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साहित्य
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यक्ष प्रश्न - सवालों के कटघरे में है गौवंश तस्करी और गौरक्षकों पर दमन

Deepak Acharya
Deepak Acharya
April 16, 2025

छद्म राष्ट्रवाद और दिखावटी गौभक्ति का खुला ताण्डव

भगवा सरकारों का निकम्मापन उजागर

पिछले कुछ दिनों से गौवंश की तस्करी और उसकी रोक में जुटे साहसी गौरक्षकों पर दमन की खबरों से माहौल गर्माता जा रहा है।

यों देखा जाए तो गौवंश की तस्करी हमारे यहां कोई नई बात नहीं है। कांग्रेस की सरकारों के समय गौवंश की तस्करी होने की बात को हर कोई स्वीकार कर सकता है क्योंकि कांग्रेस शुरू से ही गौवंश और सनातन की विरोधी पार्टी रही है, जिसकी असलियत अब सामने आ रही है लेकिन राष्ट्रवाद, सनातन और गौवंश रक्षा के नाम पर राजनीतिक गलियारों से होकर सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी की सरकारों के दौर में भी गौवंश की तस्करी होते रहना अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।

बात भजनलाल सरकार की ही नहीं है, अपने आपको परम भक्तिमती के रूप में प्रचारित कर धर्मान्धों के वोटों पर राजनीति करते हुए मुख्यमंत्री रही वसुन्धरा राजे के समय भी गौवंश की तस्करी खूब होती रही है।

किसी भी राज्य की सीमा से गौवंश भरे ट्रकों के गुजरते हुए दूसरे राज्य में पहुंचने पर रास्ते में दर्जनों पुलिस चौकियां, सरकारी नाके और चैकपोस्ट आते हैं जिन पर अधिकारी, कर्मचारी और चौकीदार दिन-रात तैनात रहते हैं।

ऐसे में इतने लम्बे रास्तों पर संचालित सरकारी अमले की चौकियों से होकर निर्बाध रूप से गौवंश से भरे ट्रकों का गुजर जाना किसी महान आश्चर्य से कम नहीं।

और दुर्भाग्य की बात ये कि केन्द्र और प्रदेशों में भी भाजपा की सरकार है। और ये सरकारें भी अपने राज्यों में गौवंश की तस्करी रोक नहीं पा रही हैं इसके पीछे या तो पूरी की पूरी सरकारी श्रृंखला की गौतस्करों से मिलीभगत और भारी भ्रष्टाचार को व्यक्त करती है अथवा सरकारों के निकम्मेपन को।

कारण चाहे जो रहे हों, यह तो सभी को स्वीकारना ही पड़ेगा कि गौभक्ति, सनातन और राष्ट्रवाद के नाम पर सत्ता का सुख भोग रहे लोग ही इसमें पूर्ण दोषी हैं अन्यथा किसकी मजाल कि गौवंश तस्करी करने का कोई साहस भी कर सके। इनके कितने नेता और कार्यकर्ता हैं, जो इस मामले में आगे आए हैं?

गौवंश की तस्करी होने की स्थिति में रास्तों के सरकारी अमले की मिलीभगत को उजागर करते हुए इन पर कार्यवाही करने से सरकारें क्यों कतराती रही हैं। इससे गौभक्तों के जेहन में कहीं न कहीं यह सवाल उठता भी रहा है कि कहीं ये सारे अन्दरखाने मिले हुए तो नहीं हैं।

बाहर जा रहे गौवंश को रोककर गौशालाओं में रखे जाने की स्थिति में सरकार को प्रति गौवंश पर्याप्त धनराशि तत्काल स्वीकृत कर गौशालाओं को देनी चाहिए ताकि गौवंश की देखभाल अच्छी तरह हो सके।

अकर्मण्य बने हुए प्रशासनिक अमले को भी दुरस्त करने की आवश्यकता है जिनकी उदासीनता से ये हालात सामने आते रहे हैं। वर्तमान सरकार के बारे में तो आमजन में यह धारणा घर करती जा रही है कि कहीं नहीं लगता कि सरकार चल रही है। लोग मानने लगे हैं कि यह टाईमपास सरकार ही है जैसे प्रदेश की केयर टेकर सरकार ही हो।

दुर्भाग्य यह कि गौभक्ति, सनातन रक्षा और राष्ट्रवाद का उद्घोष लगाने वालों के राज में गौभक्तों को गौवंश तस्करी रोकने और गौभक्तों पर दमन समाप्त करने के लिए धरना, प्रदर्शन और आन्दोलन करना पड़ रहा है, ज्ञापन देने पड़ रहे हैं।

इन हालातों में हम सभी को भी शर्म के मारे डूब मरने की आवश्यकता है जो उन लोगों के लिए वोट मांगते हैं, वोट देते हैं, कुर्सीनशीन करते हैं, सत्ता के भोग-विलासों भरे शहदिया स्वीमिंग पुल, स्पॉ और रिसोर्ट के उन्मुक्त स्वेच्छाचारी आनन्द का आस्वादन कराते हैं, इनमें गोते लगवाते हुए रंग-रूप और जिन्दगी निखारते हैं, जो गौवंश का संरक्षण तक कर पाने में बुरी तरह विफल साबित होते रहे हैं।

लगता है छद्म राष्ट्रवाद, नकली गौभक्ति और राजनैतिक चाशनी में डूबे तथाकथित सनातनियों को एक बार फिर गंभीरता से सोचने और नाकारा लोगों को बेनकाब करने में आगे आने की आवश्यकता है। असली गौभक्तों को लगता है कि उनके साथ छलावा हो रहा है।

जय गामाता - जय गोपाल