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साहित्य
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स्थायी यज्ञ कुण्ड और मण्डप का निर्माण शास्त्र विरूद्ध

Deepak Acharya
Deepak Acharya
December 25, 2021

समाज और राष्ट्र पर आपदा के लिए दोषपूर्ण यज्ञ विधियां जिम्मेदार

हाल के कुछ वर्षों में धर्मस्थलों पर यज्ञ कुण्ड और मण्डपों के नाम पर स्थायी ढांचों का निर्माण किया जा रहा है जो कि पूरी तरह धर्म विरूद्ध है तथा शास्त्र इस प्रकार के यज्ञ कुण्डों एवं मण्डपों को मान्यता नहीं देता। लेकिन धर्म, यज्ञ विधियों एवं शास्त्रों के जानकारों की उदासीनता तथा तटस्थ रहने की मनोवृत्ति के कारण इनका प्रचलन बढ़ता जा रहा है।

मन्दिरों, मठों, आश्रमों और दैव स्थानकों पर स्थायी व पक्का यज्ञ कुण्ड और मण्डप बनाना शास्त्र विरूद्ध है और इस प्रकार के यज्ञ मण्डपों से मन्दिर, मठ, आश्रम आदि दैव भूमि दूषित होने के साथ ही यज्ञ मण्डप का उपयोग करने वालों और इसे बनाने वालों को अनिष्टों का सामना करना पड़ता है। राष्ट्र में समय-समय पर आ रही आपदाओं के लिए इस तरह के धर्मविरूद्ध यज्ञ कुण्ड एवं मण्डप भी किसी न किसी रूप में जिम्मेदार हैं।

मन्दिर निर्माण और मन्दिर वास्तु से संबंधित प्राचीन प्रामाणिक धर्म ग्रंथों मण्डप कुण्ड सिद्धि, कुण्ड रत्नावली, सिद्धान्तशेखर, शारदा तिलक, कुण्डकारिका, कुण्डार्क, कुण्डसिद्धि इत्यादि को सामने रखकर चिन्तन किया जाए तो नियम यह है कि यज्ञ करने के लिए यज्ञ मण्डप कत्र्ता यजमान के हाथ से नाप करके मण्डप बनाया जाता है। और प्रत्येक यज्ञकर्ता यजमान या भक्त का कद पृथक होता है। ऎसे में यह यज्ञकर्ता द्वारा निर्मित यज्ञ कुण्ड एवं मण्डप का दूसरे यज्ञकर्ता के लिए उपयोग नहीं हो सकता क्योंकि सभी यज्ञकर्ताओं की लम्बाई अलग-अलग होती है।

नाप की विध

शास्त्र प्रमाण है - ‘कर्तुशरांश प्रपदोछ्रितस्य योवासहस्तः।’’ इसके अनुसार जो यजमान यज्ञ करता है उसके नाप के अनुसार अलग-अलग कुण्ड व मण्डप बनते हैं। इसके अनुसार यज्ञकर्ता यजमान को दीवार के सहारे एक पैर ऊँचा करके पैरों पर खड़ा किया जाता है और एक हाथ ऊँचा करके मध्यमा अंगुली तक नाप लिया जाता है। इस लम्बाई का पाँचवा हिस्सा एक हाथ प्रमाण माना जाता है। इसी प्रमाण के अनुसार मण्डप-कुण्ड बनते हैं। इस लम्बाई का चौबीसवां हिस्सा अंगुल माना जाता है। इस शास्त्रीय प्रमाण के अनुसार हर प्रधान यजमान की लम्बाई अलग-अलग होने से प्रत्येक यजमान के लिए उसकी ऊँचाई के प्रमाणानुसार पृथक-पृथक यज्ञ कुण्ड व मण्डप बनता है।

स्थायी मण्डप बनाना गलत

शास्त्रों के अनुसार यजमान के नाप के अनुसार अस्थायी यज्ञ मण्डप काष्ठ का बनाया जा सकता है। इसे देखते हुए स्थायी यज्ञ मण्डप का विधान किसी शास्त्र में है ही नहींं। एक यजमान के नाप के अनुसार बने कुण्ड और मण्डप का दूसरा व्यक्ति उपयोग नहीं कर सकता है। एक संकल्पकत्र्ता प्रधान यजमान के नाप के अनुसार बने कुण्ड व मण्डप में ही दूसरे यजमान या ब्राह्मण द्वारा यज्ञ किए जाने से यज्ञ का कोई फल प्राप्त नहीं होता है बल्कि अनिष्ट की आशंकाएं बनी रहती हैं।

प्रमाण विरूद्ध यज्ञ कुण्डों और मण्डपों में यज्ञ-यागादि कराने वाले आचार्य, पण्डितों और निर्माण करने वालों का परिवार अभिशप्त एवं दरिद्री हो जाता है और यज्ञ देव से ये शापित हो जाते हैं। इसके अलावा जिन मन्दिरों के आगे स्थायी यज्ञ मण्डप बनते हैं उनका दैवत्व क्षीण हो जाता है।

इसीलिए सीमेंटेड़ यज्ञ कुण्ड और सीमेंट-पत्थरों से बने मण्डप की बजाय स्थन्दिल(गोबर-मिट्टी, कच्ची ईंटों से बना अस्थायी कुण्ड) ज्यादा प्रचलित रहे हैं। प्राचीन परम्पराओं और राजा-महाराजाओं के समय भी स्थायी यज्ञ कुण्ड व यज्ञ मण्डप का कोई विधान नहीं था बल्कि पुरातन काल में यज्ञयागादि के लिए प्रधान यजमान के नाप के हिसाब से यज्ञ कुण्ड व काष्ठ के अस्थायी मण्डप का विधान रहा है।

धर्म के नाम पर मन्दिरों में नए-नए निर्माण पर पाबन्दी लगनी चाहिए क्याेंकि ये सारे निर्माण धर्मविरोधी हैं और पाखण्ड के सिवा कुछ नहीं हैं। यज्ञविधियों का शास्त्रसम्मत प्रयोग नहीं होने की वजह से ही समाज में अनाचार, आतंक और त्रासदियां बढ़ रहीं हैं और धार्मिक गतिविधियों का लाभ मिलने की बजाय समाज को हानि उठानी पड़ रही है।

जब नहीं हुआ महारावल पृथ्वीसिंह के बनाए यज्ञ मण्डप में हवन

बांसवाड़ा शहर के दक्षिण कालिका मन्दिर में बांसवाड़ा रियासत के महारावल पृथ्वीसिंह द्वारा किए गए यज्ञ में भी लकड़ी का अस्थायी मण्डप बनाया गया। इसी स्थल पर कुछ वर्ष बाद उज्जैन के एक सेठ द्वारा दक्षिण कालिका मन्दिर में यज्ञ कराया गया लेकिन उन्होंने मन्दिर परिसर में पूर्व से निर्मित यज्ञ कुण्ड का उपयोग नहीं किया और अपने यज्ञ के लिए पृथक से यज्ञ कुण्ड बनाकर होम किया।

उन दिनों इस यज्ञ का आचार्यत्व करने आए देश के मशहूर वेदाचार्य पं. बसन्तीलाल शुक्ल ने पृथ्वीसिंह द्वारा बनाए गए यज्ञ कुण्ड व मण्डप में यज्ञ करने को शास्त्रविरूद्ध बताया। इस पर बांसवाड़ा के पण्डितों से शास्त्रार्थ हुआ लेकिन वे उज्जैन के वेदाचार्य के शास्त्र प्रमाणों के आधार पर दिए गए अकाट्य और धर्म सम्मत तर्क से हार गए।

उज्जैन से आए वेदाचार्य ने पहले से बने यज्ञ कुण्ड व काष्ठ मण्डप में हवन कराने की बजाय अलग से कुण्ड बनाकर हवन कराया। उसी समय यह बात स्पष्ट हो गई थी कि एक व्यक्ति के लिए बने कुण्ड व मण्डप में दूसरा व्यक्ति हवन नहीं कर सकता है।

त्रिपुरा सुन्दरी का यज्ञ मण्डप भी अनुचित

इसी प्रकार त्रिपुरा सुन्दरी मन्दिर परिसर के सम्मुख बने मण्डप को भी शास्त्रविरूद्ध बताया गया था। इस बारे में धर्माधिकारी ब्रह्मर्षि स्व. पं. महादेव शुक्ल ने इस विषय पर चर्चा के दौरान बताया था कि कुछ दशक पहले इस पर विवाद हुआ था और एक सिद्ध संत ने इसे तोड़ने की राय दी थी।

तब बांसवाड़ा के ब्रह्मर्षि स्व. पं. महादेव शुक्ल व सामवेदी स्व. पं. भजामीशंकर नागर ने भी सिद्ध संत की राय को सही ठहराते हुए कहा था कि यह स्थायी यज्ञ मण्डप नहीं होना चाहिए। बाद में इसे सिर्फ छाया के लिए प्रयोग में लाने की बात कह कर तोड़ने का विचार त्याग दिया गया। लेकिन इस स्थल पर जब पूर्व मुख्यमंत्री स्व. हरिदेव जोशी ने सहस्रचण्डी महायज्ञ कराया तब इस पुराने यज्ञ कुण्ड में हवन नहीं कर उनके नाप के अनुसार पृथक से यज्ञ कुण्ड बनाया गया जहां स्व. जोशी ने पूर्णाहुति दी।

इस सहस्रचण्डी यज्ञ का आचार्यत्व ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल ने ही किया था। इसमें विश्वविजय पंचांग के निर्माता और अखिल भारतीय ज्योतिष परिषद के अध्यक्ष तथा विश्वविख्यात ज्योतिर्विद पं. हरदेव शर्मा त्रिवेदी सहित कर्मकाण्ड, पाण्डित्य और ज्योतिष एवं वास्तु जगत से दो सौ से अधिक विद्वान साधक सम्मिलित थे। बाद में भी जब-जब स्व. हरिदेव जोशी ने यज्ञ कराए, हर बार उनके नाप के अनुसार अस्थायी कुण्ड बनाए गए और स्व. हरिदेव जोशी ने उन्हीं में यज्ञ किया।

धर्म शास्त्र के अनुसार तथ्य यह है कि मन्दिरों, मठों, आश्रमों आदि में जहां-जहां पक्के यज्ञ कुण्ड एवं यज्ञ मण्डप बने हुए हैं, वे सारे यज्ञ विधान के विरूद्ध हैं और इस प्रकार के कुण्ड एवं मण्डप निर्माण से धर्मावलम्बियों को बचना चाहिए।