साँप-बिच्छुओं की धर्मशाला, गधों का अभयारण्य

पूर्वकाल में जमीन के अंदर रहने वाले तमाम प्रजातियों के साँप अब मुँह निकाल कर बाहर आ चुके हैं। उन साँपों के केवल मूँछें ही हुआ करती थीं लेकिन अब हर साँप को देख कर आभास होता है कि इन्होंने किसी न किसी रंग की टोपी पहन रखी है। कोई मफलर बांध रखा है या फिर कोई न कोई पट्टा या उपरणा धारण कर रखा है। इनमें तिलकधारी साँप भी हैं और बिना तिलक वाले सेकुलर साँप भी।
उस जमाने में साँप लोगों से डरकर बिल में छिपे हुए होते थे और अब साँपों की फुफकार सुन और जहर के खतरों को जान लोग डरने लगे हैं। अब साँपों ने बहुमत का सूत्र पा लिया है इसलिए संगठन को अपना चुके हैं।
कोई सी प्रजाति के साँप क्यों न हों, धरती पर धमाल मचाने के मामले में सारे एक हैं। वहाँ न रंग भेद है, न उम्र या नस्ल भेद और न ही इस बात का कोई फर्क पड़ता है कि कौन सा किस गुट या पार्टी का है।
जब भी कुछ हथियाने का मौका आता है, मिनीमम कॉमन प्रोग्राम को देखकर साँपों के गठबंधन बनते हैं, टूटते हैं और बिखर जाते हैं। फिर जब मौका आता है सारे साँप और सापिनों की भीड़ एक हो जाती है।
साँपों का अब चूहों और बिच्छुओं से भी कोई वैर नहीं रहा। चूहे ही हैं जो साँपों को अपने बिल में पनाह देते हैं और भोज्य सामग्री की व्यवस्था भी करते हैं। फिर छछून्दरों की भी अपनी अलग ही मस्ती है। देशी चूहे इन छछून्दरों और गोरे चूहों को विदेशी मानते हैं और इन्हें पूज्य एवं वरेण्य मानकर अंधानुचरी करते हुए गौरव एवं गर्व का अनुभव करते हैं।
देशी हैं कि यों तो आपस में लड़ते रहते हैं मगर शत्रु कोई तगड़ा वाला हो तो साँपों के साथ गठबंधन बनाकर टूट पड़ते हैं। साँपों के साथ पूरा का पूरा संसार चलता है।
सपोलों को ट्रेनिंग देने के चक्कर में बहुमत जुटाने के हथकण्डों की ओर पेल दिया जाता है और चेले-चपाटी, मुफतिया खुरचन चाटने और चूसने वाले चमचाब्राण्ड पिछलग्गू छुटभैये साँपों की उतरी हुई केंचलियों को दिखा-दिखा कर ही उनके होने का भ्रम फैलाकर अपनी खोटी चवन्नियां चला रहे हैं।
साँपों और सिंहासन की दोस्ती इन्द्र और तक्षक के जमाने से चली आ रही है। ये साँप ही हैं जो नागलोक छोड़कर धरती पर धींगामस्ती करने लगे हैं। करें भी क्यों न, यहां हर तरह की स्वतंत्रता भी है और अपार अपरिमित स्वच्छन्दता भी।
अभिव्यक्ति की आजादी से लेकर सब कुछ करने की आजादी के लिए तो यह भारत धरा दुनिया भर में साँप-बिच्छुओं की धर्मशाला और गधों के अभयारण्य के रूप में जानी जाती है।
जिसका जो जी चाहे वह कर सकता है। यहां मानवाधिकारों की तरह सर्पाधिकार भी हैं जो इतने सुरक्षित हैं कि संसार भर में मिसाल दी जाती है। इन साँपों को क्या कहिएं अब। दूध तो पीते ही हैं, रबड़ी भी पी जाते हैं और वह सब कुछ भी जिसके लिए सरकारें राजस्व प्राप्ति के लक्ष्य से नीतियां बनाती हैं।
हर साँप को यह भ्रम होता है कि वह मणिधर है और इसीलिए वह चाहता है कि जो प्राप्य है वह उस तक पहुंचता रहे और वह बैठे-बैठे खाता रहे। और साँपों को दूध पिलाने वाले इस भ्रम में हैं कि वह जाते-जाते भी मणि उनके नाम कर जाएगा, पूरी मणि न सही तो कोई टुकड़ा ही उनके भाग में आएगा ही आएगा।
साँपों और उनको दूध पिला-पिला कर पुष्ट करने वालों की हमारे यहाँ कोई कमी नहीं रही। तभी तो बहुत सारे आदमियों की शक्ल साँपों से मिलती-जुलती दिखाई देती है। जरा गौर से देखें अपने आस-पास के भुजंगवृत्ति लोगों को। सच सामने आ ही जाएगा।
