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साहित्य
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कचरे वाली गाड़ी ...

Deepak Acharya
Deepak Acharya
May 30, 2021
गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल…। यह सुमधुर एवं अत्यन्त उपयोगी आह्वान गीत सुनते ही मोहल्ले और गली भर के लोग हाथों में डब्बे, बाल्टियां और प्लास्टिक की थैलियों में बंद कचरा लाकर गाड़ी में डाल जाते हैं और सुकून पाकर लौटते हैं कि चलो घर का कचरा गया बाहर। घर हो गया साफ-सुथरा। ठीक यही स्थिति आजकल सोशल मीडिया की होकर रह गई है। पर यहां सोशल मीडिया से कचरे वाली गाड़ी कई मायनों में अच्छी है क्योंकि यह घरों से संग्रहित कचरा एक स्थान विशेष में ही डाल दिया करती है।

इधर सोशल मीडिया के खूब सारे प्लेटफार्म हैं जिनमें कचरा डम्पिंग नहीं होता बल्कि हूबहू या रिसाईकिल होकर फिर कई-कई लोगों तक पहुंचता रहता है। हर व्यक्ति की रुचि और व्यवसाय अलग-अलग होते हैं और उसे उन्हीं के बारे में सोचना-समझना और चिन्तन करना चाहिए। और उसे अपने विषय के बारे में जानकारी पाना अच्छा भी लगता है लेकिन अब सारा गुड़-गोबर होकर रह गया है।

दुनिया भर की जो सामग्री अनचाहे अंधड़ के साथ ओलावृष्टि की तरह परोसी जा रही है उसमें एक आदमी को अपने लायक सामग्री बमुश्किल 2 या 3 फीसदी ही प्राप्त हो पाती है। ऎसे में उसका ध्यान अपने काम-धंधे, धर्म-ध्यान, पढ़ाई-लिखाई आदि से भटक कर अंधविश्वासों, दुनिया भर की हलचलों, मनोरंजन प्रधान वीडियो-फोटो और दूसरी कई सारी गैर जरूरी पोस्ट्स पर केन्दि्रत हो जाती है।

तब उसकी स्थिति निरूद्देश्य भटकते पुरुषार्थहीन आवाराओं या भिखारियों की तरह हो जाती है जिनके पास टाईमपास करने के सिवा और कोई चारा नहीं है क्योंकि मौत भी अपने मांगे कभी नहीं आती। उसे जब आना होता है तभी आएगी। तब तक इन बेचारों को आवारगी और मंगतागिरी के सिवा और करना ही क्या है। यह उनकी सबसे बड़ी मजबूरी है जिसकी सीमा ताजिन्दगी ही हुआ करती है। या फिर कामोन्मत्त हिंसक पशु जैसी। हम सब लोग अपने जीवन के महत्त्व और लक्ष्य से भटक गए हैं। हम चाहते हैं कि दुनिया का कोई सा ज्ञान या हलचल ऎसी न हो, जो उन तक न पहुंची हो। इसलिए दुनिया भर का सारा कचरा हम अपने दिमाग में रखना चाहते हैं।

ऊपर से अपने आपको ज्ञानी-विज्ञानी, सभी विषयों के ज्ञाता और सबसे ज्यादा अग्रणी बताने का भूत इतना अधिक सवार है कि जो भी कुछ अपने पास आए, उसे फटाफट दूसरों तक कितनी जल्दी पहुंचा दिया जाए। काश कि ऎसी भावना हमें अपने पास उपलब्ध अतिरिक्त संसाधनों, सुविधाओं और रुपए-पैसों को जरूरतमन्दों तक पहुंचाने की होती, तो दुनिया का भला हो जाता। पर सारी दुनिया के जीवों में सबसे अधिक चालाक हम इंसान बाकी सब अपने पास सहेज कर संग्रहित करते रहना चाहते हैं पर मुफतिया कचरा हम दूसरों के पाले में उण्डेलने के लिए तीव्र आतुर रहा करते हैं।

सोशल मीडिया अब वैचारिक क्रान्ति और लोक जागरण का जरिया ही नहीं रहा बल्कि इससे आगे बढ़कर यह वैचारिक प्रदूषण, संघर्ष और कलह का जन्मदाता और इंसानों को निकम्मा-निर्बल और मुर्दाल बनाने की दिशा में लगातार आशातीत सफल होता जा रहा है। हम सभी को मुफत का फुल पैक नेट दिला दो, एक -एक एन्ड्रायड मोबाईल दिला दो, फिर न कोई समस्या का बखान करेगा, न अभावों का रोना रोएगा, सारे के सारे एक कोने में शोक संतप्तों की तरह दुबके हुए मिलेंगे दुनिया भर का कचरा खंगालते हुए, जैसे कि सुनारों के बाजार में लोग नालियों से स्वर्ण तलाशते दिखाई देते रहे हैं।

वर्तमान का समय चौतरफा संक्रमण काल है जिसमें व्यक्ति, समुदाय व क्षेत्र से लेकर परिवेश तक हर तरफ संक्रमण का प्रभाव दिखने लगा है। इसमें हम लोग यदि भटक गए तो फिर हम कहीं के नहीं रहेंगे। धोबी का गधा न घर का न घाट का, वाली स्थिति आसन्न खड़ी है। अपने पूरे जीवन को हमने टाईमपास और मनोरंजनप्रधान मानकर अनुत्पादक-अनुपयोगी स्थिति में ला दिया है या फिर अंधविश्वासों और अज्ञानता के अंधकार की ओर धकेलते जा रहे हैं। अभी यदि पुरातन संस्कारों की जड़ों को मजबूत नहीं किया, परंपराओं के अवलम्बन में चूक करते रहे, तो तय मानकर चलिएं कि हम अपना ही दुर्लभ जीवन व्यर्थ में नहीं गंवा रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों, समुदाय, अपने क्षेत्र और देश को भी गर्त में डाल रहे हैं।

यही सब ही तो कलिकाल का प्रत्यक्ष प्रभाव और सांसारिक प्रपंचों की माया है। असली आत्मज्ञानी और संयमी और अनुशासित वही है जो इस सत्य से परिचित है। अन्यथा हम दुर्बुद्धियों की पशुता और लक्ष्यहीनता को कौन चुनौती देगा, करते रहो, जो करते रहे हो, जब तक काल का पंजा अपने गले तक न पहुंचे। वैसे भी मरे हुओं और लक्ष्य भटके लोगों की परवाह कोई नहीं करता।