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साहित्य
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लाज रखें अपने पुरखों की

Deepak Acharya
Deepak Acharya
September 14, 2021

जो लोग धरा पर जन्म लेने और जीने के उद्देश्यों को जानते हैं, मानव जीवन के चरम लक्ष्य को समझते हैं, वे अच्छे इंसान के रूप में रहने, दिखने-दिखाने और जीने का प्रयास करते हैं। यही वे लोग हैं जो ‘जिओ और जीने दो’ में विश्वास रखते हुए स्व कल्याण भी करते हैं और जगत का भी।

इन लोगों के कारण से ही पृथ्वी टिकी हुई है अन्यथा जैसा विषमता भरा माहौल और मानवीय विकृतियों का जोर दिख रहा है उससे तो यही आभास होता है कि इंसान खोने लगा है और उसका स्थान ले लिया है दुकानों ने। कुछ फीसदी को छोड़ दिया जाए तो शेष सारे ही हर क्षण नफा-नुकसान की गणित में डूबे नज़र आते हैं।

धन का नशा इतना अधिक जोर दिखा रहा है कि कोई अपने आपे में रहा ही नहीं। जो जैसा है उससे कई गुना अधिक दिखना-दिखाना और पाना चाहता है। लघुता में प्रभुता की बातें अब निरर्थक होती जा रही हैं। अब केवल धनबल और बाहुबल से लेकर संख्या बल पर ही अधिक भरोसा जताया जा रहा है चाहे वह अलक्ष्मी का बल हो या फिर नाकाराओं और शोषकों का संख्या बल।

जहां कहीं गुणात्मकता और सर्वश्रेष्ठता से अधिक महत्त्व भीड़ और संख्या बल का होता है वहाँ कई प्रकार की विकृतियां और दुष्प्रभाव समाज, क्षेत्र और देश पर दिखाई देने लगते हैं। यह स्थिति ठीक उस बाढ़ की तरह है जो कि महानदियों में अक्सर उफान लाकर तटों से लेकर जलग्रहण एवं जलभराव क्षेत्रों तक को तबाह कर डालती है।

सिद्धान्तों और विचारधाराओं का जमाना लद गया, उसका स्थान ले लिया है कि धन, धार और धमाल ने। पूरी दुनिया इस विषय पर चिन्तित है। आज की पीढ़ी को आलस्य, प्रमाद और छीनाझपटी से ऎश्वर्य पाने की मनोवृत्ति ने ऎसा घेर लिया है कि उसके आगे न कोई शुचिता रही है, न परिश्रम और पुरुषार्थ के कोई मायने। चाहे जिस तरह भी हो सके, हमारे जेब और घर उत्तरोत्तर भरते रहें और हम दूसरे लोगों की नज़रों में वैभवशाली, लोकप्रिय और महान बने रहें।

आजकल श्रद्धा और स्नेह के भी कोई मायने नहीं रहे। यह जरूरी नहीं कि जो बड़ा है उसके प्रति सभी की श्रद्धा हो ही, अनुकरण करने वाले हों ही। बड़ा कोई भी हो सकता है लेकिन वह बढ़िया हो ही, यही जरूरी नहीं। हमने बहुत बड़े-बड़े देखें हैं जो केवल नाम के बड़े हैं, और बड़े भी बन गए हैं तो किसी और बड़े की कृपा, दया, करुणा या सर्वस्व समर्पित भाव से षोडशांग सेवा से।

अब केवल तुच्छ स्वार्थ और काम बनने-बिगड़ने या बिगाड़ने में जो जितना अधिक सहयोगी भूमिका अदा कर सकता है, उसी के प्रति निकटता बनाए रखना दोनों पक्षों की मजबूरी है। उन्हें भीड़ चाहिए, और दासत्व से संक्रमित भीड़ को संरक्षण प्रदान करने वाला नायक। समाज-जीवन के हर क्षेत्र में इसी तरह की भीड़भाड़ दिखने को मिल रही है।

असल में अब कोई किसी का रहा ही नहीं, देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार लोग उसी तरह ढल जाते हैं जैसे कि टकसाल में सिक्के। काम होते रहें, संरक्षण मिलता रहे, स्वार्थ पूर्ति होती रहे, तभी तक कोई इंसान अच्छा रहता है, फिर काम निकल जाने के बाद कोई किसी का नहीं।

यही वजह है कि अब किसी पर आँखें मूँद कर भरोसा नहीं किया जा सकता। किस समय कौन कब फिसल जाए, यह कयास भी कोई नहीं लगा सकता। अब आदमी के सामने जिन्दगी भर के लिए इतनी सारी मखमली रपटें और लुभावनी फिसलपट्टियाँ हो गई हैं कि उसे फिसलाना, फुसलाना और फिसड्डी बनाना सबसे आसान होकर रह गया है।

हम सभी लोग वर्तमान हालातों के लिए एक-दूसरे को दोष देकर पल्ला झाड़ने के आदी हो गए हैं अथवा यह कहकर उदासीनता ओढ़ लिया करते हैं कि जमाना खराब है, समय ठीक नहीं। लेकिन ऎसा कहते समय हम चालाक लोमड़ और लोमड़ियां अपने आपको जमाने से पृथक होकर देखते हैं। हम कभी यह नहीं सोचते कि जमाने की खराबी में हमारा भी अहम् योगदान है क्योंकि हम भी इसी जमाने का हिस्सा है।

अप्रिय या विषमतापूर्ण समय की बातें करते वक्त हमें यह सोचना चाहिए कि हमारे बाप-दादा और पुरखे कैसे थे और हम कैसे हैं। हमारी पुरानी पीढ़ियों ने धर्म, सत्य और नैतिक मूल्यों के साथ जिस प्रकार पवित्र जीवनयापन किया, कठोर परिश्रम और पुरुषार्थ से जीवन यात्रा को पूर्ण किया और समाज तथा देश के लिए त्याग किया, वैसा हम कर पा रहे हैं क्या?

जिनके बाप-दादा भी नकारात्मक और विध्वंसकारी स्वभाव के रहे हों, उनकी संतति यदि आसुरी कर्मों में रमी हुई दिखे, तो अलग बात है लेकिन इनका प्रतिशत नगण्य ही है। लेकिन जिनके पूर्वज शौर्य-पराक्रम, संस्कार और शुचिता के साथ धर्म-कर्म और जगत व्यवहार में उल्लेखनीय काम कर गए, समाज और क्षेत्र में नाम कमा गए, उनके वंशज यदि अमानवीय, संवेदनहीन और बुरे काम करने वाले कुकर्मी निकल जाएं, तो गंभीरतापूर्वक सोचने और इसके कारणों की तलाश करने की आवश्यकता है।

खूब सारे लोगों के बारे में कहा जाता है कि इनके बाप-दादा सज्जन और कर्मयोगी थे और ये...। इसके पीछे छिपे कारणों को तलाशा जाए तो कई सारे गोपनीय रहस्य सामने आएंगे। हम इसमें जाना नहीं चाहते क्योंकि इनके परिवारों के बारे में जानकारी रखने वाले बड़े-बुजुर्ग और आस-पास के लोग अच्छी तरह जानते हैं। पर हम सभी को अपने पूर्वजों को केन्द्र में रखकर उनका पावन स्मरण करते हुए यह आत्मचिन्तन करना होगा कि वे कितने उन्नत और पराक्रमी एवं लोकमान्य थे, और हम।

इस पराभव के पीछे कौनसे कारण रहे हैं। इसमें हमारी दुर्बलताएं, व्यसनी स्वभाव और खुदगर्जी किस हद तक जिम्मेदार है। कोई सा कुल और वंश परंपरा हो, पूर्वजों के मुकाबले वंशजों की कीर्ति और लोक मान्यता का ग्राफ जिन परिवारों में बढ़ता रहता है, वस्तुतः वे परिवार ही धन्य हैं अन्यथा अपकीर्ति और प्रभावहीनता का ग्राफ बढ़ता रहे, यह संतति दोष में गिना जाना चाहिए।

हम सभी को चाहिए कि फुरसत निकाल कर पूरी ईमानदारी के साथ तुलनात्मक आत्मचिन्तन करें और अपनी दुर्दशा, अधःपतन, संस्कारहीनता तथा सामाजिक मूल्यहीनता को देखें तथा अपने आपको सुधारें। खूब सारे लोग न सुधरना चाहते हैं न उन्हें सुधारा जा सकता है।

ऎसे लोगों पर समय, श्रम और धन खर्च करना मूर्खता है लेकिन ऎसे लोगों को समाज और क्षेत्र की मुख्य धाराओं से भी दूर रखा जाना चाहिए अन्यथा एक मछली तो सारे तालाब को ही गन्दा कर पाती है लेकिन एक मगरमच्छ पवित्र स्नान को जलाशय पर आए तमाम लोगों को एक-एक कर निगल जाता है।

इस बारे में गज और ग्राह की पौराणिक कहानी को भी हमें स्मरण रखना चाहिए। और यह भी तय मानकर चलना चाहिए कि अब ग्राह की पकड़ से कोई छुड़ाने आने वाला नहीं है क्योंकि गज कम होते जा रहे हैं और ग्राह लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इन तमाम हालातों में कम से कम एक बार अपने पुरखों का स्मरण करें और उनकी तो लाज रखें।