ये न होते तो धरती पर प्रलय ही आ जाता

आम तौर पर देखा गया है कि किसी भी दिवंगत की पगड़ी रस्म का कार्यक्रम हो, इसमें शामिल होने वाले खूब सारे लोग उस दिन होने वाले भोज में यह कहकर शामिल नहीं होते कि उन्हें नहीं चलता है।
कोई तीर्थयात्रा करके आने का बहाना करता है, कोई अपने आपको महान सिद्ध साधक, कोई ब्रह्मज्ञानी पण्डित, कोई आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष, कोई महान राजनेता और कोई समाजसुधारक बताते हुए इस भोज से अपने आपको दूर रखता है।
जबकि हकीकत यह है कि पगड़ी रस्म के दिन वाला भोज पूर्णतः शुद्ध और शुभ होता है और इसका मृत्यु भोज से कोई संबंध नहीं होता। लेकिन अपने आपको परम पवित्र, ज्ञानी, उद्भट विद्वान, पुराणों और शास्त्रों का जानकार मानने का भ्रम रखने वालों की एक ऐसी विचित्र प्रजाति कुछ साल से हमारे सामने है, जो न समझदार है, न समझने की उदारता रखती है।
और घोर आश्चर्य की बात यह है कि इन पगड़ी रस्मों में आने के बावजूद भोजन से किनारा करते रहने वाले ये बेशर्म लोग दिवंगत के नाम पर उनके परिजनों द्वारा दिए गए बरतन, शैय्या, वस्त्र सहित 20 से अधिक प्रकार के दान अत्यन्त प्रसन्नता और कृतज्ञता भरे भावों से ग्रहण कर अपने आपको धन्य मानते हैं।
यह अजीब दोगलापन है, भोजन से परहेज रखते हैं और दान कैसा भी हो, लेने में जरा भी शर्म नहीं। और सामाजिक दुर्भाग्य यह है कि समृद्ध और सम्पन्न परिवारों के लोग, धनाढ्य और हर दृष्टि से वैभवशाली जिन्दगी जी रहे लोग भी दान लेने से परहेज नहीं रखते। जबकि इन लोगों को चाहिए कि इस कुप्रथा को रोकने के लिए स्वेच्छा से आगे आएं। भोजन करना नहीं, दान ले लेना। यह पाखण्ड बदस्तूर जारी है। इस पर कोई रोक-टोक नहीं।
जो लोग धार्मिकता का लहंगा पहनकर भोजन से परहेज रखते हैं ऐसे लोगों की मृत्यु पर पगड़ी रस्म के दिन भोजन का बहिष्कार करना चाहिए। जब वे न करें तो हम भी क्यों करें, हम भूखे भिखारी हैं क्या?
इन पाखण्डी महाज्ञानियों को यह सोचना चाहिए कि उनकी इस प्रवृत्ति का सामाजिक संतुलन और लोक व्यवहार पर कितना अधिक घातक प्रभाव पड़ता है। फिर बहुत ज्यादा मात्रा में भोजन व्यर्थ पड़ा रहता है, जिसका कोई उपयोग नहीं होता। या तो पहले ही स्पष्ट कर दें कि वे भोजन नहीं करेंगे, ताकि उस हिसाब से सभी व्यवस्थाएं हों।
कितना अच्छा हो यदि समाज के स्तर पर ही उन सभी दिव्यदेही लोगों की एक सूची बन जाए जो पगड़ी रस्म या अन्य शुभाशुभ प्रसंगों पर भोजन नहीं करते हैं, इससे भोजन निर्माण और इससे जुड़ी व्यवस्थाओं के निर्वाह में सुविधा रहे।
फिर समाज के स्तर पर भी यह निर्णय होना चाहिए कि इनके किसी भी तरह के आयोजन में भोजन का प्रबन्ध नहीं रहेगा। इन महान लोगों के परिवारों को भी चाहिए कि उनके आयोजनों से संबंधित निमंत्रण पत्र में इस बात का स्पष्ट उल्लेख कर दें कि भोजन का प्रबन्ध नहीं रहेगा।
अपने आपको धार्मिक और महान साधक या दिव्यात्मा मानकर सामूहिक भोज से परहेज रखने वालों का स्याह पक्ष किसी दिखता नहीं।
कई ऐसे शराबी, मांसाहारी, व्यभिचारी, भ्रष्ट और धूर्त्त-मक्कार, अतिक्रमणकारी, अधर्मी, भाई-बंधुओं, माता-पिता, पति-पत्नी और परिवारजनों का अनादर करने वाले, प्रताड़ित करने, उनकी धन-सम्पत्ति हड़पने वाले हैं, जिनका धर्माचरण या भगवान की आराधना, पूजा आदि से कोई सरोकार नहीं है लेकिन जहां प्रेमपूर्वक स्नेहिल भोज की बात आती है, वहां अपने आपको परम शुद्ध और सात्त्विक धर्मात्मा, सदाचारी और दिव्य एवं दैवीय मानते हुए इस भोज का अनादर करते है। ये लोग अक्सर होटलों, पार्टियों में माल उड़ाते देखे जाते हैं।
समाज, क्षेत्र और देश की दुरावस्था के लिए ये ढोंगी, पाखण्डी और छद्म धार्मिक धूर्त्त-मक्कार भी दोषी माने जाने चाहिएं जिनका दोहरा-तिहरा चरित्र समाज समझ नहीं पा रहा है।
इन छद्म सनातनी, पाखण्डी धार्मिक, दिखावटी समाजसुधारकों के चरित्र और जीवन व्यवहार का शोध भाव से अध्ययन करें तो कई चौंकाने वाले रहस्य सामने आ सकते हैं।
इस पोस्ट का मृत्यु भोज से कोई संबंध नहीं है। मृत्यु भोज केवल एकादशाह को ही माना गया है और इसमें घर-परिवार के निकटस्थ संबंधी दस-बीस लोगों को ही भोजन कराने की शास्त्र आज्ञा है।
दूसरे अर्थों में यह भी माना जा सकता है कि इन दिव्य महापुरुषों और आत्मज्ञानियों ब्रह्मज्ञानियों के तप और दिव्यताओं के कारण से ही यह पृथ्वी टिकी हुई है। ये न होते तो समय से पहले महाप्रलय आ ही जाता।
अपने इलाके में भी ऐसे खूब सारे पावन प्राणी हैं, इनके दर्शन करें, विनम्रतापूर्वक अभिवादन, अभिनन्दन करें और धरती को टिकाए रखने के लिए इनका आभार जताना न भूलें।
