दुष्टों का संहार ईश्वरीय कार्य है, भगवान इसी से प्रसन्न होते हैं

जीवन में बार-बार संघर्ष आना और किसी न किसी रूप में लगातार बने रहना इस बात का संकेत है कि भगवान जूझारू एवं जांबाज सज्जनों के माध्यम से आसुरी उपद्रवों में रमे रहकर धरती का माहौल बिगाड़ने वाली राक्षसी शक्तियों को ठिकाने लगाना चाहता है।
झूठन-खुरचन एवं सडान्ध तलाशने वाले चटोरे पिद्दे-पिद्दे कुकुरमुत्तों, लुच्चे-टुच्चे लफंगों, औरों के टुकड़ों पर पलने वाले चाटुकार परजीवियों-पराश्रितों के भार को कम करने तथा इनका पक्का ईलाज करने हर बार वह नहीं आ सकता है इसलिए धर्म चेता खुद्दार लोगों के माध्यम से इस तरह के ईश्वरीय कार्य कराने को प्रेरित करता हुआ इस तरह की विषम स्थितियों को पैदा कर देता है। इस पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिनका संहार या शमन लिखा होता है, उन्हें जाने-अनजाने आकस्मिक या सायास ढंग से हमसे भिड़ा देता है ताकि निर्णायक समाधान हो जाए।
अपने जीवन का सर्वोपरि ध्येय यही होना चाहिए कि सज्जनों को दुःख न पहुंचे, और दुर्जन-दुष्ट अपनी क्रूरतम, हिंसक एवं निर्मम दृष्टि से बच नहीं पाएं। यही आज का सम सामयिक धर्म, कर्म और फर्ज है जिसे अच्छी तरह पूरा करते हुए ईश्वर को प्रसन्न किया जा सकता है। भगवान को भी हमसे इसी भक्ति की अपेक्षा है।
सर्वाधिक दुःख तब होता है जब अपने आस-पास के और अपने कहे जाने वाले लोग विभिन्न अंग-प्रत्यंगों में गुदगुदी और रस तलाशने वाले दैहिक भोग-विलास और क्षणिक आनंद, हराम के पैसों और प्रतिष्ठा पाने के लिए भाजी के भाव बिक जाते हैं और पकौड़ों की तरह तरह तेल में उछलकूद करने को ही जिन्दगी का चरम लक्ष्य समझ बैठते हैं। ये ही वे लोग हैं जो अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए किसी के भी कदमों में षोडशांग ढंग से दण्डवत-लम्बवत करते हुए पूरी बेशर्मी के साथ पसर जाने में गर्व और गौरव का अनुभव करते हैं।
इन लोगों में तथाकथित राष्ट्रवादी भी हैं और राष्ट्रवाद के नाम पर मौज उड़ाने वाले आधुनिक समाजसेवी भी हैं। यही वादी लोग वादी(आग) लगाते हैं, भड़काते हैं और मौका ताड़कर अवसरवादी परिवादी भी हो जाते हैं। जब तक मन-कर्म और वचन में शुचिता नहीं आएगी, तब तक ऎसे लोग हर बाड़े को कलंकित ही करते रहेंगे।
