संस्मरणात्मक आत्म कथ्य - बात निकली है तो दूर तलक जाएगी

यह बात है 02 सितम्बर 2002 की। इस दिन राजस्थान-गुजरात सरहद पर अवस्थित मानगढ़ धाम पर बनाए गए शहीद स्मारक का लोकार्पण राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने किया।
मेरी पोस्टिंग उन दिनों डूंगरपुर में जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी के पद पर थी लेकिन मुख्यमंत्री की मानगढ़ यात्रा के कवरेज के लिए मानगढ़ धाम पर स्पेशल ड्यूटी लगाई गई थी। इसलिए वहीं था। लोकार्पण की जल्दबाजी का पता किया तो वहां जमा अफसरों और नेताओं ने बताया कि विधानसभा चुनावों की आचार संहिता उसी दिन लगने ही वाली थी। इसलिए श्रेय पाने की हौड़ और दौड़ के चलते आनन-फानन में लोकार्पण का कार्यक्रम होना ही था।
अभी स्मारक बनकर तैयार हुआ ही था। कुछ देर पहले बारिश भी हो चुकी थी और मौसम एकदम ठण्ढा हो गया। स्मारक के पास ही हैलीपेड बनाया गया था। करीब-करीब शाम हो ही गई थी। मुख्यमंत्री आए और स्मारक का लोकार्पण किया, इसके बाद वह सब कुछ हुआ जो आम तौर पर नेताओं के आने के बाद होता ही है यानि की दर्शन, भाषण-चाटन आदि-आदि।
बरसात और पानी के कारण स्मारक के आस-पास और पूरी पहाड़ी पर मिट्टी नम हो चुकी थी। शाम ढलते ही मानगढ़ पहाड़ी का पूरा नजा़रा ही बदल गया।
मुख्यमंत्री की यात्रा और पहाड़ी पर विशाल आयोजन के चलते जगह-जगह लगाई गई तेज फ्लड़/हैलोजन लाइटों की जबर्दस्त चकाचौंध के चलते पतंगों का पूरा संसार पसर गया। हजारों-लाखों फडके (कीट-पतंगे) पहाड़ी पर ओलों की तरह टूट पड़े और काफी देर तक यही माहौल बना रहा। जो लोग जमा हुए थे वे सारे ही इन फडकों से परेशान हुए बिना नहीं रह सके।
स्मारक के जल्दबाजी के लोकार्पण के बाद आचार संहिता लग गई और फिर शेष कार्य सरकारी गति से चलते रहे।
