अलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् .... महालक्ष्मी नमोऽस्तुते ...

पूरा देश दीवाली पर्व समुच्चय की रंगत में रचा-बसा और खोया हुआ है। हर कोई लक्ष्मी को रिझाने में लगा है। चाहता है कैद कर लें लक्ष्मी मैया को अपनी तिजोरी में। इसके लिए क्या-क्या जतन नहीं हो रहे यहाँ-वहाँ सभी जगह। हरचन्द कोशिशों में रमे हैं धन पिपासु।
हर कोई चाहता है जमाने की रफ्तार और समृद्धि के अनुरूप सारे संसाधन, भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार और दुनिया की ज्यादा से ज्यादा सम्पत्ति पर अपना और सिर्फ अपना ही कब्जा। जो कुछ दीख रहा है, दिखाया जा रहा है वह चकाचौंध में फब रहा है।
इस चमक-दमक को ही लक्ष्मी का रूप मानकर हर कोई लगा है लक्ष्मी पाने के फेर में। जिनके पास अपार धन-दौलत है वे भी, और जिनके पास कुछ नहीं है वे भी लक्ष्मी मैया की कृपा पाने को आतुर हैं। तरह-तरह के जतन हो रहे हैं, बिजली की इतनी घातक और तीव्र चकाचौंध भरी चमक-दमक कि आँखों की रोशनी भी शरमा जाए या कि आँखों के आगे अँधेरा ही छा जाए। डीजे की कानफोडू आवाजों और माईक श्रृंखलाओं से हो रहे मंत्र-स्तुतियों के गान, दिन-रात फट रहे भजनों के बादलों, पटाखों के तेज और अपार शोरगुल के बीच लक्ष्मी खुद कंफ्यूज है अपने भक्तों को लेकर।
हर तरफ जबर्दस्त चकाचौंध। लक्ष्मी मैया भी घबरा जाए और उसे भी सोचना पड़े आखिर कहाँ जाए वह। लक्ष्मी को चाहने के लिए हो रहे प्रयासों के बीच यह गंभीरता से सोचना होगा कि हम किस लक्ष्य का संधान कर ये सब कर रहे हैं।
जब हम लक्ष्मी की साधना करते हैं, लक्ष्मी मैया को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं तब हमें अच्छी तरह यह समझ लेना चाहिए कि लक्ष्मी क्या है और अलक्ष्मी क्या है। क्योंकि लक्ष्मी मैया वहीं आती हैं जहां अलक्ष्मी नहीं होती।
आज जो भौतिक चकाचौंध हम चारों को देख रहे हैं वह लक्ष्मी न होकर अलक्ष्मी ही है। लक्ष्मी से संबंध सिर्फ धन का ही नहीं है, लक्ष्मी जब आती है तब चराचर जगत के उपलब्ध और दुर्लभ सम्पूर्ण प्रकार के वैभव प्रदान करती है, ऐश्वर्य देती है और जीवन आनंद से सरोबार हो जाता है। अष्ट सिद्धि और नव निधि का स्वामी अथवा स्वामिनी होने तक अहसास कराती है।
जिसके जीवन में लक्ष्मी का प्रवेश हो जाता है उसका हर क्षण महाआनंद से भर उठता है, उसे आत्मतोष और प्रसन्नता के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। जीवन का हर ऐश्वर्य उसे सहज ही प्राप्त होता है। लक्ष्मी को अपने नाम किए रखने या अपने बाड़ों में नज़रबन्द रखने या कि छिपाने की कोई आवश्यकता नहीं रहती, न चोर-उचक्कों, डकैतों या रिश्वतखोर भ्रष्ट लोगों की काली मैली निगाह पड़ने का भय होता है।
लक्ष्मी पाने के लिए पुरुषार्थ और शुचिता प्राथमिक अनिवार्य शर्त है और ऐसा होने पर ही लक्ष्मी का आगमन होता है। इसके बगैर लक्ष्मी पाने की कल्पना नहीं की जा सकती है।
जहाँ भ्रष्टाचार, काला धन, रिश्वत, हराम की कमाई, बेनामी पैसा, अपवित्र, निन्दित और बुरे माध्यमों से आया धन, काला मन और जड़ता भरे संसाधन होते हैं वहाँ लक्ष्मी की बजाय अलक्ष्मी वास करती है और ऐसे माहौल में लक्ष्मी की दूर-दूर तक कल्पना नहीं की जानी चाहिए।
हमारे आस-पास ऐसे लोगों की भरमार है जो बड़े प्रतिष्ठित कहे जाते हैं, अकूत धन-दौलत के स्वामी हैं और भौतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है। लक्ष्मी जहाँ निश्चिन्तता और प्रसन्नता के साथ शाश्वत शान्ति, संतोष एवं बहुविध तृप्ति के अपार आनंद का अनुभव कराती है वहीं अलक्ष्मी का जमा हुआ कबाड़ अहर्निश उद्विग्नता, चोरी या नष्ट होने अथवा छीने जाने का भय, अशान्ति और असन्तोष के साये में जीने को मजबूर कर देती है।
लक्ष्मीवान लोग अपने पास उपलब्ध धन सम्पदा को सेवा एवं परोपकार के काम में खर्च कर प्रसन्न होते हैं, दान-धर्म में लगे रहते हैं लेकिन अलक्ष्मीवानों के भाग्य में दान-पुण्य अथवा सेवा-परोपकार जैसा कोई भाव नहीं होता। उनके पास केवल और केवल संग्रह का ही भूत सवार होता है।
यह अलग बात है कि उनका जमा किया धन खुद के किसी काम नहीं आता, इस पर और लोग ही मौज उड़ाते हैं। तभी कहा गया है कि भाग्यशालियों के लिए भूत कमाते हैं। पुरुषार्थ से कमाया धन ही इंसान अपने पर खर्च कर सकता है।
निन्दित कर्म और रास्तों से अर्जित सम्पदा अर्जन और संग्रह करने वाले के किसी काम नहीं आती। ये लोग तो केवल मजूर और कबाड़ी की तरह जमा और संग्रह करने में ही जिन्दगी गुजार दिया करते हैं।
धन संग्रही और परिग्रही लोगों से बड़ा भूत-पलीत और कोई हो ही नहीं सकता। ये मुद्रा राक्षस जीते जी सिक्योरिटी गार्ड या चौकीदार की तरह धन की रक्षा में लगे रहते हैं और मरने के बाद भूत-पलीत या सरिसृप बनकर अपने-अपने डेरों में कुण्डली मारे जमे रहते हैं।
इन सबके बावजूद कितनों के मन में संतोष है, कितनों के चेहरों पर प्रसन्नता के भाव हैं, कितनों के पास मुस्कान बनी हुई है या कितने वो सब काम कर पाते हैं जो सामान्य आदमी हँसी-खुशी से कर लेता है और आनंद में रहता है।
इसका जवाब नकारात्मक ही आएगा। जहाँ धन-वैभव है और प्रसन्नता नहीं है वहाँ लक्ष्मी की बजाय अलक्ष्मी का निवास निश्चय मानना चाहिए। फिर अलक्ष्मी अपने साथ कितनी ही समस्याओं को लेकर आती है जो कभी व्यभिचार तो कभी बीमारियों के रूप में व्यक्तित्व को धीरे-धीरे खोखला करती रहती है। जहाँ अलक्ष्मी होगी वहाँ दुनिया की सारी बुराइयां सम्मानपूर्वक विद्यमान होंगी ही। इसके विपरीत जिन पर लक्ष्मी मैया प्रसन्न रहती है वे हमेशा चुस्त, मस्त, प्रसन्न और संतोषी रहते हैं।
लक्ष्मी और अलक्ष्मी में फर्क करना जरूरी है। जहाँ अलक्ष्मी है वहाँ लक्ष्मी का आगमन कभी हो ही नहीं सकता। ऋग्वेद का श्रीसूक्त लक्ष्मी प्राप्ति का सबसे बड़ा प्रयोग है। इसका निरन्तर पाठ व जप किया जाए तो लक्ष्मी की प्रसन्नता सहज ही प्राप्त हो सकती है लेकिन इसमें भी लक्ष्मी पाने की कामना करते हुए यह भी स्पष्ट कहा गया है कि अलक्ष्मी नष्ट हो जाए।
यानि की लक्ष्मी का आगमन तभी होगा जब हमारे पास उपलब्ध या कहीं से आ चुकी अलक्ष्मी पूरी तरह नष्ट हो जाए। अलक्ष्मी का नाश होने के बाद ही लक्ष्मी का आगमन होता है। अलक्ष्मी के रहते हुए लक्ष्मी की प्रसन्नता की कल्पना व्यर्थ ही है।
हो सकता है कि यह अलक्ष्मी बाप-दादाओं की हो, अपने भ्रष्टाचार और रिश्तखोरी से प्राप्त हुई हो या फिर कामचोरी के बावजूद पैसा ले लिया हो। पुरुषार्थ के बिना प्राप्त सम्पत्ति अलक्ष्मी की श्रेणी में आती है।
लक्ष्मी प्राप्ति की कामना किसे नहीं होती लेकिन यह भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हम लक्ष्मी के जिन रूपों को देख कर आराधना कर रहे हैं वह लक्ष्मी नहीं है। यदि उसे ही लक्ष्मी मान लिया जाए तो ऐसी लक्ष्मी होने के बावजूद जीवन जीने का आनंद या जीवन का ऐश्वर्य क्यों नहीं है।
इतना सब कुछ होने के बावजूद हम सुरसाई भूख-प्यास से पीड़ित क्यों हैं, क्यों हम भीखमंगों की तरह याचक बनकर इधर-उधर घूम रहे हैं। कभी पद-प्रतिष्ठा पाने, कभी सम्मान, पुरस्कार और अभिनंदन पाने, कभी सहायता, अनुकम्पा और दया पाने, और कभी और कुछ प्राप्ति की कामना से ऐसे-ऐसे लोगों के चक्कर काटते हैं, जयगान करते हैं, चरण स्पर्श करते हैं जिनसे कुत्तों, गधों और गिद्ध-कौओं को भी श्रेष्ठ माना जा सकता है।
लक्ष्मी की आराधना करें मगर इसके लिए पुरुषार्थ को सर्वोपरि मानें, शुचिता का भाव रखें और सेवा तथा परोपकार के कामों में धन लगाएं तभी वह लक्ष्मी हमें, हमारे परिवार को और हमसे जुड़े हुए समस्त परिचितों को आनंद की प्राप्ति करा सकती है। अन्यथा अपने पास अनाप-शनाप रुपया-पैसा और द्रव्य होने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि उसका सदुपयोग नहीं हो पाता।
लक्ष्मी का सदुपयोग शुरू हो जाने पर दूसरों की हमारे प्रति भावना ईर्ष्या से बदल कर आशीर्वाद और दुआओं भरी हो जाती है। लक्ष्मी को स्थिर करना चाहें तो परोपकार और सेवा में इसका खर्च करें तभी लक्ष्मी बहुगुणित होने लगेगी।
