आपसी संवाद -
सरकारी टीचर प्राईवेट स्कूल टीचर से - यार वाकई, तुम्हारी जिन्दगी भी जोरदार है। अभी दो साल हुए नहीं कि कार खरीद ली, बंगला भी, और माल भी खूब बना डाला। हम तो वहीं के वहीं हैं और बदनाम अलग कि मोटी तनख्वाह लेकर भी पढ़ाते नहीं। और तारीफ भी हो तो प्राईवेट स्कूलों के टीचर की, तिस पर यह भी कहा जाए कि कम तनख्वाह में कितना अच्छा पढ़ाते हैं।
प्राईवेट स्कूल टीचर - अरे यार, यह सब टेक्नीक का कमाल है। प्राईवेट स्कूल में हैं तो क्या हुआ। बिजनैस के फण्डों में किसी से पीछे थोड़े ही हैं। प्राईवेट स्कूल में तनख्वाह कम मिलती है यह बात जरूर है लेकिन वहाँ खुली छूट होती है कि कमाने के दूसरे सारे रास्ते आजमाए जा सकते हैं। हम लोग ऐसी जबरदस्त तकनीक आजमाते हैं कि बच्चे भी खुश, अभिभावक भी खुश, हमें और प्राईवेट स्कूल प्रबन्धकों को तो खुश होना ही है।
सरकारी टीचर उत्सुकता और जिज्ञासा भरी निगाह से - वह कैसे? हमें भी तो बताओ यार।
प्राईवेट स्कूल टीचर - प्राईवेट स्कूल वाले हमें वेतन बहुत कम देते हैं मगर इससे कई गुना हम यों ही कमा लेते हैं। सत्र शुरू होने के दो-तीन महीने बाद ही हम बच्चों की डायरियों में ‘‘बच्चा कमजोर है, घर पर ध्यान दें...’’ आदि-आदि, कुछ न कुछ लिखकर भेजना शुरू कर देते हैं। अभिभावक भयभीत हो जाते हैं बच्चों की पढ़ाई को लेकर। फिर आजकल किसके पास टाईम है अपने बच्चों पर ध्यान देने का, पैसा तो खूब है। बस यही तो हम चाहते हैं।
ऐसे में अभिभावक बच्चों को हमारे पास ट्यूशन के लिए भेजना शुरू कर देते हैं। हम स्कूल में पढ़ाएं या न पढ़ाएं, घर पर ट्यूशन में पूरे मन से पढ़ा लेते हैं। फिर एक बच्चा हम कई टीचरों के वहां अलग-अलग विषयों का ट्यूशन करता है इसलिए हम सारे टीचर खुश। इस तरह दिन-रात में कई-कई बैच पर बैच चलाकर ट्यूशन ही से ही सरकारी टीचरों से कई गुना ज्यादा कमा लेते हैं। स्कूल वाले भी खुश, उन्हें तो अपनी स्कूल का नाम चाहिए, उन्हें इस बात से क्या मतलब है कि बच्चे ट्यूशन से पढ़कर स्कूल का नाम रौशन कर रहे हैं या और कुछ। फिर ट्यूशन का कमाल ही इतना है कि ये बच्चे अव्वल तो आने ही हैं। मेरिट में नाम आने का फायदा स्कूल को भी मिलता है। इनके फोटो और नामों का इस्तेमाल कर बड़े-बड़े विज्ञापन छपते ही स्कूल की साख इतनी अधिक ऊँचाई पा लेती है कि बच्चों की संख्या भी हर साल बढ़ती चली जाती है। हमारी वजह से बिना किसी खर्च के स्कूल का इतना नाम हो रहा है, वो कम है क्या?
फिर जितने अधिक बच्चे पढ़ने आएंगे, उतनी अधिक किताबें, स्टेशनरी, ड्रैस और दूसरे सारे सामान की बिक्री, होली-दीवाली, राखी और आए दिन होने वाले किसी न किसी फंक्शन का लाभ भी स्कूल के खाते में, मौज-मस्ती का मजा सो अलग।
सरकारी टीचर फिर आधी-अधूरी जिज्ञासा से - पर हर बैच में इतने सारे स्टूडेंट कैसे आ जाते हैं।
प्राईवेट स्कूल टीचर - हम टीचर ही नहीं, अच्छे मनोवैज्ञानिक भी हैं। हर बैच में सह शिक्षा का अनुपात बनाए रखते हैं। इस कारण आकर्षण भी बना रहता है और हमारा हर बैच भरपूर चलता रहता है।
अन्त में सरकारी स्कूल के टीचर ने माथा पकड़ लिया और स्वीकार कर ही लिया कि यश और धन-सम्पत्ति न केवल भाग्य बल्कि टैक्नीक से ही प्राप्त होती है।

