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साहित्य
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युवाओं को सौंपे अनुभवों की विरासत

Deepak Acharya
Deepak Acharya
September 7, 2021

ज्ञान और अनुभव दो ही ऎसे महत्त्वपूर्ण कारक हैं जो मानव जीवन के लिए अनिवार्य आवश्यकता के रूप में सदियों से अनुभव किए जाते रहे हैं। पुरातन से लेकर अत्याधुनिक और नित-नूतन ज्ञान से पूरी दुनिया किसी न किसी रूप में परिचित होती रही है लेकिन अनुभवों से सीख, सबक या प्रेरणा लेने की परंपरा निरन्तर समाप्त होती जा रही है।

और इसी का परिणाम है कि ज्ञान-विज्ञान का जबर्दस्त चाहा-अनचाहा विस्फोट सब जगह हो रहा है किन्तु व्यवहारिक जीवन विज्ञान और व्यक्तित्व की पूर्णता की दिशा में निरन्तर ह्रास की स्थिति सामने आती जा रही है। ज्ञान भी तभी कारगर सिद्ध हो सकता है कि जब उसके साथ व्यवहारिकता, सामीप्य दृष्टि और अनुभवों का समावेश हो, अन्यथा वह ज्ञान कोरा ही रह जाता है और ऎसे स्थूल ज्ञान का कोई उपयोग न व्यक्ति के लिए हो सकता है, न समाज के लिए। केवल किताबी ज्ञान का दायरा लगातार पसरता जा रहा है और ज्ञान के मूल मर्म को आत्मसात करने का अभाव सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रहा है।

समाज-जीवन और देश-दुनिया में विद्वानों, महापुरुषों, कर्मयोगियों, व्यवसायियों, नायकों-महानायकों और नौकरशाहों व कार्मिकों से लेकर किसी न किसी विधा या व्यवसाय में लम्बे समय तक जुड़े रहने वाले व्यक्तियों की कहीं कोई कमी नहीं है। और ये सब के सब अपने कार्यकाल के दौरान अच्छे-बुरे लोगों के सम्पर्क में रहकर सैकड़ों-हजारों खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभवों से रूबरू होते हैं, इन्हें भोगते हैं, भुगतने को विवश होते हैं। और ढेरों अनुभव ऎसे होते हैं जब इन्हें लगता है कि वे जिन कार्यस्थलों व क्षेत्रों में रह रहे हैं, काम कर रहे हैं, उनके यथार्थ और सच के बारे में किसी को भनक तक नहीं लगती।

अपने से ऊपर के ओहदे वाले या सम्पर्कित प्रभावशाली हजारों-लाखों लोग ऎसे सामने आते हैं जिनके साथ काम करना कितना मुश्किल होता है। इनके मूर्खता भरे कारनामों, अजीबोगरीब हरकतों, विध्वंसकारी करतूतों, अहंकारों, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार, अभद्र भाषा और अश्लील व्यवहार, पैशाचिक वृत्तियों और क्रूर कर्म के हालातों से त्रस्त होते हुए भद्र और निष्ठावान कर्मयोगी किस कदर हर मामले में पीड़ित और शोषित अनुभव करते हैं। इसकी लम्बी दासता रहती है।

वहीं काफी कुछ प्रतिशत उन लोगों का व्यवहार भी अनुभवित होता है जो सारे वितण्डों और सम सामयिक दुरभिसंधियों, दुराचार, चापलूसी और भ्रष्टाचार से परे रहकर भले इंसान के रूप में पेश आते हैं, अपने सम्पर्क में आए मातहतों और आम जन को प्रसन्नता प्रदान करते हैं और जो मिलता है उसके चेहरे पर मुस्कान तैराने की क्षमता रखते हैं, मानवीय मूल्यों, संस्कारों और नैतिकता के मूर्त स्वरूप की तरह रहा करते हैं।

यह स्थिति न केवल अपने से ऊपर वालों में ही, बल्कि अपने संगी-साथियों और मातहतों तथा परिचितों में भी न्यूनाधिक रूप से दिखाई देती है। अपने ही साथियों और सहकर्मियों तथा किसी न किसी काम से अपने पास आने वालों को भ्रमित कर अथवा काम करने की एवज में या दबाव डालकर लूटने, शोषण करने वाले, कामचोरी करते हुए टाईमपास करने और अपने कामों का बोझ दूसरों पर डालने वाले, ऊपर वालों को खुश करने के सारे जायज-नाजायज हथकण्डों और चापलूसी को अपनाने तथा कान भरने वाले, सर्वांग समर्पण तक कर डालने में आगे ही आगे रहने वाले कुटिल और छद्म लोगों की कहीं कोई कमी नहीं है। इन सहकर्मियों में चन्द फीसदी भले और अच्छे भी होते हैं जो कि संवेदनशील, सहृदयी, सेवाभावी, परोपकारी और सहिष्णु भी होते हैं और इनके प्रति आत्मीयता का भाव अपने आप झरने लगता है।

इसी प्रकार प्रभावशालियों की भी कई किस्में हैं। लेकिन इतना तो तय है कि समाज-जीवन और परिवेश में अब सज्जनों की संख्या में निरन्तर कमी आती जा रही है और स्वार्थी, खुदगर्ज एवं संवेदनहीनों का प्रतिशत बढ़ने लगा है। कुल जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा अपनी पूरी जिन्दगी में कर्मयोग और लोक व्यवहार के विभिन्न चाहे-अनचाहे पड़ावों से होकर गुजरता है और उसके पास अनुभवों का इतना अधिक भण्डार होता है कि वह चाहे तो नई पीढ़ी और वर्तमान को अपने अनुभवों के बारे में बताकर उनके जीवन को सँवार सकता है, समाज और क्षेत्र को नई दिशा-दृष्टि प्रदान कर सकता है। क्योंकि जो अनुभव पुराने लोग ले चुके होते हैं उन्हें पाने में नए लोगों को दशक लग सकते हैं और ऎसे में पकै-पकाए अनुभव मिल जाएं तो ये युवा और अधिक ऊर्जा से कर्मयोग दर्शा सकते हैं।

लेकिन देखा यह गया है कि कुछ फीसदी बुद्धिजीवियों को छोड़कर शेष सारे के सारे अपने ज्ञान और अनुभवों के जखीरों को मरते दम तक अपने दिल-दिमाग में कबाड़ की तरह घुसाए रहते हैं और इनके सार्वजनीन प्रकटीकरण में कोई रुचि नहीं लेते। और अन्ततोगत्वा इन अमूल्य अनुभवों के साथ ही वे संसार को छोड़ कर चले जाते हैं।

जो लोग सेवाओं में रहकर चुप्पी साधे रखने को विवश होते हैं उनकी बात अलग है लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद भी ये बुद्धिजीवी अपना मुँह नहीं खोल पाते। यह अपने आपमें न केवल कायरता है बल्कि समाज और देश के साथ गद्दारी भी है। इन लोगों का दायित्व है कि अपने ज्ञान और अनुभवों से नई पीढ़ी की समझ को विकसित करने और यथार्थ को सामने रखने का प्रयास करें ताकि नए लोगों को इन अनुभवों को स्वयं में अनुभूत करने का समय बच सके और इन बुजुर्गों के अनुभवों के आधार पर वे आगे की यात्रा कर सकें।

इसका मूल कारण यह भी है कि ये अनुभवी लोग जीवन भर की प्रताड़ना अथवा अभावों से झूझते हुए हीन भावना से इतने अधिक ग्रस्त हो जाते हैं कि सच कहने का साहस नहीं जुटा पाते। फिर ऊपर से सेवानिवृत्ति के बाद समाज में टिके रहने के लिए इन्हें सकारात्मक छवि को ओढ़े रखना भी जरूरी होता है।

बहुत सारे सेवानिवृत्तों को नौकरी या काम-धंधे में रहते हुए स्वजनों, समाज और क्षेत्र की कभी याद नहीं आती लेकिन जैसे ही रिटायर्ड हो जाते हैं, पद, सम्मान और पुरस्कार तथा लोकप्रियता की चाह में सामाजिक एवं आंचलिक कार्यों, संस्थाओं, धार्मिक गतिविधियों में घुसपैठ कर लिया करते हैं ताकि उपेक्षित जीवन जीने से बचे रह सकें। हालांकि यहां भी ये किसी काम के नहीं होते, केवल आभूषण के रूप में शो केस में सजी मूर्तियों की तरह मंचीय शौक पूरा करने के सिवाय इनकी किसी में कोई रुचि नहीं रहती। समाज और क्षेत्र की याद इन्हें सेवानिवृत्ति के बाद ही आ पाती है, यह इनका और समाज तथा इनकी मातृभूमि का दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए।

बहुत सारे लोग दुनिया भर के दूसरे कामों के अनुभवों और ज्ञान को बाँटते दिखाई देते हैं लेकिन दीर्घकाल तक जिस क्षेत्र में नौकरी की होती है, जिस कर्म में उनकी दक्षता रही है, जिसके जरिये उनकी रोजी-रोटी और जिन्दगी चलती रही है, उस क्षेत्र के अनुभवों या ज्ञान के बारे में कभी कोई चर्चा नहीं करते। जबकि उनकी नौकरी और काम-धंधे के क्षेत्र से जुड़े हजारों अनुभव और ज्ञान उनके पास होता है।

इसका कारण यह भी हो सकता है कि इनका कर्मयोग दक्षता की बजाय टाईमपास ही रहा हो अथवा कार्यकाल मेंं भ्रष्टाचार, कामचोरी और शोषण आदि नकारात्मक पहलुओं में डूबे रहे हों, इसलिए किस मुँह से अपनी बात कहें। खूब सारे लोग इतने भ्रष्ट, दुराचारी, अहंकारी और शोषक रहे होते हैं, इनके द्वारा यदि अनुभवों के प्रकटीकरण की शुरूआत हो, तो जानकार लोग पीछे पड़कर मिट्टी पलीत कर दें।

लेकिन जिन लोगों का पूरा कार्यकाल ईमानदारी, निष्ठाओं और मानवीय संवेदनशीलता के साथ आदर्श के साथ बीता हो, उन लोगों को किससे क्या डर? पर ये लोग भी साहस नहीं कर पाते। इसीलिए कहा जाता है कि बुद्धिजीवियों में कलेजा नहीं होता, वह कायर ही होते हैं और जिन्दगी भर कायर ही बने रहते हैं। इनका आत्म जागरण तभी हो पाता है कि जब कोई स्वार्थ सामने हो।

यों सच भी है कि अभिव्यक्ति के स्तर पर कोई सपाट और सचबयानी नहीं कर पाता, हिचकता है, डरता है, तो इसका सीधा सा मतलब यही है कि वह भ्रष्ट है अथवा अपराध बोध से ग्रस्त डरपोक। ऎसे ही लोगों के कारण से समाज का भला नहीं हो पा रहा है। अन्यथा वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के सामने ये अपने अनुभवों का खजाना खोलते रहें तो इससे समाज, कर्मयोग और देश की अन्तर्धाराओं की भी जानकारी रहे, और कौन कैसा है, कैसा रहा है, इस सत्य को भी समाज जान सके। इससे दुष्टों की कलई खुलेगी, सज्जनों को प्रोत्साहन मिलेगा और समाज का भला होगा।

यह जरूरी हो चला है कि हर व्यक्ति अपने जीवन के सत्य और यथार्थ भरे अनुभवों को समाज एवं देश के सामने रखे ताकि सत्यासत्य और यथार्थ से सीखकर या सबक लेकर युवा पीढ़ी अपने आपको सँवारती हुई समाज और राष्ट्र के विकास में सहभागी बन सके। पुराने लोग यदि अपने अनुभवों को पीढ़ी दर पीढ़ी परोसते चले जाते तो आज हम विश्व गुरु बने रहते।