अध्यात्म चर्चा - प्रतीक्षा को अवसर में बदलें, जीवन का आनन्द पाएं

व्यस्तता हर व्यक्ति के साथ जीवन भर लगी रहती है लेकिन व्यस्तता के बीच हम थोड़े क्षण भगवत् स्मरण और ध्यान के लिए निकाल लें तो निश्चय ही स्वस्थ, मस्त और आनन्दित रह सकते हैं।
कोई जरूरी नहीं कि कठोर साधना की जाए। जहां भी समय मिले, हम इसका प्रयोग कर सकते हैं। जब मौका मिले, बाहरी वृत्तियों से ऊपर उठकर आंखे बन्द कर बैठ जाएं और एकाग्र अवस्था का अभ्यास करते हुए शून्य में जाने का प्रयास करें।
भीतरी नाद श्रवण या नाम जप से अपना सूक्ष्म शरीर ताकतवर होता है और इसमें मानसिक एवं शारीरिक रोगों तथा बाहरी आक्रमणों से लड़ने की जबरदस्त ताकत अपने आप विकसित हो जाती है।
जितने अधिक संख्या में नाम का जाप होगा उतना ही सूक्ष्म शरीर का प्रसार होगा, उसका तेजस् घनत्व बढ़ेगा और उसी अनुपात में हम दैवीय शक्तियों का अनुभव करने लगते हैं। नाम स्मरण और जप के लिए कोई नियम नहीं है। किसी भी अवस्था में किसी भी समय और कहीं भी किया जा सकता है। मंत्र जप के नियम अवश्य हैं।
नाम का जप केवल जिह्वा या मन से उच्चारण मात्र नहीं है बल्कि इसके जप से शरीर के भीतर के चक्र और अन्तःस्थ नाड़ियों का स्पन्दन एवं जागरण भी होता है। इनके जागरण से शरीर निर्मल और दिव्य बनता है तथा इसी से रोगों से बचने और लड़ने की मजबूत स्थितियां प्राप्त होती हैं।
अपने लिए यह बात सिर्फ कहने भर की है कि समय नहीं मिलता, व्यस्तता है आदि-आदि। लेकिन अपनी दिनचर्या पर थोड़ा गंभीरता से गौर करें तो हम पाएंगे कि हमारे पास खूब सारा समय ऐसा होता है जिसका उपयोग हम कर सकते हैं लेकिन आलस्य और प्रमाद के कारण इस बहुमूल्य समय को हम व्यर्थ ही नष्ट कर दिया करते हैं।
जैसे कि हम किसी को रिसीव करने या छोड़ने बस या रेल्वे स्टेशन पर गए, बस-रेल पहुंचने में देरी हो, किसी दफ्तर में काम से गए और प्रतीक्षा करनी पड़े, मन्दिर गए हों, बस या रेल में सफर कर रहे हों या और ऐसे ही क्षण जब हमें प्रतीक्षा करनी पड़े। किसी काम-धन्धे, दफ्तर या स्कूल अथवा किसी न किसी पारिवारिक या सार्वजनिक कार्यक्रम में गए हों, वहां हमारे पास काफी समय ऐसा होता है जब हम कोई काम नहीं करते, फालतू में गप्प हांकते रहते हैं। ऐसे क्षणों का उपयोग नाम स्मरण में किया जाए तो इसका सीधा फायदा मिलेगा ही।
मान लें कि हम अपने निवास से गंतव्य के लिए बस-रेल या अपने वाहन में निकले और एक से लेकर दस-पन्द्रह घण्टे का सफर हो, तब फालतू की बातचीत में समय न गंवाएं, आंखें बंद कर नाम स्मरण करते रहें। ऐसे क्षणों का उपयोग करते हुए लाखों नामों का बैलेंस बना सकते हैं।
नाम स्मरण की यही ऊर्जा शरीर को रोगों से तो बचाती ही है, आने वाले शुभाशुभ को कभी संकेतों और कभी स्पष्ट तरीकों से बता भी देती है। यह हमारे चित्त की निर्मलता, निष्कपटता और पवित्रता पर निर्भर है। जितना हम अधिक शुद्ध और पवित्र होंगे, उतने ही अनुपात में दैवीय संकेतों को स्पष्ट अनुभव करने लगेंगे।
जरूरी नहीं कि कोई बड़ा नाम लिया जाए, हमें जो भगवान पसन्द हों, उनका कोई सा छोटा नाम लेकर इसका जप शुरू कर दें। एक नाम मात्र को साधने भर से दूसरे सभी दिव्य नाम मंत्र के रूप में स्वतः सिद्ध होने लगते हैं इसलिये एक नाम को अपनाएं और इसका जितना अधिक जप कर सकें, करें। यह नाम ही हमें निरोगी तो रखेगा ही, अपने मन में जिस किसी काम का संकल्प उठेगा, उसे पूर्ण करने में भी मदद देगा।
नाम हो या मंत्र, इनकी सिद्धि के बारे में कहा गया है कि जितने नाम या मंत्र के अक्षर हैं उतने लाख या इसका सवाया लाख जप अथवा स्मरण कर लेने पर उसका जागरण होता है, फिर वह सिद्धि प्रदान करने में समर्थ होता है।
इसलिए चतुर साधक अपने ईष्ट का छोटे से छोटा नाम अंगीकार कर लाखों की संख्या में जप कर इसे सिद्ध कर लेते हैं। सिद्ध हुआ नाम या मंत्र उनके लिए लौकिक एवं पारलौकिक सिद्धियों के द्वार खोल देता है। फिर एक बार कोई सा नाम सिद्ध हो जाने पर उसका आगे एवं पीछे संपुट लगाकर यदि कोई दूसरा नाम या मंत्र सिद्ध किया जाएगा, तो वह मंत्र भी सिद्ध मंत्र की तरह प्रभाव दिखाएगा।
जिन दिनों साप्ताहिक अवकाश हो, लम्बे अवकाश हों, उन दिनों को साधना के लिए निकालें तथा घर में या किसी एकान्त स्थान या मन्दिर में जाकर निश्चित संख्या में जप कर लें।
जब किसी नाम मंत्र का जप करें तब माला या मनके गिनने की बजाय इस बात पर ध्यान दें कि जिस देवता का जप हो रहा है, उसमें ही ध्यान लगा रहे। इसके लिए जप करते वक्त आँखों की दोनों भौंहों के बीच, जहां तिलक लगाते हैं उस आज्ञा चक्र में ध्यान करें। आंखों व शरीर में कहीं तनाव नहीं होना चाहिए, एकदम सहज हो।
जब मन में प्रसन्नता हो, तभी भगवान के जप या ध्यान करें। आज्ञा चक्र के भीतर रोशनी का बिन्दु है, इसी भावना को ध्यान में रखकर आगे बढ़ें। ध्यान के वक्त ड्रीलिंग थैरेपी को अपनाएं याने जैसे हैण्डपंप ड्रील होता है, उसके बाद पानी निकलता है।
इसी प्रकार हम जब ध्यान करते हैं तो पहले पहल तत्त्वों के रंग, पहाड़, काले बादल या खूब पसरे हुए घने पहाड़ दिखने लगते हैं। यह अपने पूर्वजन्मों की संचित स्मृतियां, पाप राशि या तामसिक स्थितियां हैं, ध्यान व एकाग्रता से नाम मंत्र जप करते हुए इन काले घने चट्टानी पहाड़ों की आभा को ड्रील करना है। रोजाना किंचित मात्र भी सूक्ष्म ड्रील हो जाएगा तो हमें भीतर से आनंद प्राप्त होगा।
यह मानसिक भावना करें कि ड्रील करते हुए लगातार आगे बढ़ रहें हैं और आगे शुभ्र आकाश आने वाला है। इस भावना से पूरी तन्मयता से यदि नाम जप किये जाएं तो निश्चित ही दिव्य ज्योति व असीम आनंद का अनुभव होगा। ज्यों-ज्यों ध्यान बढ़ेगा, यह असीम आनंद और अधिक पसरता जाएगा और दिव्यत्व तथा दैवत्व का अनुभव स्वतः ही होने लगेगा।
