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साहित्य
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भटक गए हैं हमारे आदर्श

Deepak Acharya
Deepak Acharya
September 16, 2021

हमारे जीवन की दशा और दिशा अब करीब-करीब पूरी बदलती ही जा रही है। पहले हम अच्छे इंसान बनने और सर्वोत्तम मानव होने की प्रतिष्ठा पाने के लिए पूरा जीवन होम दिया करते थे, अपने स्वार्थ केन्दि्रत और आत्मस्वार्थी खुदगर्ज स्वभाव को छोड़कर समाज, क्षेत्र और देश के लिए जीते थे और लगातार दिन-रात कर्मरत रहते हुए किसी न किसी क्षेत्र या विषय विशेष में महारत हासिल कर अपने व्यक्तित्व को प्रखर एवं लोकोपयोगी बनाते हुए समाज की सेवा एवं परोपकार के लिए समर्पित होने के लिए आतुर रहा करते थे।

बीते जमाने में हर कोई हुनरमन्द होता था और समाज तथा क्षेत्र के लिए उसकी उपयोगिता हुआ करती थी। इसी सामूहिक कौशल शक्ति के बल पर हमारे पुरखे ऎसे-ऎसे काम कर गए जिन्हें आज भी श्रद्धा, सम्मान और गौरव के साथ याद किया जाता है।

पुराने समय में हर व्यक्ति अपने आपको उच्चतम स्तर तक निखारने और इंसान के रूप में सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए समर्पित एवं लगनशील रहता था। और इस सारी प्रक्रिया में न उसका किसी से कोई दुराव या प्रतिस्पर्धा भाव था और न ही किसी प्रकार का कोई असम्मान या प्रतिशोध। जो कुछ अर्जित किया जाता था वह प्रेम भाव से, गुरु-शिष्य परम्परा को आस्थापूर्वक निभाते हुए, सम्पूर्ण कृतज्ञता भाव से भरे हुए। इससे जुड़े साधनों और मार्गों में भी कोई शुचिताहीनता या भेदभाव नहीं था।

हर व्यक्ति को मानव जीवन के उद्देश्य और लक्ष्य के बारे में पता होता था और उसी को ध्यान में रखकर वह अपने जीवन की दिशा और भविष्य के रास्तों और लक्ष्यों को तय करता हुआ आगे बढ़ता था। उसे अच्छी तरह इस बात का भान था कि वह समाज के लिए है, राष्ट्र के लिए है, इसलिए इनके सिवा सारी बातें, व्यक्ति और प्रवाह का कोई ज्यादा असर नहीं हुआ करता था।

इंसान को अच्छी तरह पता होता था कि मानव जीवन केवल एक बार शरीर धारण करने तक सीमित नहीं है बल्कि बार-बार जन्म लेना पड़ता है और तब कहीं जाकर मोक्ष प्राप्त हो सकता है। इसलिए वह अपने शरीर को साधन मानकर बौद्धिक और शारीरिक रूप से उत्तरोत्तर समृद्ध बनने की दिशा में लगातार प्रयासरत रहता था। उसे यह ज्ञान था कि इस जन्म में जो कुछ संचित होगा, वह अगले जन्म तक जुड़ता रहेगा और मरणोपरान्त मनुष्य के रूप में अच्छे कर्म करता रहा, तो आने वाला जन्म मनुष्य का ही प्राप्त होगा।

इसलिए पुरुषार्थ और परिश्रम में कहीं कोई कमी नहीं रखता। किसी के कहने पर नहीं बल्कि वह स्वैच्छिक रूप से अपने आप अपने, समाज और क्षेत्र के कामों में भागीदारी निभा लेता था और उन कामों से उसे जो आत्म संतुष्टि और आनन्द प्राप्त होता था वह वर्णनातीत हुआ करता था। जीवन को भी उल्लास एवं आनंद से भरा रखता था तथा श्रेष्ठ कर्मों और सेवा-परोपकार की वजह से उसका पुण्य भण्डार भी लगातार बढ़ता रहता।

बीते युगों से लेकर हाल के तीन-चार दशकों तक यह आदर्श स्थिति देखी जा सकती थी लेकिन अब जिस तरह के लोग सामने आ रहे हैं उन्हें देख कर लगता है कि वर्क कल्चर, सेवा भाव और परोपकार की भावनाएं खत्म होती जा रही हैं। लोग काम करना ही नहीं चाहते। कुछ अतिरिक्त न मिले, तो हिले-डुले तक नहीं। अब ऎसे-ऎसे लोग सामने आते जा रहे हैं जिन्हें पुरुषार्थ और मेहनत से कोई सरोकार नहीं, न काम करना चाहते हैं, न काम हो पाता है।

देश का सौभाग्य है कि पुरानी पीढ़ी के कुछ फीसदी निष्ठावान, समर्पित और समाजोन्मुखी लोगों के कारण से सब कुछ चल पा रहा है अन्यथा आज के युवाओं की स्थिति इनके कर्मयोग और समर्पित निष्ठाओं, त्याग-तपस्या और जिजीविषा के आगे कुछ भी नहीं है। पुराने जमाने के लोगों ने जिन पारिवारिक, भौगोलिक, आर्थिक विषमताओं, अभावों और समस्याओं में झूझते रहकर जो कुछ किया है, उसकी कल्पना आज के युवा नहीं कर सकते। इन युवाओं का भी दोष नहीं है। पुरानी और नई पीढ़ी के बीच वाली पीढ़ी में खूब सारे लोग ऎसे नुगरे, निरंकुश और स्वेच्छाचारी निकल गए हैं जिन्हें लगता है कि स्वाधीनता का अर्थ यही है कि काम-धाम कुछ न करना पड़े, बंधी-बंधायी मिलती रहे, एक्स्ट्रा के लिए जुगाड़ में रमे रहकर पैसा बनाओ और अपने घर भरते रहो।

इन लोगों में ही काफी फीसदी ऎसे हैं जो आदतन मुफ्तखोर माँसाहारी, शराबी, व्यसनी, दैहिक आनंद के रसिया और शरीर को ही सर्वस्व मानकर सम्पूर्ण भोगों में लिप्त रहकर टाईमपास करते हुए जी रहे हैं। इन्हें अपनी संस्थाओं, संस्थानों, समाज, क्षेत्र और देश से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा। और इन सारी भोग सामग्री को मुफ्त में पाने के लिए ये जिस तरह की हरकतें करते रहे हैं, इस बारे में सभी को पता है। भय, प्रलोभन, झाँसे, काम निकलवाने की शर्तों आदि कई प्रकार की चाशनिया बातों में उलझाते हुए सब कुछ मुफ्त में, हराम का पाने-पीने के आदी इन लोगों को किसी से कोई भय नहीं रहा क्योंकि अब इन्हीं जैसे लोगों का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है।

ऎसे लोग जिन घर-परिवार और संस्थानों में होते हैं उनका बंटाढार अपने आप हो ही जाता है क्योंकि दुव्र्यसनी इंसानों के अंग-प्रत्यंग शिथिल रहा करते हैं और एक समय बाद उस जीवात्मा को अपना सम्बल देना बंद कर देते हैं क्योंकि भीतर से कुलबुलाई हुई आत्मा इन कुकर्मियों के पापी शरीर को छोड़कर बाहर निकलना चाहती है।

हैरत की बात ये है कि ऎसे लोग धर्म के नाम पर होने वाले आयोजनों में ऎसी श्रद्धा दिखाते हैं जैसे कि इनके मुकाबले का कोई धार्मिक और कोई हो ही नहीें। धर्म और देश का भी यह दुर्भाग्य है कि बाबा, महंत, महामण्डलेश्वर और धर्म के नाम पर धंधे चलाने वाले लोग भी इन शोषकों, व्यभिचारियों और नशेड़ियों के साथ संबंध रखते हुए इनके पैसों से धार्मिक आयोजन कराने में रुचि लेते हैं।

जिस धार्मिक आयोजन में ऎसी अलक्ष्मी लगी हो, ऎसे दुराचारी और कर्महीन लोग जुड़े हों, उस आयोजन को कैसे धार्मिक कह सकते हैं। लानत है हमारे इन लालची, लोभी और धूर्त-मक्कार साधु-संतों, महंतों और बाबाओं को, और उनकी अनुचरी करने वाले अनुयायियों को भी। पता नहीं धर्म कहाँ जा रहा है। जिस धर्म में दुराचारियों, भ्रष्टाचारियों, शराबी व माँसाहारियों, शोषकों, अमानवीय लोगों का पैसा लगा होता है वहाँ न कोई देवी-देवता आते हैं, न लोक देवता।

दुनिया भर में एक तरफ इन लोगों के भार से पृथ्वी दबी जा रही है वहीं दूसरी ओर समाज और संसार भी दुःखी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वाली इस संक्रामक और वर्णसंकरी कही जा सकने वाली मुफ्तखोर और आलसी पीढ़ी का सर्वाधिक नुकसान हमारी युवा पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है क्योंकि सब जगह न्यूनाधिक रूप में इस किस्म के नाकारा और कामटालू लोगों को देखकर नई पीढ़ी के लोग भी इनकी तरह आलसी हो जाते हैं और सोचते हैं कि जितना कम से कम करना पड़े, उतना अच्छा। हमारे से पहले वाले भी कौन का पूरा काम कर रहे हैं।

जबकि नई पीढ़ी के लोगों को सिखाने, कर्मयोग में दक्ष बनाने और अपनी संस्थान या संस्था के लिए ज्यादा से ज्यादा उपयोगी बनाने का काम इन पुराने लोगों का है, लेकिन जब वे ही ऎसे निकल जाएं तो फिर किससे उम्मीद रखें। यही कारण है कि आजकल नए लोग भी इन नाकारा, थकेहारे और आलसी-दरिद्री लोगों को अपना आदर्श मानने की दिशा में आगे बढ़ते जा रहे हैं। इससे न केवल संस्थान का नुकसान होता है बल्कि समाज, मातृभूमि और कर्मभूमि तथा समूचे देश के साथ कुठाराघात हो रहा है।

ऎसे निराशाजनक और दुर्भाग्यपूर्ण हालातों के बावजूद नई पीढ़ी अपने हुनर और शिक्षा-दीक्षा तथा अनुभवों के आधार पर बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके लिए कर्म के प्रति निष्ठा रखने वाले ये युवा धन्यवाद के पात्र हैं। साथ ही वे पुराने लोग भी, जो कि सम सामयिक अनाचारों और व्यसनों से दूर रहकर काम को ही पूजा मानकर अब तक अपने श्रेष्ठ और समर्पित कर्मयोग के बूते अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हुए इस बात को सिद्ध कर रहे हैं कि पुराने घी में बहुत कुछ दम रहा है और रहेगा।

जीवन में जहां कहीं रहें, अपने कर्मयोग को श्रेष्ठतम और पवित्र बनाए रखते हुए पहचान कायम करें। अपनी मेहनत से अर्जन करें। जो कुछ नहीं करना चाहते, उन्हें कुछ करना भी नहीं है मरने के सिवा। चाहे आत्मघात से मरें, गंभीर बीमारियों से मरें, कुत्तों की तरह कुचले जाकर मरें या फिर किसी और के हाथों। अपने पर ध्यान दें।