए अपनी ही अपनी बड़ाई करने वाले लोग वर्तमान से आनन्द से तो वंचित रहते ही हैं, इनका भविष्य भी कोई सुखद या सुकूनदायी नहीं रहता। मरने के पहले तक भूतकाल को भुनाते हुए हैं और मरने के उपरान्त इन्हें भूतयोनि ही प्राप्त होती है।