समाज को भयभीत कर रहा है धंधेबाजों का गोरखधंधा
कालसर्प का कोई अस्तित्व नहीं है और न इसकी कोई प्रामाणिकता। यह सिर्फ धंधेबाज लोगों का सुनियोजित गोरखधंधा है जिससे आम जनता को सावधान रहने की आवश्यकता है।
काल्पनिक है कालसर्प का भय
किसी भी व्यक्ति को कालसर्प जैसे काल्पनिक योग से भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही इसके लिए किसी प्रकार के शान्ति विधान के दुष्चक्र में फंसने की आवश्यकता है।
आज जब कोई जातक तथाकथित शास्त्र ज्ञान रहित ज्योतिषी के पास जाता है तब उसे कुण्डली की ग्रह स्थिति देखकर यह समझाया जाता है कि इस जातक के सूर्यादि सभी ग्रह राहु केतु के बीच आ गये हैं इसलिए अमुक प्रकार का कालसर्प योग है और फिर उसको अभावों, कष्टां, दुखो और व्याधियों की एक भारी भरकम सूची खोलकर भयभीत कर दिया जाता है और फिर चलता है। शान्ति विधान का दुष्चक्र।
जिन लोगों की कुण्डलियों में तथाकथित कालसर्प योग नहीं होता उनके जीवन में भी कष्ट, अभाव एवं परेशानी अथवा दुख आते हैं। ऐसे में इस प्रकार का शान्तिविधान करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी गांरटी नहीं दे सकता है कि शान्ति विधान के पश्चात् संबन्धित जातक के जीवन में सभी दुःख, कष्ट और अपराध दूर हो ही जाएंगे।
कालसर्प के नाम पर लोगों को गुमराह करने का यह गोरखधंधा पिछले पाँच-छह दशक से अधिक पुराना नहीं हैं। हमारे पुरखों और पुराने विद्वानों ने इससे पहले कभी किसी को कालसर्प के नाम से भयभीत नहीं किया। ज्योतिष में कहीं भी कालसर्प योग जैसा कोई उल्लेख नहीं है। महर्षि पाराशर, वराहमिहिर आदि किसी ने भी कालसर्प योग का कहीं उल्लेख नहीं किया है। कल्याण वर्मा ने भी नाभासादि बत्तीस योगों में सर्प योग का उल्लेख तो किया है, वह भी उस स्थिति में जब पहले चौथे या दसवें या सातवें भाव में सूर्य, मंगल, शनि जैसे ग्रहों और शुभ ग्रह केन्द्र के अलावा स्थान में हो, तब होता है। इस योग को बादरायण, गर्ग आदि ने भी मान्यता दी है।
कालसर्प का दोष दिखाकर ये सिद्ध ज्योतिषी क्या यह साबित करना चाहते हैं कि कुण्डली के दूसरे ग्रहों का कोई महत्त्व है ही नहीं। ज्योतिष के किसी मान्य प्राचीन ग्रन्थ में न तो कालसर्प योग का कोई उल्लेख है और न उससे जुडे़ बारह नागों का ही नाम है। ऐसे विद्वान जिन्हें भूगोल, खगोल या ज्योतिष शास्त्र का सम्यक् ज्ञान है वे सभी समवेत स्वर से इस मनगढंत योग को नकारते हुए कोई मान्यता नहीं देते।
मानव जीवन में जो सुख-दुःख आते हैं वे जन्मकालीन सूर्यादि ग्रहों की स्थिति के कारण आते हैं, न कि किसी कालसर्प योग के कारण। कुछ विश्वविख्यात हस्तियों की कुण्डलियों के अध्ययन का सार देखें तो हमें साफ पता चलेगा कि ऐसे तथाकथित योग वाले डॉ. एस. राधाकृष्ण, पं जवाहरलाल नेहरू, अब्राहम लिंकन, मार्गरेट थ्रेचर, श्रीराम शर्मा आचार्य, महाप्रभु वल्लभाचार्य, जमशेदजी टाटा, गुरु गोविन्द सिंह, ईसामसीह, धीरू भाई अंबानी आदि जैसे सैकड़ों लोग हैं जिन्होंने अपने लक्ष्यों में सफलता प्राप्त कर दुनिया की छाती पर राज किया।
स्वार्थी तत्त्वों का खेल है कालसर्प का हौव्वा
ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिसे भूगोल का सामान्य सा भी ज्ञान है वह इस तथ्य से भलीभांति परिचित है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और चन्द्र (जो पृथ्वी का उपग्रह है वह) पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इन दोनो के भ्रमण मार्ग जिन बिन्दुओं पर एक दूसरे को काटते हैं। इनमें ऊपर के बिन्दु को राहु और उसके सामने के बिन्दु को केतु का नाम दिया गया।
ये राहु और केतु कोई ग्रह नहीं है। सूर्य चन्द्रादि ग्रहों की तरह आकाश मे उनकी दृश्य स्थिति भी नहीं है। इन बिन्दुओं की उपयोगिता सूर्य चन्द्र के ग्रहण समय के निर्धारण भर के लिये है, जैसे अमावस्या की समाप्ति समय पर राहु या केतु से सूर्य का अन्तर 12 अंश से कम होता है तब सूर्य ग्रहण और जब पूनम की समाप्ति के समय राहु या केतु से चन्द्र का अन्तर 9 अंश से कम होता है तब चन्द्र ग्रहण होता है।
यह अन्तर कब-कब होता है उसकी जानकारी हेतु ही इन बिन्दुओं को भी अन्य ग्रहों के साथ पंचांग में स्थान दिया गया लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने जिन्हें भूगोल का या खगोल अथवा शास्त्रों का ज्ञान नहीं है, उन्होंने 12 नागों के नाम - अनंत, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पदम, महापदम, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, घातक विद्याधर और शेषनाग पर से 12 जन्म लग्न वालों के लिए अलग-अलग कालसर्प योगां के हौव्वे खड़े कर रखे हैं और उनके कारण दुःखां और अभावों की अलग-अलग सूचियां बना डाली हैं जिनका उपयोग स्वार्थपूर्ति के लिए आजकल धडल्ले से हो रहा है।
दैव उपासना करें, पुण्य बटोरें, अपने आप होगा ग्रह बाधा निवारण
कालसर्प का कोई अस्तित्व नहीं है और इस तरह के भ्रमों से व्यक्ति को दूर रहना चाहिए। जीवन में दुःखों के निवारण तथा सफलता पाने के लिए ग्रहों पर नियंत्रण करने के लिए नित्य दैव उपासना और पुण्य संचय का कार्य होना चाहिए।
जैसे-जैसे दैवीय ऊर्जा का प्रवाह बढ़ेगा, इससे ग्रहों का प्रभाव अपने आप समाप्त होता चला जाएगा। पंचदेव उपासना, शिवार्चन, विष्णु सहस्रनाम पाठ, सात्त्विक जीवनचर्या, सदाचार और ईश्वर में अगाध श्रृद्धा-भक्ति का भाव हो तो कोई दोष प्रभावी नहीं रहता। इसके लिए अपने ईष्टदेव का निरन्तर नाम स्मरण करते रहें। वंश और कुल परम्परा तथा वर्णाश्रम के विधान के अनुरूप नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मों का परिपालन करें।
काल सर्प की शांति के बाद भी कहाँ कम होती हैं समस्याएं
आप अपने आस-पास देखें कि जिन लोगों को कालसर्प से ग्रसित बताया गया है और जिन्होंने इसकी शांति करा ली है, उन्होंने क्या वाकई अपनी समस्याओं से जादूई शांति प्राप्त कर ली है। आजकल ऐसे पण्डितों की बहार आ गई है जो कालसर्प के नाम पर डराने के धंधे में लिप्त होकर यजमानों को चूसने में लगे हुए हैं।
आज ईमानदारी से सर्वे किया जाए तो काल सर्प दोष शान्ति कराने वाले, और कई-कई बार इनके अनुष्ठान करा डालने वाले लोग हमारे सम्पर्क में आते हैं जो यह कहते हैं कि कोई फर्क नहीं पड़ा, जैसा चल रहा था, वैसा ही चल रहा है। कई लोग तो हजारों-लाखों रुपए काल सर्प दोष निवारण के लिए बर्बाद कर चुके हैं फिर भी जीवन में समस्याएं और अभाव कम नहीं हो पा रहे।
जगह-जगह पण्डितों के समूह बने हुए हैं जिनके लिए कालसर्प दोष की शांति कराकर जातक को ग्रह बाधाओं से मुक्ति दिलाने का लाइसेंस मिला हुआ है। कोई भी अमावास्या देख लीजिये, त्रिवेणी संगम, नदियों, मन्दिरों में कालसर्प के मारे लोगों का ज्योतिषीय उपचार होते देखा जा सकता है। कालसर्प और साँप दोनों ऐसे हैं जिनसे हर आदमी भय खाता है। इसी का फायदा उठा कर यह नया धंधा चल निकला हैं
यह बात तो साफ मानने में आएगी ही कि तीस-चालीस साल पहले आज के ज्योतिषियों के मुकाबले काफी सिद्ध ज्योतिर्विद और त्रिकालज्ञ रहे हैं लेकिन उन्होंने कभी किसी को कालसर्प का दोष नहीं बताया। फिर अब अचानक कालसर्प की इतनी अजगरी बाढ़ कहां से आ गई है?
ज्योतिष और तंत्र-मंत्र दोनों में कमाई का ग्राफ बढ़ाना है तो लोगों को डराओ और शोषण करते चले जाओ। आज के पण्डितों में इतना दम कहाँ रह गया है कि किसी के ग्रहों का अनिष्ट समाप्त कर दें। वे पण्डित और थे जो नीति-नियमों से चलते थे और ईश्वरीय साधना में रमे रहते हुए इतना सामर्थ्य प्राप्त कर लेते थे कि ग्रहों या दुःखों का शमन उनके कहने मात्र से हो जाता था।
आजकल के पण्डितों में बहुत बड़ी संख्या उनकी है जो न नित्य संध्या करते हैं, न गायत्री जप। मामूली कर्मकाण्ड, रूद्री और दुर्गापाठ सीख जाने वाले अपने आपको पण्डित मानकर बड़े-बड़े अनुष्ठान और पूजा-पाठ करा रहे हैं।
जबकि इनमें से कितने लोगों ने योग्य गुरुओं से ज्ञान पाया है, दीक्षा ली है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि इन पण्डितों में द्रुत उच्चारण, उच्चारण दोष हावी है और इस कारण से न स्तोत्रों का प्रभाव दिख रहा है, न मंत्रों का। फिर तम्बाकू और गुटके ने इनकी वाक्शक्ति को इतना अधिक प्रदूषित कर दिया है कि मुख से स्पष्ट उच्चारण तक नहीं कर पाते, न सही-सही उच्चारण का अभ्यास है।
कर्मकाण्ड और पूजा-उपासना, यज्ञ यागादि में काले, नीले कपड़े, बैग, आसन इत्यादि वर्जित हैं लेकिन इन्हीं रंगों की भरमार धार्मिक कार्यक्रमों में दिखती है। यज्ञकर्म में धोती-पीताम्बरा और उत्तरीय वस्त्र के अलावा शरीर पर और कोई कपड़ा नहीं होना चाहिए लेकिन आजकल यज्ञ कराने और करने वालों को इसमें शर्म महसूस होती है और इस कारण शर्ट, टीशर्ट और कुर्ता पहनकर यज्ञ करते दिखाई देते हैं।
इसलिये काल सर्प के हौव्वे से बचें, उन ज्योतिषयों से भी बचें जो डराते हुए धंधा करते हैं। ईश्वर का सतत् स्मरण बनाए रखें, भगवान के प्रति श्रृद्धा और आस्स्था बनाए रखें। अपने जीवन के लक्ष्य को जानें। यह मनुष्य जन्म कर्मप्रधान है जिसके माध्यम से अच्छे कार्य, भगवद् भक्ति और अनन्य भाव से प्रभु स्मरण करते हुए भगवान का सायुज्य, सान्निध्य और मोक्ष प्राप्त करने की दिशा को आत्मसात करें।
जीवन के सुख-दुःख तो प्रारब्ध के कारण आते-जाते रहेंगे। जहां भगवान की कृपा हो वहां संतोष और आनन्द ही बरसता है। भगवान का भजन हो वहां काहे का काल सर्प। समाज में आजकल इतने बड़े-बडे़ अजगर हैं कि राहु-केतु और कालसर्प को भी मात कर गए हैं।इस बारे में गायत्री मण्डल की ओर से वनेश्वर महादेव मन्दिर परिसर में आयोजित ज्योतिष, पौरोहित्य एवं कर्मकाण्ड शिविर में कई वर्ष पूर्व 5 जून को ज्योतिष संगोष्ठी में जाने-माने ज्योतिर्विद एवं ज्योतिष शोध संकाय उदयपुर के तत्कालीन निदेशक श्री रमेशचन्द्र पण्ड्या ने विस्तार से विवेचन करते हुए कालसर्प को हौव्वा बताया था और इससे संबंधित कई प्रमाणों से सिद्ध भी किया था।
(उन सभी सिद्ध लोगों से विनम्रतापूर्वक क्षमायाचना सहित जिनके लिए धर्म कमाई का धन्धा है और जो कालसर्प पूजा के महारथी, कर्मकाण्डी और यजमानों के तारणहार हैं, जिनका भगवान से सीधा कान्टेक्ट है और इससे किसी भी व्यक्ति के प्रारब्ध को नष्ट कर धन-वैभव, अपार भोग-विलास का वरदान दिलाने में सक्षम हैं। )

